मैं उन गिने–चुने पत्रकारों में हूं, जिन्होंने लगातार दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र) में काम किया है। 2015–2016 के दौरान मैं पत्रिका अखबार और ईटीवी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के लिए काम करता था। छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों से की गई मेरी रिपोर्टिंग नक्सलवाद, पुलिस कार्रवाई, मानवाधिकार उल्लंघन और भ्रष्टाचार जैसे संवेदनशील मुद्दों को उजागर करने के लिए जानी जाती रही है। मेरी सबसे चर्चित रिपोर्ट, ‘झूठे हैं पुलिस के बयान: मोडेनार’, अप्रैल 2015 में प्रकाशित हुई थी। इस रिपोर्ट के सिलसिले में मैंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान तत्कालीन आइजी एस.आर.पी. कल्लूरी से कुछ कड़े सवाल पूछे थे। जहां दूसरे पत्रकार चुप रहते थे या पुलिस की दी गई जानकारी को ही मान लेते थे, वहीं मैंने पुलिस अभियानों में पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल उठाए। इसी वजह से मैं पुलिस की नजर में चढ़ गया।
कल्लूरी ने कहा था, “मैं तुम्हें देख लूंगा,” जो धमकी का ही एक रूप था। इसके बाद मुझे बार–बार धमकियां मिलने लगीं। मुझ पर पहले से ही कुछ झूठे और मामूली आरोप (जैसे जालसाजी और धोखाधड़ी) लगाए जा चुके थे, जिन पर वर्षों तक कोई कार्रवाई नहीं हुई थी। मैं पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून की मांग कर रहा था और ‘बस्तर न्यूज’ नाम के एक वॉट्सऐप समूह में सक्रिय था। कल्लूरी के आइजी रहते हुए मुझ पर आरोप लगाए गए कि मैं पत्रकारों के फोन टैप करता हूं और पत्रकारों की आइडी देकर मुखबिरों को पत्रकारों के भेष में कोर नक्सली इलाकों में भेजता हूं। यह भी कहा गया कि ऐसा करके मैंने पुलिस और नक्सलियों दोनों तरफ से पत्रकारों की जान खतरे में डाली।
21 मार्च 2016 की शाम, जब मैं अपने दफ्तर के बाहर कार पार्क कर रहा था, तभी सादे कपड़ों में आए पुलिसवालों ने मुझे बिना कोई कारण बताए, बिना वारंट उठा लिया। बिना किसी प्रक्रिया यह ‘अपहरण’ की तरह था। कई अन्य पत्रकारों और मानवाधिकार संगठनों ने भी इस गिरफ्तारी को अवैध बताया। मुझ पर आरोप लगाया गया कि मैंने वॉट्सऐप पर एक ‘अश्लील’ संदेश भेजा था, जिसमें मैंने कुछ पत्रकारों के बारे में कहा था कि वे ‘मामा की गोद में बैठे हैं।’ इसका कथित अर्थ यह निकाला गया कि कुछ पत्रकार पुलिस के पक्ष में हैं और पत्रकारों की सुरक्षा के प्रस्तावित कानून का विरोध करते हैं।
आइटी एक्ट की धाराएं 67 और 67 ए (इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अश्लील सामग्री प्रसारित करने) तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 292 के साथ–साथ पुलिस ने मेरे खिलाफ तीन–चार पुराने लंबित मामलों को भी आरोपों की सूची में जोड़ दिया। मुझे पूरी रात एक दूसरे जिले यानी दंतेवाड़ा से 80 किलोमीटर दूर जगदलपुर के परपा थाने में रखा गया। अदालत में सुनवाई के दौरान मेरी जमानत याचिका खारिज कर दी गई। उसके बाद मैं लगभग तीन महीने (96 दिन) तक जगदलपुर की जेल में बंद रहा। मुझे नक्सलियों और बलात्कारियों जैसे कैदियों के साथ रखा गया और मेरे साथ बहुत ही अमानवीय व्यवहार किया गया।
जून–जुलाई 2016 के आसपास, एक कठिन कानूनी लड़ाई और एमनेस्टी इंटरनेशनल, फ्रंट लाइन डिफेंडर्स और कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के भारी दबाव के बाद अंततः मुझे जमानत मिल पाई। बिलासपुर हाइकोर्ट में मेरे मामले की पैरवी प्रसिद्ध अधिवक्ता किशोर नारायण और रजनी सोरेन ने की, जबकि जिला और सत्र न्यायालय, दंतेवाड़ा में अधिवक्ता क्षितिज दुबे ने भी जोरदार ढंग से मेरा पक्ष रखा।
जेल से रिहा होने के बाद मुझे पत्रिका और ईटीवी छत्तीसगढ़ दोनों संस्थानों से हटा दिया गया और मैं बेरोजगार हो गया। मुझे बार–बार अदालती मामलों का सामना करना पड़ा। मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ती चली गई।
बस्तर में दमनकारी पत्रकारिता के माहौल के कारण कई पत्रकार या तो चुप हो गए हैं या उन्हें वह क्षेत्र छोड़ना पड़ा है या फिर उन्हें जेल जाना पड़ा। कुछ स्थानीय पत्रकारों और पुलिस से जुड़े लोगों ने मुझे ‘राष्ट्र-विरोधी’ कहकर निशाना बनाया। मेरी गिरफ्तारी ने बस्तर क्षेत्र में काम कर रहे पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर देश में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विवाद खड़ा कर दिया। आज तक इस क्षेत्र के कई पत्रकार या तो खामोश हो चुके हैं या डर के साए में काम कर रहे हैं।
हममें से कुछ लोगों का किया गया काम ही चौतरफा अंधियारे में रोशनी की किरण बना है। मेरी कहानी इस बात की गवाही देती है कि सच बोलने की कीमत कई बार कैद, बदनामी या यहां तक कि मौत भी हो सकती है। फिर भी साहसी लोग इन चुनौतियों से चुप नहीं होते। हालांकि मैंने उसी निडरता और साफगोई भरे अंदाज में रिपोर्टिंग जारी रखने की कोशिश की, लेकिन अंततः मुझे हाशिये पर धकेल दिया गया।
मेरी कहानी बस्तर क्षेत्र में ईमानदार पत्रकारिता और आदिवासी इलाकों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संघर्ष का प्रतीक बन गई है। इस दौर में पत्रकारिता के नैतिक पतन से हताश होकर मैंने पत्रकारिता को हमेशा के लिए छोड़ने और अपना व्यवसाय शुरू करने का फैसला किया है। वर्तमान में मैं अपने परिवार के भरण–पोषण के लिए दंतेवाड़ा में एक कंप्यूटर की दुकान चलाता हूं।
मेरी कहानी इस बात की याद दिलाती है कि बस्तर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में सच दिखाने की कीमत कितनी भारी होती है। एक ओर नक्सली और दूसरी ओर राज्य और पुलिस की ताकत, दोनों के बीच फंसे स्थानीय पत्रकार आज भी संघर्ष कर रहे हैं। मेरे जैसे कई अन्य पत्रकारों ने भी बस्तर की सच्चाई दुनिया के सामने लाने की भारी कीमत चुकाई है।
बस्तर में मेरे साथ जो हुआ, वह भारतीय पत्रकारिता के इतिहास की एक महत्वपूर्ण, लेकिन पीड़ादायक घटना है। मैं चाहता हूं कि इन घटनाओं को साहस, दमन, कैद के कड़वे अनुभव और अडिग उम्मीद की कहानी के रूप में याद रखा जाए। यह लड़ाई सिर्फ एक व्यक्ति के रूप में मेरी अकेले की नहीं, बल्कि बस्तर में सच बोलने के मूल अधिकार की लड़ाई है। यह दिखाती है कि इन संवेदनशील क्षेत्रों में ईमानदार पत्रकारों को धमकियों, झूठे मामलों और कैद जैसे हथकंडों से कैसे दबाया जाता है। इसी संघर्ष में मैंने अपना प्रिय मित्र मुकेश चंद्राकर खो दिया, जिसके साथ मेरा भाई जैसा रिश्ता था। चंद्राकर की हत्या एक स्थानीय ठेकेदार और उसके भाइयों ने की थी, जो सड़क निर्माण से जुड़े थे। बाद में उसका शव ठेकेदार के परिसर में एक सेप्टिक टैंक से बरामद हुआ।
(छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में पुलिस बर्बरता पर रिपोर्टिंग करने के कारण पत्रकार प्रभात सिंह को 21 मार्च 2016 को हिरासत में लिया गया था। उन्हें तीन महीने बाद जमानत मिल पाई थी।)