Advertisement
16 फरवरी 2026 · FEB 16 , 2026

बैडमिंटनः संघर्ष और साहस की सफलता

अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन में साइना का उदय धमाके की तरह था, 2006 कॉमनवेल्थ खेलों में जीते कांस्य से दुनिया को पता चला नई स्टार का आगाज
साइना नेहवाल

भारतीय बैडमिंटन के इतिहास को अगर दो हिस्सों में बांटा जाए, तो विभाजक रेखा का नाम साइना नेहवाल होगा। एक दौर में भारतीय खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय कोर्ट पर केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराने जाते थे। फिर वह दौर आया जब दुनिया के दिग्गज खिलाड़ी भारत की चुनौती से खौफ खाने लगे। इसी खौफ का नाम साइना नेहवाल है। हाल ही में उन्होंने बैडमिंटन के अपने करियर को विराम देने का निर्णय लिया। यह विराम केवल एक खिलाड़ी का कोर्ट से हटना नहीं, बल्कि उस जिद का थम जाना भी है, जिसने चीनी दीवार को ढहाने का साहस किया था। घुटने की तकलीफों के बीच लिया गया यह फैसला उस ईमानदारी का प्रतीक है, जिसे साइना ने हमेशा अपने खेल से ऊपर रखा। साइना का मानना है कि अगर वह खेल में अपना शत प्रतिशत नहीं दे सकतीं, तो वह केवल नाम के लिए कोर्ट पर नहीं उतरने का कोई मतलब नहीं है।

बैडमिंटन की दुनिया में भारत का परचम ऊंचा रखने की यह कहानी हरियाणा के छोटे से घर से शुरू हुई थी। साइना नेहवाल की मां उषा रानी नेहवाल राज्य स्तरीय बैडमिंटन खिलाड़ी थीं, जिन्होंने हरियाणा का प्रतिनिधित्व किया था। वे हमेशा से राष्ट्रीय चैंपियन बनना चाहती थीं। साइना के पिता भी विश्वविद्यालय स्तर के बैडमिंटन खिलाड़ी थे। माता और पिता दोनों बैडमिंटन के खिलाड़ी रहे, इसलिए खेल उनके खून में था। पिता की नौकरी के सिलसिले में उनका परिवार जब हैदराबाद पहुंचा, तो किसी ने नहीं सोचा था कि हरियाणा से दक्षिण पहुंची यह लड़की भारतीय बैडमिंटन का चेहरा बदल देगी। उनके पिता हरवीर सिंह ने अपनी बेटी के सपने के लिए अपनी सारी जमा-पूंजी लगा दी। वह ऐसा दौर था जब स्कूल की पढ़ाई और घंटों कड़ा अभ्यास उनके जीवन का हिस्सा बन गया था। यह वह समय था जब साइना ने अनुशासन का पाठ सीखा। इसी अनुशासन की बदौलत वे विश्व के शिखर पर पहुंची। 2004 में साइना ने बैडमिंटन खिलाड़ी और कोच पुलेला गोपीचंद के मार्गदर्शन में खेलना शुरू किया और भारत की राष्ट्रीय बैडमिंटन चैंपियनशिप में राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त जूनियर चैंपियन बन कर बता दिया कि उनके अंदर दम है।

साइना नेहवाल

अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन में साइना का उदय किसी धमाके से कम नहीं था। वर्ष 2006 कॉमनवेल्थ खेलों के टीम इवेंट में जीते कांस्य से दुनिया को पता चला कि एक नई स्टार का जन्म हो चुका है। इसके बाद उन्होंने 2008 के यूथ कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीता, जिसे जीतने का सपना बड़े खिलाड़ी देखते थे। वह जीत केवल एक पदक नहीं थी, बल्कि भारतीय बैडमिंटन के आत्मविश्वास की भी बहाली थी। इसके बाद 2008 के बीजिंग ओलंपिक में जब वे क्वार्टर फाइनल तक पहुंचीं, तो देश की उम्मीदें उनसे जुड़ गईं। हालांकि उस समय वह पदक से कुछ कदम दूर रह गईं, लेकिन उस हार ने उनके भीतर वह भूख पैदा की जिसने 2012 के लंदन ओलंपिक में इतिहास रच दिया। लंदन की वह जीत भारतीय बैडमिंटन के लिए मील का पत्थर साबित हुई, जहां साइना ने कांस्य पदक जीतकर हर भारतीय का मस्तक ऊंचा कर दिया। 2015 और 2017 के विश्व चैंपियनशिप में उन्होंने क्रमशः रजत और कांस्य पदक अपने नाम किया। इतना ही नहीं, साइना के नाम तीन कॉमनवेल्थ गोल्ड मेडल भी जुड़े हुए हैं।

आंकड़ों की बात करें, तो साइना का करियर किसी भी एथलीट के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकता है। उनके नाम 24 अंतरराष्ट्रीय खिताब दर्ज हैं, जिनमें 10 सुपर सीरीज खिताब उनके दबदबे की कहानी कहते हैं। वे पहली भारतीय महिला और प्रकाश पादुकोण के बाद केवल दूसरी भारतीय खिलाड़ी बनीं जो विश्व रैंकिंग में नंबर एक के पायदान पर पहुंचीं। यह उपलब्धि इसलिए बड़ी थी क्योंकि उस समय महिला बैडमिंटन पर पूरी तरह चीन का कब्जा था। वांग यिहान और वांग शिक्सियान जैसी चीनी खिलाड़ियों को हराना उस समय नामुमकिन माना जाता था, लेकिन साइना ने अपनी शारीरिक क्षमता और मानसिक दृढ़ता से इस धारणा को बदल दिया। उन्होंने सिद्ध किया कि अगर तकनीक और स्टेमिना सही हो, तो किसी भी वर्चस्व को चुनौती दी जा सकती है।

साइना की खेल शैली में एक खास तरह का आक्रामक तेवर था। वह कोर्ट पर हार नहीं मानती थीं और अंतिम अंक तक लड़ने का जज्बा रखती थीं। उनकी फिटनेस एक समय पूरे विश्व में चर्चा का विषय थी। वह लंबी रैलियों में विपक्षी खिलाड़ी को थकाने में माहिर थीं। वर्ष 2010 उनके करियर का सबसे सफल साल माना जाता है, जब उन्होंने लगातार तीन अंतरराष्ट्रीय खिताब जीतकर दुनिया को चौंका दिया। इसी साल उन्होंने घरेलू मैदान पर राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर अपनी लोकप्रियता को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। भारत सरकार ने उनके योगदान को देखते हुए उन्हें खेल रत्न, पद्म भूषण और पद्म श्री जैसे सम्मानों से नवाजा, जो उनके उत्कृष्ट खेल पर मुहर लगाने जैसा है।

एक खिलाड़ी की सफलता केवल उसके पदकों से नहीं, बल्कि उसके द्वारा छोड़ी गई विरासत से मापी जाती है। साइना ने भारत में बैडमिंटन को नया जीवन दिया। आज अगर पीवी सिंधु, लक्ष्य सेन और सात्विकसाईराज जैसे खिलाड़ी विश्व स्तर पर चमक रहे हैं, तो उसका श्रेय साइना द्वारा तैयार किए गए रास्ते को भी जाता है। उन्होंने भारतीय अभिभावकों को यह भरोसा दिलाया कि बैडमिंटन में भी करियर बनाया जा सकता है। उनके कारण ही देश में बैडमिंटन लीग शुरू हुई और बड़े प्रायोजक इस खेल की तरफ आकर्षित हुए। साइना ने एक व्यक्तिगत खेल को सामूहिक जुनून में बदल दिया।

करियर के अंतिम दौर में बहुत सी चोट ने उनकी राह मुश्किल कर दी थी। घुटने और कमर की तकलीफों ने उनकी गति पर असर डाला, लेकिन उनका लड़ने का माद्दा कम नहीं हुआ। उन्होंने कई बार सर्जरी के बाद वापसी की और 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में टीम इवेंट में स्वर्ण और एकल में रजत पदक जीतकर अपनी काबिलियत साबित की। जितना संभव हो सका, वे कोर्ट में लड़ती रहीं। आज जब वे खेल को अलविदा कह चुकी हैं, तो उनके पीछे सफलता की एक लंबी कतार है। साइना नेहवाल का नाम हमेशा उस खिलाड़ी के रूप में याद किया जाएगा, जिसने भारतीय बैडमिंटन को बड़े सपने देखना और उन्हें पूरा करना सिखाया। उनका सफर साहस, संघर्ष और सफलता की ऐसी मिसाल है जो आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।

 

Advertisement
Advertisement
Advertisement