प्रचलित लोकोक्ति है, ‘होनहार बिरवान के होत चिकने पात।’ यानी विलक्षण प्रतिभा शुरुआत से ही नजर आने लगती है। मैदान में सचिन तेंडुलकर का इतिहास रहा है, जिनके जलवे दुनिया भर के मैदानों पर उनके बालिग होने से पहले ही दिखने लगे थे। वे 1989 में पाकिस्तान जाने वाली भारतीय टीम का हिस्सा बने, तब उनकी उम्र मात्र 16 साल थी। ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान इयान चैपल जैसे क्रिकेट के कई दिग्गजों ने उस समय भविष्यवाणी की थी कि सचिन आगे जाकर कई विश्व कीर्तिमान स्थापित करेंगे। सचिन उनकी उम्मीदों पर इस कदर खरे उतरे कि उन्हें एक समय ‘क्रिकेट का भगवान’ तक कहा गया। मैदान को अलविदा कहने के बाद उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से भी नवाजा गया। लेकिन, क्या हर प्रतिभावान खिलाड़ी, जिसके हुनर को उसके शुरुआती वर्षों में अनोखा समझा जाता है, सचिन की तरह उम्मीदों पर खरा उतर पाता है या अधिकतर खिलाड़ी इस कारण अनावश्यक दवाब महसूस करने लगते हैं, जिसका असर उनके प्रदर्शन पर पड़ता है। दुनिया भर में सचिन के समकालीन विनोद कांबली जैसे खिलाड़ियों की कमी नहीं रही, जिन्हें शुरू में ‘चाइल्ड प्रोडिजी’ कहा गया, लेकिन बाद में वे अपेक्षाओं के अनावश्यक दवाब को झेल नहीं पाए और प्रतिभा के अनुरूप प्रदर्शन करने में नाकाम रहे।
भारत में आजकल वैभव सूर्यवंशी की विलक्षण प्रतिभा की चर्चा जोरों पर है। वैभव अभी पंद्रह वर्ष का भी नहीं है। उसकी जबरदस्त बल्लेबाजी ने दुनिया भर में क्रिकेट शौकीनों को आकर्षित किया है। उसके प्रदर्शन के कारण राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पिछले दिनों उसे राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से नवाजा। वह आगामी अंडर-19 के विश्व कप टूर्नामेंट में भी देश की अगुआई करेगा। यही नहीं, दुनिया भर के खेल प्रेमियों में उसके प्रति उत्साह और दिलचस्पी के कारण वर्ष 2025 में वह गूगल सर्च इंजन पर सबसे ज्यादा सर्च किया गया भारतीय बना।
लोगों में इस बात का कौतुहल है कि इतनी कम उम्र में वैभव ऐसी विस्फोटक बल्लेबाजी कैसे कर लेता है। वैसे, वैभव ने अभी तक सीनियर लेवल पर एक भी टेस्ट क्रिकेट या एकदिवसीय मैच नहीं खेला है, लेकिन फर्स्ट क्लास मैचों से लेकर आइपीएल में उसके जबरदस्त प्रदर्शन ने उसे कम उम्र में लोकप्रिय बना दिया है। उसके कौशल का वास्तविक आकलन तब होगा जब वह विदेशी पिचों पर सीनियर लेवल के अंतरराष्ट्रीय मैच खेलेगा।
पूर्व में कई प्रतिभाशाली खिलाडियों के ‘बर्न आउट’ होने के उदाहरण रहे हैं। इसलिए किसी भी खिलाड़ी के पास सिर्फ जन्मजात प्रतिभा होना ही काफी नहीं है। यह भी मायने रखता है कि मैच के तनाव भरे क्षणों में खिलाड़ी मानसिक रूप से कितना मजबूत है। शुरुआती में सचिन तेंडुलकर को ‘बच्चा’ और ‘अपरिपक्व’ समझकर दुनिया भर के तेज और स्पिन गेंदबाजों ने उन पर जबरदस्त दवाब बनाने की कोशिश की। लेकिन सचिन ने हमेशा साबित किया कि वे मानसिक रूप से भी मजबूत हैं। जब तक वैभव अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं के शीर्ष स्तर पर खेलेगा, तब तक दुनिया भर की टीमें खेल के पिच पर उसकी मजबूती और कमजोरी का अध्ययन कर उसके खिलाफ रणनीतियां बना चुकी होंगी। उसे प्रतिद्वंद्वियों के माइंड गेम से लड़ने के लिए खुद को तैयार करना पड़ेगा। निस्संदेह यह आसान न होगा। वही उसकी असली परीक्षा होगी। उसे तेंडुलकर की तरह खुद को साबित करना होगा कि वह हर परिस्थिति में आतिशी बल्लेबाजी दिखलाने का माद्दा रखते हैं।
क्या वैसी परीक्षा के पहले ही वैभव के प्रति प्रशंसकों की बढ़ती उम्मीदों, गूगल पर सर्वाधिक सर्च किए गए भारतीय सेलेब्रिटी का रुतबा, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार और मीडिया का हाइप (आउटलुक का यह कवर भी) उसके लिए दवाब के पहाड़ जैसा होगा या वह सोशल मीडिया के जमाने में हर छोटी और बड़ी हस्तियों की तरह खुद को तैयार रखेगा, यह देखना वाकई दिलचस्प होगा।
छत्तीस वर्ष पूर्व जब सचिन ने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय मैच खेला था, तो देश में निजी टेलीविजन चैनल उपलब्ध नहीं थे। मीडिया का मतलब प्रिंट, सरकारी टीवी और रेडियो हुआ करता था। आज डिजिटल युग में मीडिया का अभूतपूर्व विकास हुआ है। इस दौर के हर खिलाड़ी से अपेक्षा होती है कि वे मानसिक तौर पर मजबूत हों और आवश्यक या अनावश्यक मीडिया फोकस से बेअसर रहकर अपने खेल पर ध्यान दें।
वैभव ने बिहार के एक पिछड़े जिले समस्तीपुर से निकलकर यहां तक की यात्रा की है। उसके संघर्ष की तुलना महानगरों के खिलाड़ियों से नहीं की जा सकती, क्योंकि उसके पास मूलभूत सुविधाओं का अभाव था। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि कठिन संघर्ष के बाद इस मुकाम पर पहुंचने के बाद वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मानसिक रूप से मजबूत खिलाड़ी के रूप में उभरेगा और हर उस उम्मीद पर खरा उतरेगा, जो लोगों ने उससे लगा रखी है।