सबसे पुराने और टेस्ट के प्रतिष्ठित युद्ध ‘एशेज’ का समापन सिडनी के मैदान पर जिस तरह हुआ, उसने विश्व क्रिकेट को आत्ममंथन की राह पर खड़ा कर दिया। ऑस्ट्रेलिया की धरती पर खेली गई यह शृंखला केवल दो देशों की जंग नहीं, बल्कि दो अलग-अलग नजरियों का टकराव था। एक तरफ इंग्लैंड का ‘बैजबॉल’ था, जो बेखौफ अंदाज और आक्रामकता की वकालत करता है, तो दूसरी तरफ ऑस्ट्रेलिया का वह अनुशासन और पारंपरिक टेस्ट क्रिकेट था, जिसने सदियों इस खेल की गरिमा बनाए रखी। सिडनी टेस्ट में इंग्लैंड की हार के साथ न केवल ऑस्ट्रेलिया ने श्रृंखला अपने नाम की, बल्कि उस प्रयोग पर भी विराम लगा दिया जिसे ब्रेंडन मैकुलम और बेन स्टोक्स ने पिछले कुछ सालों में हवा दी थी।
इस शृंखला के आंकड़े इंग्लैंड की दुर्दशा की कहानी बयान करते हैं। ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाजों ने जहां क्रीज पर घंटों बिताकर रन बटोरे, वहीं इंग्लैंड के बल्लेबाज आया राम, गया राम की तर्ज पर पवेलियन लौटते रहे। स्टीव स्मिथ, एलेक्स कैरी, मार्नस लाबुशेन की सधी संभली पारियां हों या ट्रैविस हेड का चटक अंदाज। हेड को एक अपवाद माना जाए तो कंगारुओं ने दिखा दिया कि टेस्ट क्रिकेट में रक्षात्मक खेल ही सबसे बड़ा आक्रमण होता है। सीरीज में सबसे ज्यादा 629 रन ट्रैविस हेड ने बनाए, जिनका औसत 63 का रहा। इंग्लैंड की तरफ से जो रूट ने 400 रन जरूर बनाए लेकिन अन्य कोई बल्लेबाज ऑस्ट्रेलियाई पेस बैटरी को जवाब नहीं दे सका। गेंदबाजी की बात करें तो मिशेल स्टार्क ने पूरी श्रृंखला में अपना दबदबा बनाए रखा। हेजलवुड और कमिंस की अनुपस्थिति में भी ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों ने सटीक लाइन-लेंथ से इंग्लैंड के बैजबॉल की कमर तोड़ दी। प्लेयर ऑफ द सीरीज का खिताब जीतने वाले स्टार्क ने 20 की औसत से 31 विकेट अपने नाम किए।
बैजबॉल असल में ऐसा विचार था जिसका उद्देश्य टेस्ट क्रिकेट को रोमांचक बनाना था। ब्रेंडन मैकुलम और बेन स्टोक्स ने खिलाड़ियों को यह आजादी दी कि वे परिणाम की चिंता किए बिना खेलें। शुरुआती दौर में यह सफल भी रहा, लेकिन ऑस्ट्रेलिया जैसी मजबूत टीम के खिलाफ यह रणनीति आत्मघाती साबित हुई। बैजबॉल की सबसे बड़ी खामी यह रही कि इसने खिलाड़ियों को परिस्थितियों के अनुसार ढलने से रोका। जब पिच पर गेंद घूम रही थी या तेज गेंदबाजों को मदद मिल रही थी, तब भी इंग्लैंड के बल्लेबाज गैर-जरूरी शॉट खेलकर आउट हुए। विश्लेषण बताते हैं कि इंग्लैंड ने इस श्रृंखला में अपने साठ प्रतिशत विकेट आक्रामक शॉट खेलने के प्रयास में खोए। यह आंकड़ा दर्शाता है कि टीम के पास कोई ‘प्लान बी’ नहीं था। ऑस्ट्रेलिया ने इस कमजोरी का भरपूर फायदा उठाया और अपनी फील्डिंग को इस तरह से सजाया कि इंग्लैंड के बल्लेबाज उनके जाल में फंसते चले गए। ऑस्ट्रेलिया का दबदबा इतना ज्यादा था कि श्रृंखला के किसी भी मोड़ पर ऐसा नहीं लगा कि इंग्लैंड वापसी कर सकता है। पर्थ, ब्रिसबेन और एडिलेड में मिली करारी हार ने पहले ही इंग्लैंड का मनोबल तोड़ दिया था। मेलबर्न में इंग्लैंड ने थोड़ी वापसी की भी, लेकिन सिडनी में फिर बुरी तरह विफल होकर 1-4 से श्रृंखला गंवा दी। इसने कई सवालों को जन्म दिया।
सवाल उठा आगे क्या होगा? क्या इंग्लैंड बैजबॉल को पूरी तरह त्याग देगा या कुछ बदलाव करेगा? ईसीबी के गलियारों में समीक्षा का दौर शुरू हो गया है। कोच ब्रेंडन मैकुलम के पद पर भी खतरा मंडरा रहा है क्योंकि टीम के प्रदर्शन में निरंतरता की कमी दिखी है। इंग्लैंड को काउंटी क्रिकेट संरचना पर ध्यान देना होगा ताकि ऐसे बल्लेबाज तैयार हों जो लंबी पारी खेल सकें। टेस्ट क्रिकेट के भविष्य के लिए जरूरी है कि टीमें खेल की मर्यादा को समझें। रोमांच के नाम पर खेल के मूल सिद्धांतों से समझौता करना भारी पड़ता है, जैसा कि इंग्लैंड के साथ हुआ।
ऑस्ट्रेलिया की जीत ने विश्व टेस्ट चैंपियनशिप की अंक तालिका में भी उन्हें शीर्ष पर पहुंचा दिया है। उनकी टीम में युवा और अनुभवी खिलाड़ियों का अच्छा मिश्रण है। ट्रेविस हेड जैसे खिलाड़ियों ने दिखाया कि आक्रामकता और समझदारी का तालमेल कैसे बिठाया जाता है। दूसरी तरफ इंग्लैंड के खेमे में मायूसी है। बेन स्टोक्स की कप्तानी पर सवाल उठने लगे हैं क्योंकि वे अपनी जिद के कारण टीम को मुश्किल में डालते रहे हैं।
बैजबॉल खूबसूरत सपना था जो हकीकत में बिखर गया। टेस्ट क्रिकेट को बचाने के लिए आक्रामकता जरूरी है, लेकिन अनुशासन की कीमत पर नहीं। इंग्लैंड को अब नए सिरे से शुरुआत कर अपनी गलतियों से सीख लेनी होगी। बैजबॉल का अंत निश्चित रूप से नए युग की शुरुआत है, जहां शायद ज्यादा संतुलित क्रिकेट देखने को मिले।
भविष्य में जब भी एशेज का जिक्र होगा, 2025-26 की यह श्रृंखला बैजबॉल के पतन और ऑस्ट्रेलिया के प्रभाव के रूप में याद की जाएगी। क्रिकेट का असली रोमांच उसकी अनिश्चितता में है, लेकिन यह नियमों और अनुशासन के दायरे में ही अच्छी लगती है। इंग्लैंड की हार ने बताया कि टेस्ट क्रिकेट अपनी पुरानी गरिमा के साथ आगे बढ़ता रहेगा। इसमें वही टीमें सफल होंगी जो समय की मांग समझेंगी और खुद को हर परिस्थिति में ढाल सकेंगी।