Advertisement

मध्य प्रदेश: बीमारी की हरियाली

भोपाल में सांस के रोग पैदा कर रहा है कोनोकार्पस का पौधा
रोग को बुलावाः बड़े पत्तों वाले कोनोकार्पस पौधे की भोपाल स्मार्ट सिटी में प्रचुरता

राज्‍य में बगीचों और सड़कों की खूबसूरती को बढ़ाने के लिए धड़ल्ले से लगाए गए कोनोकार्पस के पौधे अब विवाद की नई जड़ हैं। अपने अवगुणों की वजह से अब तक पांच राज्यों में प्रतिबंधित हो चुके विदेशी मूल के इस पेड़ को शहर के उस इलाके में पनाह दे दी गई जहां सरकार नई बसाहट की तैयारी कर चुकी है। केंद्रीय आवास और शहरी कार्य मंत्रालय ने 2018 में जारी स्मार्ट शहरों की सूची में भोपाल को पहला स्थान दिया था। इसके बाद नए इलाकों का प्रोजेक्ट तेज हो गया। इस बीच सहमति बनी कि स्मार्ट सिटी में ऐसे पेड़ लगाए जाएं, जिन्‍हें ज्यादा देखरेख की जरूरत न हो, जल्द लगें और खूबसूरत दिखें। इसी के चलते कोनोकार्पस के पौधे लगाए गए।

यह पौधा कम पानी और कम रखरखाव में बढ़ जाता है। यह लंबी-नुकीली पत्तियों वाला, लगभग 10-20 मीटर तक ऊंचाई छूने वाला और लगभग 90 सेमी तने की मोटाई वाला होता है। इस पर कीट-पक्षी नहीं बैठते। देखते ही देखते कोनोकार्पस को भोपाल के फार्म हाउसों, मैरेज गार्डेन, रिसोर्ट, होटल के लॉन और कई रिहायशी कॉलोनियों में भी आसानी से जगह मिल गई।

भोपाल के शासकीय मोतीलाल विज्ञान महाविद्यालय (एमवीएम) कॉलेज में वनस्पति विज्ञान की प्रोफेसर भारती कुमार के अनुसार कोनोकार्पस मूल रूप से दलदली इलाकों में पाई जाने वाली एक खरपतवार है। पत्तियां मोटी होने के कारण ये कार्बन डाई ऑक्साइड का अवशोषण न के बराबर कर पाते हैं, लिहाजा पर्यावरण संरक्षण में उनका योगदान भी न के बराबर होता है। इसके अलावा इस पेड़ की जितनी ऊंचाई होती है, उससे दो गुनी गहराई तक इसकी जड़ें जमीन में चली जाती हैं, जो बाकी पेड़ों को पनपने नहीं देतीं। इसके पेड़ पर सर्दियों के मौसम में फूल आते हैं, जिसके परागकण स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक होते हैं और कई बीमारियों को जन्म देते हैं।

पर्यावरणविदों का मानना है कि यह पौधा जैव-विविधता के लिए बहुत बड़ा खतरा है। इसकी जड़ें भूमिगत सीवेज, बिजली, टेलीफोन लाइन और यहां तक की भूमिगत जल प्रवाह, अंडरग्राउंड ड्रेनेज तक को अवरुद्ध कर सकती हैं। अरब के कई देशों में तो भूमिगत पाइपलाइनों को नुकसान पहुंचाने के कारण इन पेड़ों को हटाना पड़ा।

पड़ाेसी राज्य गुजरात के वन विभाग ने 26 सितंबर 2023 को एक सर्कुलर जारी करके कोनोकार्पस के रोपण और बीज बोने पर प्रतिबंध लगाया। राज्य में वन और गैर-वन क्षेत्रों, नर्सरी और वृक्षारोपण स्थलों में कोनोकार्पस पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है। मुख्य वन संरक्षक एस.के. चतुर्वेदी के निर्देश में कहा गया है कि इस वृक्ष के बुनियादी ढांचे और मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले हानिकारक प्रभाव काफी हैं। सर्कुलर में कहा गया कि कोनोकार्पस के फूल की वजह से सर्दी-जुकाम, अस्थमा और एलर्जी जैसी बीमारियां हो जाती हैं। इसके अलावा इसकी पत्तियां जानवरों के लिए भी हानिकारक हैं। इस वर्ष के शुरुआत में तमिलनाडु सरकार के पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और वन विभाग ने एक आदेश में कोनोकार्पस को हानिकारक बताया और उन्हें हटाने का निर्देश दिया। 11 जनवरी को जारी एक पत्र में, राज्य सरकार ने कोनोकार्पस के पेड़ न लगाने और उनकी जगह देसी पेड़ लगाने के आदेश जारी किए। पत्र में वन विभाग को सलाह दी गई कि वह जिला हरित समिति को वन भूमि से कोनोकार्पस के पेड़ हटाने और देसी प्रजातियों के पेड़ लगाने की अनुमति दे। वन विभाग को सार्वजनिक सड़कों, सार्वजनिक पार्कों और स्थानीय निकायों में भी उन्हें हटाने और उनकी जगह नए पेड़ लगाने का निर्देश दिया गया।

भोपाल में श्वसन रोग विशेषज्ञ डॉ. आशीष दुबे बताते हैं कि उनके पास सांस लेने में तकलीफ की शिकायत लेकर एक मरीज आया। दवाइयां उसे राहत पहुंचाते नहीं दिखीं, तो उससे और बातें की गईं। पता चला कि मरीज ने अपने आंगन में कोनोकार्पस का पौधा लगाया है। इसके कुछ समय बाद ही उसका दम उखड़ने लगा। डॉक्टर ने अपने मरीज को पौधा काटने की सलाह दी। उसके बाद मरीज की हालत में सुधार आने लगा। जब

डॉ. दुबे मामले की तह तक पहुंचे तो समझ में आया कि सांस की बीमारी के पीछे कोनोकार्पस था। इस मामले पर भोपाल स्मार्ट सिटी कंपनी के सीईओ अंजू अरुण कुमार का कहना है कि पूरे मामले का ब्यौरा जुटाने के बाद ही कोई कार्रवाई की जाएगी।

जैव-विविधता के लिए खतरनाक साबित हो चुके कोनोकार्पस के ऊपर देश के पांच राज्य- असम, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, गुजरात और तमिलनाडु पूरी तरह प्रतिबंध लगा चुके हैं, क्योंकि खूबसूरत दिखने वाला यह पौधा लोगों को बीमार तो बना ही रहा है, पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है।

 

Advertisement
Advertisement
Advertisement