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आवरण कथा/सौंदर्य स्पर्धाएं: बदला नजरिया, घटा आकर्षण

पहले गदराया बदन और गोरा रंग सुंदरता का पैमाना हुआ करता था, आज हर रंग और हर तरह के शरीर को सुंदर माना जाने लगा है
सुंदरता की बार्बी डॉल वाली छवि अब टूट गई है

सुष्मिता सेन, ऐश्वर्या राय, डायना हेडन, युक्ता मुखी, प्रियंका चोपड़ा, लारा दत्ता- 1994 से 2000 तक छह वर्षों में भारत की सुंदरियों ने मिस वर्ल्ड से लेकर मिस यूनिवर्स तक छह अंतरराष्ट्रीय सौंदर्य प्रतियोगिताएं जीतीं। दीया मिर्जा मिस एशिया पेसिफिक भी बनीं। उसके बाद डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय का सूनापन तब दूर हुआ जब 2017 में मानुषी छिल्लर ने मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता जीती और अब 21 वर्षों के बाद हरनाज कौर संधू मिस यूनिवर्स बनी हैं। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि 1990 के दशक जैसा क्रेज अब युवतियों में नहीं दिखता है। तो क्या सुंदरता की अवधारणा बदल गई है? भारत में अनेक महिलाओं की सौंदर्य प्रतियोगिताओं में रुचि नहीं रह गई है, क्योंकि पहले की तरह अब ब्यूटी क्वीन बनने का मतलब बॉलीवुड में नाम कमाने की गारंटी नहीं है। कई सुंदरियों को बॉलीवुड में कदम रखने के बाद लौटना पड़ा। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भले ही भारतीय लड़कियां प्रतियोगिता जीत रही हों, लेकिन आज की युवतियों में लंबाई, कद, वजन या रंग के लिहाज से अंतरराष्ट्रीय सौंदर्य मानकों पर खरा उतरने की कोई चाहत नहीं दिखती है।

भारत की पहली मिस यूनिवर्स सुष्मिता सेन के लिए अनुभव अलग तरह का था। वे कहती हैं, “जब भी कोई भारतीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीतता है तो मुझे यह एहसास होता है कि उन्होंने विश्व मानचित्र पर हमें दोबारा ला खड़ा किया है। आज सोशल मीडिया का इतना असर है कि हम वास्तव में बड़ा प्रभाव डालते हैं।” (देखें इंटरव्यू)

लेकिन सौंदर्य की जो परिभाषा 1990 के दशक के मध्य में थी, वह अब काफी बदल गई है। सौंदर्य का बोध वास्तविक हो गया है। इसका श्रेय कई नारीवादी आंदोलनों को जाता है। अब सुंदरता सिर्फ पुरुषों की नजर में अच्छा दिखना नहीं रह गई है। अब सुंदर दिखने का मतलब खुद के बारे में अच्छा और सशक्त महसूस करना है। सुंदरता की बार्बी डॉल वाली छवि अब टूट गई है।

मुख्यधारा का सिनेमा भी बदला है। अब हर आकार और रंग की महिलाएं स्वीकार की जाने लगी हैं। अब मुख्यधारा की सिनेमा की अभिनेत्री होने का मतलब यह नहीं कि आपको एक निश्चित खांचे में फिट बैठना पड़ेगा। हाल ही में आउटलुक के साथ बातचीत में अभिनेत्री विद्या बालन ने कहा था, “मुझे लगा कि मैं जैसा दिखती हूं, उसे बदल नहीं सकती। उसके बाद मुझे अपना शरीर अच्छा लगने लगा। फिर लोग भी कहने लगे कि आप अपने शरीर के प्रति कितनी सहज दिखती हैं।” विद्या कहती हैं, “मेरे लिए फिट होने का मतलब ऊर्जावान और अच्छा स्वास्थ्य है। ऐसा नहीं कि मैंने अपने लिए कोई अलग स्टाइल विकसित की है, मैं अपने शरीर के प्रति सहज हूं इसलिए अपनी पसंद के कपड़े पहनती हूं। जब आप अपनी पसंद के कपड़े पहनती हैं तो वह आप पर फबता भी है।”

सुंदरता की अवधारणा लगातार बदलती रही है। पिछले सदी में गदराया बदन, गोरा रंग और खूबसूरत आंखें सुंदरता का पैमाना हुआ करता था। लेकिन आज हर रंग, हर तरह के बाल और हर तरह के शरीर को सुंदर माना जाने लगा है। मुंबई में रहने वाली लेखिका किरण मनराल कहती हैं, “अतीत में सुंदरी का पैमाना शरीर के उभार, गोरा रंग और यौन आकर्षण हुआ करते थे। शरीर के उभार से पता चलता था कि महिला अमीर है और उसे काम करने की जरूरत नहीं। गोरा रंग यह बताता था कि उसे धूप में नहीं निकलना पड़ता। आज छरहरी काया को आदर्श माना जाता है। लेकिन अगर आप पुनर्जागरण के समय की कलाकृतियां देखें तो उस समय की महिलाएं बिल्कुल विपरीत थीं।” धूप में तपा रंग भी अब स्वीकार्य है। यह बताता है कि महिला बाहर निकलती है और सक्रिय रहती है। इससे यह भी पता चलता है कि वह ऐसे वर्ग से है जो छुट्टियां मनाने उष्णकटिबंधीय देशों में जाने की कूवत रखती है।

सौंदर्य का पैमाना अक्सर पॉप संस्कृति, विज्ञापनों और फैशन इंडस्ट्री से तय होता रहा है। चाहे वह मॉडल ट्विगी की छरहरी काया हो, सिंडी क्राफर्ड का एथलेटिक स्टाइल हो, सोफिया लॉरेन उभार वाला बदन हो या बेहद गदराए शरीर वाली किम कार्दशियां हों। सुंदरता की परिभाषा हमेशा बदलती रही है।

सौंदर्य प्रतियोगिताएं आकर्षण क्यों खो रही हैं, इस पर मनराल कहती हैं, “शायद इसकी एक वजह यह है कि इन प्रतियोगिताओं में सबसे पहले महिला की सुंदरता देखी जाती है। आज की पीढ़ी को इसमें आपत्ति हो सकती है।” सौंदर्य प्रतियोगिता जीतना भारत में फिल्म इंडस्ट्री में करिअर बनाने की दिशा में पहला कदम माना जाता है। इसलिए इन प्रतियोगिताओं में उनकी रुचि हो सकती है जो फिल्म इंडस्ट्री में हाथ आजमाना चाहती हैं। मनराल के अनुसार, “उसके अलावा मुझे नहीं लगता कि आज की लड़कियां इन प्रतियोगिताओं में भाग लेना, यहां तक कि देखना भी पसंद करती हैं।”

आज की लड़कियों के लिए सौंदर्य प्रतियोगिता पुराना विचार हो गया है। उन्हें अपने आप पर भरोसा है। भले ही वह सुंदरता के खांचे में फिट बैठती हो या नहीं। वे खुद सुंदरता की परिभाषा तय कर रही हैं। इससे वे सशक्त हो रही हैं। फैशन और ब्यूटी इंडस्ट्री महिलाओं को खास तरह से दिखाना चाहती है, इसलिए वैसा दिखने का काफी दबाव होता है। लेकिन आजकल अंतरराष्ट्रीय ब्रांड की प्लस साइज मॉडल भी आने लगी हैं। यही नहीं, विकलांग फैशन मॉडल सफेद बालों में उम्र दराज मॉडल का भी चलन बढ़ रहा है। खूबसूरती के लिए उनकी त्वचा की झुर्रियां छुपाई नहीं जाती हैं। शायद कंपनियों को भी लगने लगा है कि महिलाएं अवास्तविक नहीं दिखना चाहती हैं।

एक सवाल है कि भारत की सुंदरियां मिस यूनिवर्स या मिस वर्ल्ड जैसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अक्सर नाकाम क्यों होती हैं? वे किसी अंतरराष्ट्रीय ब्रांड का वैश्विक चेहरा क्यों नहीं बन पाती हैं? 1990 के दशक और 2000 के दशक के शुरुआती वर्षों में अनेक लड़कियां ब्यूटी क्वीन बनना चाहती थीं। तब ब्यूटी क्वीन देश के लिए ब्रांड एंबेसडर होती थी। हर कोई सुष्मिता सेन की तरह स्मार्ट बनना चाहती थी। लेकिन आज परिस्थिति बिल्कुल अलग है।

मिस इंडिया जीतने वाली और मिस यूनिवर्स रनर-अप रह चुकी सेलिना जेटली कहती हैं, “मैंने ये प्रतियोगिताएं उस समय जीती जब वे पारंपरिक सुंदरता मापने का पैमाना नहीं रह गई थीं। भीतर की उर्जा को स्वीकार किया जाने लगा था। आत्मविश्वास और अपने आपको सशक्त बनाने पर जोर दिया जाने लगा था। इन सबके लिए आपको मेकअप ब्रश या हेयर स्प्रे की तुलना में ज्यादा कौशल की जरूरत पड़ती है।”

महाराष्ट्र की एथलीट और मॉडल मधु सप्रे ने 1993 में भारतीय सुंदरियों के लिए अंतरराष्ट्रीय जगत के द्वार खोले थे। उनका कहना है कि सौंदर्य प्रतियोगिताएं अब एक्सक्लूसिव नहीं रह गई हैं, ऐसी अनेक प्रतियोगिताएं होने लगी हैं। अपने दिनों को याद करती हुई सप्रे कहती हैं, “एक प्रतियोगिता में रनर अप बनने के बाद मैं लौटी तो अनेक लोग मुझसे मिलना चाहते थे। उस घटना ने मेरे लिए अवसरों के द्वार खोल दिए। मुझे बहुत काम मिलने लगा। 1993 से 1996 के दौरान लंदन की मशहूर मॉडलिंग एजेंसी ‘मॉडल्स वन’ और पेरिस की एजेंसी ‘पार्टनर्स’ के साथ भी काम किया।

सौंदर्य प्रतियोगिताओं ने बॉलीवुड को नूतन से लेकर ऐश्वर्या राय और प्रियंका चोपड़ा तक अनेक अभिनेत्रियां दी हैं। जेटली कहती हैं, “अभिनेता, निर्देशक और प्रोड्यूसर फिरोज खान ने मेरी पहली फिल्म जांनशीन के लिए फोन पर ही मुझे फाइनल किया। उस समय मैं मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता के लिए पोर्टो रिको में थी। प्रतियोगिता आपको लोगों तक पहुंचा देती है, लेकिन उसके बाद सब कुछ आपके ऊपर निर्भर करता है। यही कारण है कि सिल्वर स्क्रीन पर 10 फीसदी लड़कियां ही सफल हो पाईं।”

सौंदर्य प्रतियोगिताओं का आकर्षण घटने के सवाल पर जेटली कहती हैं, “सोशल मीडिया का उदय और वैश्वीकरण प्रमुख कारण हैं। क्वालिटी में भी निश्चित रूप से गिरावट आई है। अनेक लड़कियों में भारत का प्रतिनिधित्व करने का पैशन और प्रतिबद्धता घटी है।” जेटली कहती हैं, “जब हमने भाग लिया था तब भारत को गौरवान्वित करना पहला लक्ष्य था। फिल्मों में मौका मिलना उसका फल मात्र था। लेकिन अब लड़कियां इसी लक्ष्य के साथ आती हैं।”

सुष्मिता कहती हैं, “आम तौर पर ऐसे प्लेटफॉर्म पर जाने या उनमें हिस्सा लेने वाली लड़कियों को यह एहसास नहीं होता कि ब्यूटी क्वीन का अर्थ क्या होता है। वे सिर्फ इसलिए प्रतियोगिता में जाती हैं कि उन्हें खूबसूरती का जश्न मनाना अच्छा लगता है, उन्हें लगता है कि फिल्म या मॉडलिंग में उनका भविष्य है और इस तरह की प्रतियोगिता उन्हें बड़ा प्लेटफॉर्म देगी।”

महिलाएं अब महसूस करने लगी हैं कि हमें अपना शरीर नहीं, नियम बदलने की जरूरत है। लेखिका मेघना पंत कहती हैं, “आधा सच या अंधराष्ट्रभक्ति हमारे स्वाभिमान को नहीं जगा सकती, न ही सौंदर्य प्रतियोगिताओं के लिए करीने से तैयार किया गया शरीर। अगर हम इन प्रतियोगिताओं में सुंदरता की पुरानी अवधारणा के बदले उनकी सोच, प्रतिभा और पैशन के आधार पर निर्णय करें तो भागीदारी का स्तर निश्चित रूप से अलग होगा।”

पंत के अनुसार जब युवाओं को जीवन के गुर नहीं सिखाए जाते तो वे सुंदरता के गुर क्यों सीखेंगी। दूसरों के शरीर को देखकर निहारना और उनसे अपनी तुलना करना बंद होना चाहिए। किसी महिला की योग्यता उसके दिखने से तय नहीं होनी चाहिए। कोई महिला अपने शरीर या दिमाग से कैसा दिखना चाहती है, यह फैसला उसी का होना चाहिए।

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