Advertisement

कमजोर होती कांग्रेस का विकल्प बनेगा तीसरा मोर्चा

उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों के लिए जब कांग्रेस कार्यकर्ताओं से आवेदन मांगे जा रहे थे तो कई सीटों के लिए आवेदन ही नहीं आए। जो आए भी उनमें ज्यादातर खानापूर्ति के लिए थे अगर टिकट मिल गया तो चुनाव लड़ जाएंगे। कुल सीटों के लिए कांग्रेस से टिकट पाने वाले गंभीर उम्मीदवारों की संख्या‍ महज सौ के आसपास है जो वास्तव में पार्टी के प्रति अपनी आस्था जताते हुए चुनाव लडऩा चाहते हैं।
कमजोर होती कांग्रेस का विकल्प बनेगा तीसरा मोर्चा

प्रदेश में ढाई दशक से सत्ता से बाहर रही कांग्रेस का यह हस्र होगा इसकी उम्मीं‍द पार्टी के शीर्ष नेताओं को भी नहीं थी। लेकिन एक राष्ट्रीय पार्टी को अपनी मौजूदगी दिखाने के लिए सभी सीटों पर उम्मी‍दवार तो खड़े ही करने हैं। ऐसे में संख्या‍ बढ़ाकर कार्यकर्ताओं की फौज बढ़ेगी यह संभव नहीं है। लेकिन 128 साल पुरानी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के सामने संकट खड़ा हो गया है कि अब पार्टी का क्या‍ भविष्य होगा?
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने भी कांग्रेस और तीसरे मोर्चे को नई रणनीति बनाने के लिए विवश कर दिया है। क्षेत्रीय दलों की बढ़ रही भूमिका और भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। हालांकि जानकार मानते हैं कि कांग्रेस में अगर सही नेतृत्व और संगठन को मजबूत करने का कोई बड़ा आधार मिल जाए तो पार्टी मजबूत हो सकती है। क्यों‍कि आज भी देश की सबसे पुरानी पार्टी के पास गांव-गांव कार्यकर्ता मौजूद हैं। लेकिन राष्ट्रीय नेतृत्व और क्षेत्रीय स्तर पर असंतुष्टि ने कार्यकर्ताओं से दूरी बना दी। एक समय था जब कांग्रेस ने साधारण कार्यकर्ताओं को भी सत्ता की शक्ति में भागीदार बनाकर अपार जनसमूह एकत्र किया। लेकिन अचानक यह क्या‍ हो गया कि कार्यकर्ता दूर होता चला गया। कभी कांग्रेस के लिए काम करने वाले महेंद्र सिंह कहते हैं कि पार्टी में एक समय कार्यकर्ताओं के दर्द को नेता समझते थे लेकिन आज नेताओं ने कार्यकर्ताओं से दूरी बना ली है। घंटो बैठे रहने के बाद नेता कार्यकर्ता की बात सुनने के लिए तैयार नहीं होते। इसलिए ऐसे राजनीतिक दल में रहने का कोई फायदा नहीं है। आज महेंद्र सिंह की आस्था कांग्रेस से है लेकिन राजनीति से दूरी बना चुके हैं।
कांग्रेस की कभी बड़ी ताकत रहे दलित, मुस्लिम मतदाता अब उससे छिटक गए हैं तो दूसरी ओर संगठन के स्तर पर भी कोई बड़ी मजबूती नहीं रह गई है। कई राज्यों में कांग्रेस के खिसकते जनाधार में सबसे बड़ा रोड़ा पार्टी नेताओं का एकजुट होना है। हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में कांग्रेस खेमे में बंटी है। ऐसे में पार्टी की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि सभी को एकजुट कैसे करे। कभी कांग्रेस के साथ रहे शरद पवार, ममता बनर्जी जैसे नेता आज अपना अलग कद बना चुके हैं। एक समय कांग्रेस के पास भागवत झा आजाद, नारायण दत्त तिवारी, जीके मूपनार, वाई. राजशेखर रेड्डी, बसंत दादा पाटिल मोहन लाल सुखाडिय़ा, जैसे नेताओं के बल पर कांग्रेस क्षेत्रीय स्तर के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत थी। लेकिन आज खेमों में बंटी कांग्रेस के पास राज्यों में कद्दावर नेता नहीं हैं।
सोनिया गांधी और राहुल गांधी के भरोसे आगे बढ़ रही पार्टी के सामने बड़ी चुनौती नए नेताओं के कद को भी बढ़ाना है। ढाई दशक से कांग्रेस उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में सत्ता का स्वाद चखने के लिए बेकरार है। यह अलग बात है कि बिहार में गठबंधन के सहारे इस समय कांग्रेस सत्ता में है लेकिन उसका खुद का वोट प्रतिशत बुरी तरह से कम हो गया है। उत्तर प्रदेश में पार्टी का प्रदर्शन लगातार कमजोर होता जा रहा है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात में कांग्रेस का संगठन कमजोर है। क्षेत्रीय स्तर पर कांग्रेस नेताओं के बीच असमहति से कार्यकर्ता दुविधा में है किसके साथ रहे किसके साथ नहीं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया और उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बीच भी नई और पुरानी पीढ़ी के नेताओं को लेकर द्ंद बना हुआ है। कांग्रेस के वरिष्ठ राहुल गांधी को कमान दिए जाने के पक्ष में नहीं है तो कई नेता राहुल को अध्यक्ष के रूप में देखना चाहते हैं। यह सही है कि देर-सबेर राहुल गांधी की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी होगी लेकिन कार्यकर्ताओं पर कितना प्रभाव पड़ेगा यह सोचने का विषय है। कांग्रेस प्रवञ्चता ज्योतिरादित्य सिधिंया पार्टी के भविष्य को लेकर आशान्वित हैं। सिधिंया कहते हैं कि सियासत में सब कुछ संभव है। आज भाजपा सîाा में है तो कल कांग्रेस होगी। लेकिन कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाने के लिए पार्टी के पास कोई फार्मूला नहीं है। आज ज्यादातर राज्य कांग्रेसी सत्ता से दूर होते जा रहे हैं। क्षेत्रीय स्तर के दलों की मजबूत होती स्थिति ने कांग्रेस को और भी कमजोर किया है।
दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी अपनी मौजूदगी बढ़ती जा रही है। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि क्या‍ तीसरा मोर्चा कांग्रेस और भाजपा का विकल्प बनकर राष्ट्रीय स्तर पर उभरेगा। लेकिन जानकार इसको लेकर संशय ही बताते हैं। क्यों‍कि तीसरे मोर्च के नेताओं की अपनी-अपनी ख्वा‍हिश है। तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी का अपना अलग राग है तो बिहार के मुख्य‍मंत्री नीतीश कुमार का अलग। तीसरे मोर्चे का नेतृत्व कौन करेगा इसको लेकर भी संशय ही बना हुआ है। बिहार विधानसभा चुनाव से पूर्व तीसरे मोर्चे को लेकर माहौल बनाने की पुरजोर कोशिश हुई और समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में गठन भी हो गया। लेकिन चुनाव आते-आते यह मोर्चा बिखर गया और राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड ने कांग्रेस को साथ लेकर विधानसभा चुनाव लड़ा। जनता दल यूनाइटेड के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव तीसरे मोर्चे की सियासत को लेकर आश्वस्त भी थे। उस दौरान उन्होने तीसरे मोर्चे से जोडऩे के लिए कई राज्यों का दौरा कर क्षेत्रीय दलों को एकजुट करने की कोशिश भी लेकिन यादव की यह कोशिश भी बेकार हो गई। तीसरे मोर्चे के भविष्य के बारे में पूछे जाने पर शरद यादव आउटलुक से कहते हैं कि यह तभी संभव है जब सभी धर्मनिरपेक्ष दल एकजुट हों। यादव सभी धर्मनिरपेक्ष दलों की एकजुटता को लेकर शंका भी जताते हैं। शरद यादव के मुताबिक सभी दलों का अपना एजेंडा है इसलिए सबको एक साथ लेकर चल पाना मुश्किल हो जाता है। क्षेत्रीय दलों की मजबूती और अपने-अपने एजेंडे के कारण एक साथ एक मंच पर तीसरा मोर्चा कभी खड़ा नहीं दिखता। एकीकृत जनता दल बनाने की बात कई बार चर्चा में आई लेकिन आगे नहीं बढ़ सकी। इसलिए दक्षिण से लेकर पूरब की सियासत में क्षेत्रीय दलों का अपना-अपना एजेंडा हो गया। समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव को तीसरे मोर्चे के अगुवा के तौर पर कई बार पेश भी किया गया लेकिन सबकी निगाहें प्रधानमंत्री पद के उम्मी‍दवार पर आकर टिक गई। यही तीसरे मोर्चे के बिखरने का सबसे बड़ा कारण बन गया। लेकिन तीसरे मोर्चे की संभावना इसलिए भी मजबूत होती दिख रही है कि क्षेत्रीय दल कहीं न कहीं राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता से लडऩे के लिए जरूर एकजुट होंगे और यही तीसरे मोर्चे की ताकत होगी।

Advertisement
Advertisement
Advertisement
  Close Ad