Advertisement
12 जून 2023 · JUN 12 , 2023

आवरण कथा/नजरिया: भाजपा को कोई फर्क नहीं

कर्नाटक विजय से कांग्रेस को आगामी राज्य चुनावों या 2024 के लोकसभा चुनाव में कोई खास फायदा नहीं
कर्नाटक हार से मोदी की लोकप्रियता पर असर नहीं पड़ेगा

कर्नाटक में कांग्रेस की शानदार जीत और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की बुरी तरह हार से न सिर्फ इन दोनों पार्टियों को अपनी रणनीतियों पर नए सिरे से विचार करना होगा, बल्कि हर गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा पार्टी को थोड़ा ठहरकर इन नतीजों पर मंथन करना होगा। बेशक, कांग्रेस के लिए भी कर्नाटक के नतीजे उतने ही अचरज भरे थे, जिस कदर भाजपा के लिए झटका थे। यूं तो मुकाबले में तीन पार्टियां थीं, जिसमें सबसे बड़ी हार जेडी-एस (जनता दल सेकुलर) की हुई, जो त्रिशंकु नतीजों के हालत में किंगमेकर बनने का ख्वाब देख रही थी। कर्नाटक चुनावों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला हुआ, यानी दो पार्टियों की टक्कर के पुराने अच्छे विचार का दौर लौट रहा है।

इस चुनावी नतीजे को दो फैक्टर गौरतलब बनाते हैं। कांग्रेस ने ग्रामीण वोटों और जेडी-एस के जनाधार में बड़ी सेंध लगाकर अपनी वोट हिस्सेदारी और सीटों में काफी इजाफा किया है। जेडी-एस को शीर्ष नेतृत्व के बिना हारे हुए की तरह देखा गया। इसलिए कांग्रेस के उम्मीदवारों की जीत का अंतर काफी अच्छा दिखता है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार करीब एक लाख वोटों के अंतर से जीते। दूसरा दिलचस्प पहलू यह है कि राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ जिन 21 विधानसभा क्षेत्रों से गुजरी, उनमें कांग्रेस 16 जीत गई, जबकि 2018 में पांच ही जीत पाई थी। जाहिर है, कांग्रेस ने इसका धड़ल्ले से जिक्र किया और उनका कद एक मुश्त ऊंचा दिखाने में उसे मदद मिली। लगता है कि कांग्रेस में नेतृत्व का सवाल हल हो गया है।

बड़ा सवाल यह है कि भाजपा के खिलाफ गठजोड़ बनाने की कवायद में क्या गैर-कांग्रेस पार्टियां राहुल गांधी को नेता मानेंगी? 2023 में अगले चरण में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम के चुनाव होने वाले हैं। फिर, 2024 में लोकसभा चुनावों के अलावा अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, ओडीशा, आंध्र प्रदेश, लक्षद्वीप और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव तय हैं। इन सभी राज्यों में कांग्रेस की मजबूत मौजूदगी हुआ करती थी जबकि भाजपा अपना पैर जमाने की कोशिश में ही जुटी थी। आज भी राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है।

गौरतलब यह है कि लोकसभा चुनाव देश के सभी 28 राज्यों और 8 केंद्रशासित प्रदेशों में लड़ा जाएगा और सभी कर्नाटक जैसे नहीं हैं। अधिकांश राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में कांग्रेस लगभग बेमानी हो चुकी है। करीब 15 राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा है। उनमें कोई भी भाजपा के खिलाफ लड़ाई में कांग्रेस के लिए सीट छोड़ने या उसे छतरी पार्टी मंजूर करने को तैयार नहीं होंगी। त्रिशंकु संसद की हालत में सभी ‘किंगमेकर’ बनना चाहेंगी।

हाल के राज्य चुनावों का दूसरा प्रमुख पहलू यह है कि पार्टियों ने मतदाताओं से पूरे न किए जा सकने वाले वादों और खैरात की बरसात कर दी। पंजाब में आम आदमी पार्टी (आप) और हिमाचल प्रदेश तथा कर्नाटक में कांग्रेस की जीत का आंशिक श्रेय वोटरों से ‘तारे तोड़ लाने’ जैसे वादों को दिया जा सकता है।

कर्नाटक में कांग्रेस के चुनावी वादों में हर महिला परिवार मुखिया को दो हजार रुपये हर महीना, हर बेरोजगार डिप्लोमाधारी को प्रति माह 1,500 रुपये तथा डिग्रीधारी को 3,000 रुपये मुहैया कराना शामिल है। इसके अलावा राज्य की बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा सुविधा, हर परिवार को 200 यूनिट बिजली मुफ्त, गहरे समुद्र में मछली पकड़ने के लिए हर साल 500 लीटर कर-मुक्त डीजल और मछली न मिलने वाले महीनों में हर मछुआरे को 6,000 रुपये के साथ तीन रुपये किलो में गोबर मुहैया कराने के वादे भी कांग्रेस के चुनाव घोषणा-पत्र में हैं। अगर इन सभी वादों पर पूरी गंभीरता से अमल किया गया

तो राज्य के खजाने पर हर साल 62,000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। आप पंजाब में अपने वादों पर खरा उतरने की जद्दोजहद में लगी है और कांग्रेस कर्नाटक में घाटे के बजट के बिना अपने वादे पूरा नहीं कर सकती है।

लोकसभा चुनावों के दौरान देश भर के लिए ऐसे वादे नहीं किए जा सकते। सिर्फ एक बार इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया और बड़ी जीत हासिल की थी। भाजपा ने अपने राम मंदिर निर्माण, अनुच्छेद 370 हटाने और तीन तलाक पर बंदिश लगाने का वादा पूरा कर दिया है। इस तरह उसने अपना एक मजबूत जनाधार बनाया है।

इसलिए कर्नाटक विजय से कांग्रेस को आगामी राज्य चुनावों या 2024 के लोकसभा चुनाव में कोई खास फायदा नहीं मिलने वाला है। कांग्रेस को अगुआ पार्टी या राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी का मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानने में क्षेत्रीय पार्टियों की अनिच्छा, भाजपा के खिलाफ मुद्दों का सर्वथा अभाव, और भाजपा के कद्दावर नेतृत्व के बरक्स कांग्रेस का बौना नेतृत्व जैसी कुछ वजहों से 2024 में भाजपा को बड़ी बढ़त मिल जाएगी।

(लेखक आर्गेनाइजरके पूर्व संपादक और वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं। वे भाजपा से जुड़े हैं)

Advertisement
Advertisement
Advertisement