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भरोसे पर टिका आयुर्वेद का साम्राज्य

आयुर्वेद का बाजार भले ही बढ़ रहा हो मगर सरकारी उदासीनता से इसका विकास प्रभावित हो रहा है
भरोसे पर टिका आयुर्वेद का साम्राज्य

 

दुनिया के सभी देश और वहां के शासक अपनी संस्कृति और सदियों से अर्जित ज्ञान को संभाल कर रखने की कोशिश जी-जान से करते हैं। आयुर्वेद ऐसा ही ज्ञान है जो वैद्यक परंपरा के तहत हजारों वर्षों से हमारे पास संचित है, मगर अब वैश्वीकरण की होड़ और पूरी दुनिया में बज रहे एलोपैथी के डंके के कारण उसका अस्तित्व खतरे में है। लोग वैद्यकी की पढ़ाई नहीं करना चाहते। इसमें आर्थिक लाभ नहीं दिखता। सरकार हमारे देश की इस पारंपरिक  इलाज विधि के लिए अलग मंत्रालय (आयुष) तो बनाती है मगर इसका बजट नहीं बढ़ाती। एलोपैथी के विकास के लिए 30 हजार करोड़ रुपये और आयुर्वेद के लिए एक हजार करोड़। फर्क साफ समझ में आ जाता है। देश के हर शहर में एलोपैथी कॉलेज हमारी सरकारों का सपना है, मगर यह सपना आयुर्वेद के लिए नहीं देखा जाता। उदाहरण के लिए, देश में एलोपैथी के मेडिकल कॉलेजों की संख्या करीब 400 है, जिसमें एमबीबीएस के छात्रों की 50,000 से अधिक सीटें हैं। इनमें गुणवत्ता नियंत्रण का काम मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के पास है, जबकि आयुर्वेद के स्नातक स्तरीय कॉलेजों की संख्या 254 है, जिसमें कुल सीटें 11,927 हैं। इनमें से अधिकांश कॉलेज सुविधाओं के मामले में शून्य हैं। आयुष मंत्रालय गाइडलाइंस तो बनाता है, मगर हकीकत यही है कि उन पर अमल हो रहा है या नहीं यह ध्यान नहीं देता। यही वजह है कि देश में एलोपैथी दवाओं का बाजार एक लाख 30 हजार करोड़ रुपये का है, जबकि आयुर्वेदिक उत्पादों का बाजार बामुश्किल 10 हजार करोड़ रुपये का। इसका भी बड़ा हिस्सा दरअसल, सौंदर्य प्रसाधन और जीवनशैली से जुड़े उत्पादों का है।

जहां तक आयुर्वेद से गंभीर रोगों के इलाज का सवाल है, एक बहुत बड़ा भ्रम यह फैलाया जाता है कि इसके लिए एलोपैथी ही कामयाब चिकित्सा पद्धति है जबकि हकीकत यह है कि सभी तरह की बीमारियों के इलाज में आयुर्वेद एक कारगर पद्धति है। इस संवाददाता ने एलोपैथी के कई चिकित्सकों को भी पतंजलि की दुकान में आयुर्वेदिक दवाएं खरीदते देखे हैं। महर्षि आयुर्वेद कंपनी से जुड़े वैद्य अच्युत कुमार त्रिपाठी कहते हैं कि जीवनशैली से जुड़े रोगों के उपचार में आयुर्वेद का कोई मुकाबला ही नहीं है। शतावरी, अश्वगंधा, पुष्करमूल, अर्जुन, भूम्यमालकी, कुटकी, पुनर्नवा, सदाबहार जैसे औषधीय गुणों वाले पौधे और तीन फलों के मेल से बनी त्रिफला आदि औषधियां वैद्यों की सलाह से ली जा जाएं तो गंभीर रोगों का भी निदान किया जा सकता है।

तमाम नकारात्मक बातों के अलावा अगर आयुर्वेद हमारे देश में कायम है और बढ़ भी रहा है तो इसलिए कि लोग अब भी इस पर भरोसा करते हैं। अखिल भारतीय आयुर्वेद सम्मेलन के अध्यक्ष और दिल्ली के जाने-माने वैद्य देवेंद्र त्रिगुणा कहते हैं, चंद लोगों के व्यक्तिगत प्रयासों से आयुर्वेद न सिर्फ कायम है बल्कि एलोपैथी से लोहा भी ले रहा है। ऐसे लोगों में वह महर्षि महेश योगी का नाम लेते हैं जिन्होंने आधुनिक काल में आयुर्वेद को पूरी दुनिया में पहचान दिलाई। इसी कड़ी में वह बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर तथा केरल की आध्यात्मिक गुरु माता अमृतानंदमयी का भी नाम लेते हैं जिन्होंने आयुर्वेद को हर गली-चौराहे तक पहुंचाने में कामयाबी हासिल कर ली है। उनका कहना है कि इन तीनों ही लोगों ने अपनी-अपनी संस्था के जरिये देश में अत्याधुनिक आयुर्वेदिक कॉलेज स्थापित किए हैं। उच्च प्रौद्योगिकी से लैस इन कॉलेजों की ख्याति देश ही नहीं, विदेशों में भी है और वहां से भी छात्र यहां अध्ययन के लिए आते हैं। यही नहीं, इनकी संस्थाएं जो दवाएं बना रही हैं वह अत्याधुनिक मशीनों के जरिये और उच्च तकनीक से लैस प्रयोगशालाओं में जिसके कारण यह दवाएं किसी भी बड़ी कंपनी के टक्कर की होती हैं। डॉ. त्रिगुणा कहते हैं कि सरकार के स्तर पर देखा जाए तो रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए बेहतर काम किया है और सभी रेल अस्पतालों में आयुष केंद्र खोलने के निर्देश दिए हैं। ईएसआई अस्पतालों में भी इसके लिए अलग केंद्र हैं मगर वहां इनकी हालत सुधारने की जरूरत है।

आयुष मंत्रालय के सचिव अजित शरण आउटलुक से बातचीत में यह तो मानते हैं कि मंत्रालय का बजट नहीं बढ़ा मगर यह भी कहते हैं कि उपलद्ब्रध पैसे में ही सर्वश्रेष्ठ कार्य करने का प्रयास किया जा रहा है। यह पूछे जाने पर कि मंत्रालय अब आयुर्वेदिक दवाओं के क्लिनिकल ट्रायल की बात कर रहा है मगर इसके लिए जितनी सुविधाओं की जरूरत है क्या वह देश में उपलब्‍ध है, शरण ने कहा कि दरअसल यह फैसला आयुर्वेद के प्रति लोगों के विश्वास को बढ़ाने के लिए लिया गया है। अभी हो यह रहा है कि अखबारों में भ्रामक विज्ञापन देकर आयुर्वेदिक दवाओं से कद बढ़ाने, गंभीरतम बीमारियों का इलाज करने या ऐसे ही तमाम दावे किए जाते हैं जबकि हकीकत में ऐसा होना संभव नहीं है। जाहिर है कि इससे आयुर्वेद के प्रति लोगों का भरोसा डगमगाता है। इसलिए यह तय किया गया है कि अब नई दवाओं को क्लिनिकल ट्रायल के बाद ही मंजूरी दी जाएगी। रही बात इसके लिए जरूरत सुविधाओं की तो अभी मंत्रालय इसका आकलन कर रहा है और जरूरी दिशानिर्देश कंपनियों, चिकित्सकों, शोधार्थियों से बात कर तैयार किए जाएंगे। आयुर्वेद को लेकर एक अन्य समस्या दवाओं की कमी की है। इस बारे में आयुष सचिव ने कहा कि दअसल राज्यों में जो आयुष केंद्र खोले गए हैं उनमें दवाओं की उपलब्‍धता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। आयुष मंत्रालय दवा का पैसा राज्यों को दे देता है और राज्य अपने स्तर पर दवा खरीद कर उसकी आपूर्ति करते हैं। अगर किसी राज्य में दवा की आपूर्ति पर्याप्त नहीं है तो इस बारे में राज्य सरकार को ध्यान देना चाहिए।

दिल्ली के मूलचंद अस्पताल के आयुर्वेद विभाग के अध्यक्ष डॉ. श्रीविशाल त्रिपाठी कहते हैं कि देश में दशकों से ऐसी दर्जनों कंपनियां हैं जो आयुर्वेदिक दवाएं बनाती रही हैं। इनमें से अधिकांश दक्षिण भारत में हैं। इसके बावजूद कमी इस बात की थी कि ये कंपनियां आयुर्वेद में वर्णित सभी दवाएं नहीं बनाती थीं इसलिए भी दवाओं की कमी रहती थी। अब बाबा रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद में इस कमी को दूर किया है और यह कंपनी आयुर्वेद से जुड़ी तकरीबन हर दवा बना रही है। इसके बावजूद खास बात यह है कि पतंजलि के उत्पादों में आयुर्वेद की दवाओं की हिस्सेदारी महज 10 फीसदी ही है। बाकी सारे उत्पाद जिनसे कंपनी 90 फीसदी कमाई करती है वह खाने-पीने की आम चीजें मसलन, आटा, तेल, घी, टूथपेस्ट, साबुन आदि हैं। त्रिगुणा कहते हैं कि पतंजलि के बारे में कहा जा सकता है कि यह कंपनी इनसान के सुबह जगने से लेकर रात में सोने तक काम आने वाली जरूरत की हर चीज बना रही है और इसने बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को तगड़ी चुनौती दी है। 

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