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आवरण कथा/गणतंत्र 76 साल: गणराज्य के दो राहे

संवैधानिक दायित्वों और मर्यादाओं की सबसे बड़ी कसौटी नागरिक अधिकारों के मामले हैं, इसलिए यह देखना...
आवरण कथा/गणतंत्र 76 साल: गणराज्य के दो राहे

संवैधानिक दायित्वों और मर्यादाओं की सबसे बड़ी कसौटी नागरिक अधिकारों के मामले हैं, इसलिए यह देखना जरूरी कि आज हम कहां खड़े हैं

सतत्तरवें वर्ष में कदम बढ़ा रहे गणतंत्र की पूर्व संध्‍या पर चुनाव आयोग का 25 जनवरी को राष्‍ट्रीय मतदाता दिवस के लिए अखबारों में छपे विज्ञापन के लोगो में ‘‘मैं भारत हूं’’ की घोषणा बरबस ध्‍यान खींचती है। 1950 में 26 जनवरी को ‘‘हम भारत के लोग...’’ गणतंत्र की उद्घोषणा करते हैं। मौजूदा विज्ञापन में ‘हम’ की जगह ‘मैं’ और ‘भारत के लोग’ की जगह ‘भारत’ क्‍या गणतंत्र के 76 बरस के मुकाम का कोई फसाना बता रहा है? मौजूदा वक्‍त के दूसरे घटनाक्रम क्‍या कहते हैं, जिनसे गणतंत्र के मौजूदा स्‍वरूप और उसके कथानक उजागर होते हैं? सवाल यह भी है कि हम कैसे आंकें कि गणतंत्र की चाल, चेहरा और चरित्र कैसा है। हाल के घटनाक्रम जो संकेत दे रहे हैं, वे अल्‍पकालिक हैं या उनसे कोई दीर्घकालिक संकेत मिल रहे हैं? जो भी हो, गणतंत्र इन बरसों में कई-कई मुकामों और मोड़ों से होकर गुजरा है, जिसके निशान और बेशक जिसकी रोशनी भी उसके चेहरे-मोहरे, हाव-भाव पर पड़े हैं। क्‍या इनसे उसकी दिशा भी बदली है या कुछेक अवरोधों और व्‍यतिक्रम के साथ वह अपनी दिशा में आगे बढ़ता रहा है? इसे आंकने का एक तरीका यही हो सकता है कि किन वादों और प्रतिबद्धताओं से हमारे गणतंत्र ने अपनी दिशा तय की थी और संविधान में किन मूलभूत सिद्धांतों को उसकी बुनियाद बनाया गया था। आइए पहले देखते हैं कि आज के हालात क्‍या संकेत दे रहे हैं और उनसे कौन-सी दिशा का अंदाजा होता है।

इसमें दो राय नहीं कि हम कई मामलों में दो राहे पर खड़े दिखते हैं। देश की ही नहीं, अंतरराष्‍ट्रीय स्थितियां डगमग दिखती हैं और ऐसे दो राहे खड़ी करती हैं, जहां जिधर भी जाओ, खतरे कम नहीं दिखते। लगभग नब्‍बे के दशक से और नई सदी में तो कुछ तेज कदमों से जिस अमेरिका के पाले में हम पैर बढ़ा रहे थे, उसके नए राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रम्‍प अपनी शर्तों पर दुनिया का नक्‍शा ही बदलने पर आमदा हैं। उनसे भारत ही नहीं, समूची दुनिया हैरान है कि किस ओर रुख करें। इस गणतंत्र दिवस पर यूरोपीय संघ के चेयरमैन और कमिनश्‍नर हमारे अतिथि बनकर आए और कई व्‍यापार और रक्षा समझौते इसी के मद्देनजर हुए कि अमेरिका की धमकियों के बरक्‍स कोई दूसरी भरोसेमंद राह तलाशी जाए। लेकिन यह हमारी अर्थव्‍यवस्‍था को कितना संबल देंगे, अभी कहना मुश्किल लग रहा है।

दो राहे किस कदर

अमेरिका के बरक्‍स दूसरा पाला उसे एक हद तक चुनौती देने वाले रूस और चीन का है, जिसकी भी अपनी शर्तें हैं। इन्‍हीं परिस्थितियों में कुछेक महीने पहले रूस के राष्‍ट्रपति व्‍लादीमीर पुतिन लंबे अरसे बाद नई दिल्‍ली आए और कई करार और वादे भी कर गए, लेकिन न रूस पहले जैसा है, न हमारी स्थितियां पहले जैसी हैं। तो, पुराने वक्‍त यानी शीत युद्ध के दौर की दोस्‍ती का आह्वान तो अब क्‍या ही किया जा सकता है। यहां यह भी गौरतलब है कि पिछले कुछ साल के दौरान चीन से तकरीबन 30 प्रतिशत सस्‍ते तेल और पेट्रोलियम पदार्थ खरीदने पर हमने अंकुश लगा दिया, ताकि अमेरिका से द्विपक्षीय करार हो सके और ट्रम्‍प के जुर्माना स्‍वरूप अतिरिक्‍त 25 फीसदी टैरिफ से बचा जा सके। हालांकि वह करार मृगमरीचिका बना हुआ है।

खैर, पिछले साल अमेरिका के बरक्‍स राह तलाशने के लिए ही 2020 में गलवन घाटी की तनातनी के कई साल बाद हमने चीन की ओर भी रुख किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछली सितंबर में शंघाई सहयोग संगठन की शिखर बैठक में पहुंचे और चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय वार्ताएं भी हुईं। लेकिन चीन के आयात में तो इजाफा सौ फीसदी से ज्‍यादा हुआ और हमारे निर्यात मामूली ही महज 3-5 प्रतिशत ही बढ़ पाए। यानी हमारी अर्थव्‍यवस्‍था को ज्‍यादा राहत नहीं मिली।

आर्थिकी का आलम

इसी तरह कुछेक और देशों, मसलन न्‍यूजीलैंड से करार हमारे निर्यात को वह मूल्‍य और मात्रा मुहैया नहीं करा सकते, जो अमेरिका से मिलता रहा है। उसके निशान कई क्षेत्रों में दिख रहे हैं। जो निर्यात में सबसे ज्‍यादा कीमत जोड़ते हैं और देश में लाखों रोजगार पैदा करते हैं, वे रत्‍न, जेवरात, इलेक्ट्रॉनिक, फार्मा वगैरह और सेवा क्षेत्र के कई उपक्रम अमेरिकी औसतन 50 फीसदी टैरिफ से हांफ रहे हैं। उन्‍हें वह मूल्‍य दूसरे बाजारों में नहीं मिलता और प्रतिस्‍पर्धा में खासकर पूर्वी एशिया के देशों से पिछड़ रहे हैं।

हमारी अर्थव्‍यवस्‍था 40 खरब डॉलर के आसपास बताई जा रही है, जो समय के साथ आबादी और बाजार में इजाफे से स्‍वाभाविक तौर पर बढ़ती जाती है। यह भी है कि हम दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था हैं और सरकारी दावे के मुताबिक, हमारे सकल घरेलू उत्‍पाद (जीडीपी) में भी बड़ी अर्थव्‍यवस्‍थाओं में सबसे तेजी दिख रही है। मौजूदा वर्ष में सरकार का अनुमान 8 प्रतिशत से ज्‍यादा वृद्धि हासिल करने का है। लेकिन हाल में अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष और विश्‍व बैंक जैसी अंतरराष्‍ट्रीय एजेंसियों ने हमारे आंकड़ों को कम विश्‍वसनीय दायरे में रखा है। अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष की हालिया रिपोर्ट में यह भी चेताया गया कि देश पर विदेश कर्ज उसके जीडीपी की सीमा को छू रहा है, जिसके साए अर्थव्‍यवस्‍था पर लंबे हो सकते हैं। इसके अलावा, डॉलर के मुकाबले रुपया 90 पार जा चुका है।

जो भी हो, सरकारी आंकड़ों पर कई जाने-माने अर्थशास्त्री भी कई शक-शुबहे जाहिर करते हैं। उसकी एक बड़ी वजह यह है कि जीडीपी वृद्धि के आंकड़े कृषि क्षेत्र और उत्‍पादन क्षेत्र तथा खासकर खाद्य वस्‍तुओं की महंगाई के आंकड़ों से बेमेल दिखते हैं। फिर, इस जीडीपी में आधे से ज्‍यादा हिस्‍सा कॉर्पोरेट की नेट वर्थ का है, जो उत्‍पादन और निवेश से नहीं जुड़े हैं। कई साल से निजी निवेश लगातार घटता ही गया है। फिर, विदेशी संस्‍थागत पूंजी में भी लगातार बिकवाली दिख रही है। मुश्किल यह भी अर्थव्‍यवस्‍था और खासकर रोजगार के मामले में सबसे ज्‍यादा हिस्‍सेदारी वाले असंगठित क्षेत्र के आंकड़े जुटाने का कोई व्‍यवस्थित तंत्र नहीं है और यह मान लिया जाता है कि कॉर्पोरेट क्षेत्र में दिखने वाली तेजी उसमें भी होगी। इसके अलावा हर दस साल में होने वाली जनगणना के टलते जाने से भी वास्‍तविक स्थितियों का पता नहीं चल पा रहा है। उसके बदले सर्वाधिक घरेलू उपभोग के आंकड़े और बहुआयामी सूचकांक से मोटा आकलन ही दे पाते हैं। हमारी प्रति व्‍यक्ति आय भी 2 लाख 63 हजार रुपये बताई जाती है, लेकिन उसमें आधा से ज्‍यादा हिस्‍सा ऊपरी एक फीसदी लोगों का है और ऊपरी 10 फीसदी आबादी की आय घटा दें, तो तकरीबन 90 फीसदी आबादी की आय सालाना 70 हजार रुपये से नीचे बैठती है। यानी दो राहे विकट हैं।

संस्‍थाओं का हाल

महज कुछेक दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट के वरिष्‍ठ न्‍यायाधीश भुइयां ने पुणे के एक कार्यक्रम में यह खुलासा कर चौंका दिया कि कॉलेजियम ने दर्ज किया कि एक न्‍यायाधीश का तबादला इलाहाबाद हाइकोर्ट में कार्यपालिका के आग्रह पर किया गया। मध्‍य प्रदेश हाइकोर्ट के उस जज महोदय का तबादला पहले छत्तीसगढ़ में हुआ था, जहां वे मुख्‍य न्‍यायाधीश बनने के लिए वरीयता क्रम में दूसरे नंबर पर होते, लेकिन इलाहाबाद बड़ी अदालत होने के नाते वे नीचे की कतार में होंगे। इसी तरह बुलंदशहर की निचली अदालत के एक न्‍यायाधीश महोदय का तबादला कथित तौर पर एक प्रतिकूल फैसले की वजह से कर दिया गया और कथित तौर पर उनकी पदावनति भी हो गई। ये हाल के मामले चिंता जगाते हैं। याद करें कि 2014 में संसद से न्‍यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका की भूमिका को लेकर विधेयक पारित हुआ था, जिसे सर्वोच्‍च अदालत ने 2015 में असंवैधानिक करार दिया था। फिर, 2016 में प्रधान न्‍यायाधीश की रोस्टर तय करने में एकपक्षीय फैसले के खिलाफ कॉलेजियम के चार वरिष्‍ठ जजों ने आजाद भारत के इतिहास में पहली दफा प्रेस कॉन्‍फ्रेंस की थी। यह अलग बात है कि बाद में उन्‍हीं जजों में एक रंजन गोगोई प्रधान न्‍यायाधीश बने तो उनकी भी आलोचना हुई।

आलोचना इसलिए भी हुई कि उन्‍होंने रिटायर होने के कुछ ही महीनों बाद राज्‍यसभा में मनोयन का सरकार का प्रस्‍ताव स्‍वीकार कर लिया। हालांकि यह पहले भी कई मामलों में हुआ या होता रहा है। खासकर इमरजेंसी के दौर में तो इसकी कई मिसालें जग जाहिर हैं। लेकिन न्‍यायपालिका की मर्यादा के सवाल लगातार उठते रहे हैं और जजों के आचरण की मर्यादाएं भी निष्‍पक्ष इंसाफ के लिए जरूरी बताई जाती रही हैं। लेकिन हाल के दौर में सत्तापक्ष या विपक्ष के लोगों के साथ न दिखने की मर्यादा बेमानी होती दिखी है।

अधिकारों का मामला

अदालती फैसलों पर भी आज जिस कदर आलोचनाएं उठ रही हैं, वह भी चिंताएं बढ़ाती हैं। आलोचनाएं पहले भी होती रही हैं, लेकिन समय-समय पर अदालतें कई प्रगतिशील फैसले देकर और संवैधानिक मूल्‍यों का नागरिक अधिकारों में विस्‍तार के लिए नई व्‍याख्‍याओं से नया इतिहास रचती रही हैं। लेकिन नागरिक अधिकारों के मामले में ऐसे विरोधाभास पहले कम देखने को मिले हैं, जो हाल के दौर में खासकर पीएमएलए और यूएपीए या ऐसे ही कानूनों में बंद लोगों के मामले में देखने को मिले हैं। हाल में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में पूर्व प्रधान न्‍यायाधीश डी.वाइ. चंद्रचूड़ ने एक सवाल के जवाब में कहा कि पांच साल बाद भी मुकदमा न शुरू होने का मतलब है कि आरोपी को फौरन जमानत दी जानी चाहिए, बेशक सशर्त, लेकिन ऐसा न करना न्‍याय के विधान के खिलाफ है। उन्‍होंने यह भी कहा कि एक जैसे मामले में दो कसौटियां नहीं तय की जा सकती, वरना नागरिक अधिकार की सारी अवधारणा ही विरोधाभासी हो उठेगी। यहां जिक्र दिल्‍ली दंगे में आरोपी जेएनयू के दो छात्रों का था, जिन्‍हें हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अलग मामला बताकर जमानत देने से मना कर दिया और एक साल बाद जमानत अर्जी डालने को कहा, जबकि उनके साथ बंद पांच लोगों को छोड़ दिया गया। ऐसे और भी मामले हैं।

यही नहीं, अदालती फैसलों पर अमल में कोताही भी परेशानी पैदा करती है। मसलन, चुनाव आयोग के एसआइआर के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद आधार कार्ड के अलावा वोटरों से दूसरे दस्‍तावेज भी मांगने के लिए नोटिस दिए जाने की खबरें पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश वगैरह से आ रही हैं। खैर, एसआइआर पर तो कई तरह के आरोप-प्रत्‍यारोप कोलाहल का रूप ले चुके हैं। ये सभी बातें नागरिक अधिकारों पर अंकुश जैसी लगने लगती हैं, जबकि संविधान यही वादा करता है कि अधिकार किसी के विवेकाधीन नहीं, बल्कि सार्वभौमिक होंगे और उनका विस्‍तार ही होगा, उन पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता।

संविधान का अनुच्‍छेद 21 हर किसी की रहने, जीने और जीविका चलाने की गारंटी देता है और हर किसी के अधिकारों का वजन एक समान तय करता है। यहां तक कि किसी दूसरे देश के व्‍यक्ति के साथ भी भेदभाव नहीं करता और उसे आश्‍वस्‍त करता है कि वह यहां पूरी स्‍वतंत्रता से जीवन बिता सकता है। इसका एक उदाहरण तो बतौर बीबीसी संवादाता अनूठी प्रतिष्‍ठा हासिल कर चुके मार्क टली साहब ही थे, जिनका हाल में दिल्‍ली में 90 साल की उम्र में निधन हुआ। ऐसे में, मौजूदा दौर में संविधान की उन गारंटियों का क्‍या हाल है, यह जानना बेहद जरूरी है, तभी हम अपने गणतंत्र को वह बना सकेंगे, जिसकी कामना हमारे मनीषियों और संविधान निर्माताओं ने की थी। यहां उन व्‍यतिक्रमों की चर्चा शायद कुछ लोगों को याद आए, जो 76 साल के इस सफर में गणतंत्र के आगे अाई हैं और जिनसे उसकी राहें बदली हैं (उसके लिए अगले पन्नों पर देखें सफरनामा )। फिर भी, मौजूदा दौर के हालात पर नजर डालनी ज्‍यादा मौजू है, ताकि देखा जा सके कि गणतंत्र की राहें कैसे सुर्खरू हों।

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