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विविध नृत्यों की मधुर धूमधाम

कथक नृत्य में लखनऊ घराने की सुचर्चित नृत्यांगना सुश्री आसावरी पवार का एकल नृत्य और सृजनशीलता नृत्य...
विविध नृत्यों की मधुर धूमधाम

कथक नृत्य में लखनऊ घराने की सुचर्चित नृत्यांगना सुश्री आसावरी पवार का एकल नृत्य और सृजनशीलता नृत्य सरंचनाओं को करने में उनका नाम एक कुशल नृत्यांगना के रूप में दर्ज है। तकरीबन तीन दशक से नृत्य में सक्रिय आसावरी ने देश और विदेश खासकर इंग्लैण्ड में अपने नृत्य की सरस प्रस्तुतियां दी हैं। उनके नाच में लखनऊ की नजाकत भरी अदायिगी की रोमांचक झलक खूब दिखती है आसावरी के पिता पं प्रताप पवार - पंडित बिरजू महाराज के गंडाबंद शादगी और एक मशहूर नृत्यकार है। कला को साधने के लिए एकाग्र चिंतन आत्मविश्वास और दृढ़ निश्चय का होना जरूरी है। इसका अनुकरण आसावरी ने गहन साधना से किया। इस समय वह स्तरीय गुरू के रूप स्थापित है और अपनी संस्था कलाशीष में बहुतेरे युवा पीढ़ी के छात्रों को लगन से प्रशिक्षा प्रदान कर रही है। कथक नृत्य के प्रचाार - प्रसार और लोकप्रिय करने के लिए वे नृत्य कार्यक्रमों का आयोजन भी करती रहती हैं। हाल ही कथक केन्द्र के सभागार में कलाशीष द्वारा कथक के अंग विभिन्न रंगों के संग नृत्य संरचना की मनोरम प्रस्तुति हुई। मंगला चरण के रूप में कार्यक्रम का शुभारंभ भक्तिभाव में श्री गणेश की स्तुति से हुआ, उसे आसावरी और उनके रिपेटरी के छात्रों ने भावविभोर होकर तन्मयता से प्रस्तुत किया। उसके उपरांत गुरू विश्व प्रकाश द्वारा ताल भपताल में निबद्ध बंदिश - बाजत मृदंग की प्रस्तुति भी कलात्मक दृष्टि से प्रभावी थी। महत्वपूर्ण है इस समारोह में कथक, ओडिसी भरतनाट्टयम नृत्य शैलियों के फ्युजन का सार्थक समावेश किया गया। रचना “न आदि न अन्त, है उसका वह सबका न इनका उनका” में रचनाकार की संकल्पना के भावार्थ को मिलेजुले नृत्य प्रदर्शन के जरिए दर्शाने में नृत्यांगनाओं अच्छी चेष्टा नजर आई। आसावरी और उनके सहयोगी कलाकारों ने तीन ताल में निबद्ध शिव -शिव स्तुति को नृत्य में भावनामयता के साथ प्रस्तुत किया। द्रुत तीन ताल पर शिव के तांडव की प्रस्तुति भी रोमांचकता से भरी थी। सुर ताल - लय में सरंचित मनोहरी कृति - कृष्णा नी बेगाने और बालचन्द्र कथा की कलामंडल विष्णु प्रिया द्वारा भरतनाट्टयम और असावरी पवार का कथक की जुगलबंदी में प्रस्तुति कलात्मक और रंजक थी। अगली प्रस्तुति महादेवी दुर्गा की अराधना पर आधारित थी। जनमानस की रक्षा करने में मां दुर्गा के द्वारा अधर्म का नाश और उसपर धर्म कि विजय का जो शंखनाद फूंका गया उसमें दुर्गा का शौर्य रूप कथक न्रत्य में चित्रित हुआ इस प्रस्तुति में आसावरी और उनके छात्रों ने प्रस्तुति में खूब रंग भरे । इस प्रस्तुति में हिन्दुस्तानी और कर्नाटक संगीत के तत्वों का सुन्दर समन्वय था। कथक की भरतनाट्टयम और ओड़िसी नृत्य के साथ जुगल बंदी में लयात्मक गति के चलन में सुन्दर तालमेल था। आखिर में शास्त्रीय और लोकधर्मी स्वरों और ताल में सजी घूमर नृत्य की कथक में प्रस्तुति भी रोमांचक और दर्शनीय थी।

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