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2 मार्च 2026 · MAR 02 , 2026

भारत-अमेरिका व्यापारः ट्रम्प करार के मायने

इलस्ट्रेशनः रोहित राय / एआइ
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

आखिर छह फरवरी को भारत-अमेरिका मुक्‍त व्‍यापार करार का अंतरिम साझा मसौदा भी आया और अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रम्‍प ने कार्यकारी आदेश पर भी दस्तखत किए कि भारत पर बतौर जुर्माना 25 प्रतिशत टैरिफ हटाया जा रहा है, क्‍योंकि उसने रूस से तेल खरीदना बंद करने का वादा किया है। लेकिन आदेश आगाह करता है कि अमेरिका के चार विभाग उस पर कड़ी नजर बनाए रखेंगे ताकि अगर वह वादे पर खरा नहीं उतरता है, तो उस पर ‌फिर जुर्माना लगाया जा सके। जुर्माने की रकम भी तब के आकलन पर निर्भर करेगी। खैर, महीनों की खींचतान, तकरार वगैरह के बाद अचानक 2 फरवरी की रात 9 बजे (भारत में) अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रम्‍प ने सोशल मीडिया के अपने ट्रुथ सोशल पर लिखा, ‘‘इस सुबह भारत के प्रधानमंत्री मोदी से बात करना सम्‍मान की बात है। वे मेरे महान दोस्‍तों में एक हैं और अपने देश के ताकतवर तथा सम्‍मानित नेता हैं। प्रधानमंत्री मोदी के प्रति सम्‍मान और दोस्‍ती के मद्देनजर, उनके अनुरोध पर तत्‍काल प्रभाव से हम अमेरिका और भारत के बीच व्‍यापार करार के लिए राजी हो गए, जिसके तहत अमेरिका परस्‍पर टैरिफ 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत लगाएगा। अमेरिकी ऊर्जा, टेक्‍नोलॉजी, कृषि उपज, कोयला और ढेर सारे सामान के निर्यात पर सभी तरह की अड़चनें और टैरिफ शून्‍य होगा। भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया है और अमेरिका तथा खासकर वेनेजुएला से तेल खरीदेगा। भारत 500 अरब डॉलर का अमेरिकी सामान खरीदने को तैयार है।’’

उसके बाद करीब रात 11 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘‘अपने प्रिय दोस्‍त’’ का आभार जताया। अगले दिन वाणिज्‍य मंत्री पीयूष गोयल यह बताने आए कि कृषि उपज और संवेदनशील मसलों पर हमने कोई समझौता नहीं किया है। हालांकि अमेरिका की कृषि मंत्री ऐलान कर रही थीं कि अमेरिका के किसानों के लिए 1.4 अरब लोगों का विशाल बाजार खुल गया है। उसी दिन करार के लिए एनडीए सांसदों की बैठक में प्रधानमंत्री की सराहना की गई और करार को विकसित भारत के लक्ष्‍य की दिशा में अहम बताया गया। लेकिन विपक्ष ने इसे भारत का पूरी तरह ‘‘सरेंडर’’ करार दिया। संसद परिसर में विपक्षी सांसदों ने ‘‘नरेंदर सरेंडर’’ के नारे लगाए। सरकार की ओर से कोई विस्‍तृत जानकारी नहीं थी, क्‍योंकि सब कुछ अमेरिका की ओर से आ रहा था। इस वजह से उलझन आखिर तक बनी रही। यहां तक कि पांच अप्रैल की शाम वॉशिंगटन में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पत्रकारों को बताया कि करार के बारे में वाणिज्‍य मंत्री पीयूष गोयल ही बताएंगे, क्‍योंकि मैं उससे जुड़ा नहीं रहा हूं। लेकिन छह अप्रैल को अंतरिम साझा पत्र जारी होने के बाद पीयूष गोयल से पत्रकार वार्ता में रूस से तेल खरीद के बारे में पूछा, तो उनका जवाब था कि यह विदेश मंत्रालय का मामला है।

साझेदारीः अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ जयशंकर

साझेदारीः अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ जयशंकर

यह उलझन अभी तक उपलब्‍ध मोटी जानकारियों पर गौर करने से ही कुछ साफ हो सकती है। लेकिन उसके पहले यह जान लेना भी जरूरी है कि यह अभी अंतरिम है और मोटे तौर पर इसका मकसद ट्रम्‍प के भारत से जुर्माने का टैरिफ हटाने के लिए कार्यकारी आदेश को जारी करने का मोटा आधार तैयार करना है। इसके बाद संकेत हैं कि मार्च-अप्रैल तक विस्‍तृत साझा पत्र सामने आएगा। उसके आधार पर द्विपक्षीय वार्ता होगी, फिर विस्तृत ब्‍यौरे खुलकर सामने आएंगे। इसमें अभी कई महीने लग सकते हैं। आइए देखें, अभी तक के ब्‍यारों से क्‍या पता चलता है।

भारत की रियायतें

ये वे रियायतें हैं, जिसकी जानकारी अभी तक जारी दोनों दस्‍तावेजों में दर्ज है। भारत ने प्रत्‍यक्ष या परोक्ष रूप से रूसी फेडरेशन से कच्‍चा तेल आयात बंद करने का वादा किया है, बल्कि पिछले कुछ महीनों में काफी कम कर चुका है। यह भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक या कहें अपने फैसले खुद करने के मामले में दी गई छूट है। भारत अभी रूस से हर दिन लगभग 12–15 लाख बैरल तेल आयात करता है, जो उसकी कुल खपत का लगभग 25–35 प्रतिशत है। रूसी क्रूड ब्रेंट अमेरिकी क्रूड के मुकाबले 7–12 डॉलर प्रति बैरल सस्ता है। अमेरिका और दूसरे देशों से महंगा तेल लेने से भारत का सालाना तेल आयात बिल लगभग 9–12 अरब डॉलर बढ़ जाएगा। यह बोझ ईंधन और खाद की कीमतों के मार्फत लोगों पर ही आएगा। खास बात यह है कि अमेरिकी राष्‍ट्रपति के कार्यकारी आदेश की ‘धारा 4’ निरंतर निगरानी व्‍यवस्‍था की बात करती है। अमेरिका के वाणिज्‍य मंत्री नजर रखेंगे कि कहीं भारत ‘‘सीधे या किसी और रास्‍ते रूस से तेल आयात तो नहीं कर रहा है।’’ इसका मतलब है कि भारत की ऊर्जा स्‍वायत्तता अब लगातार अमेरिकी निगरानी के तहत रहने वाली है। एक मायने में यह भारत की ओर से अपनी ऊर्जा खरीद पर वॉशिंगटन को वीटो पावर थमा देने जैसा है।

फिर, भारत को 500 अरब डॉलर का सामान खरीदने (शायद 5 साल में) पर रजामंदी है। इसके तहत अमेरिकी ऊर्जा उत्‍पाद, एयरक्राफ्ट, कीमती धातु, टेक्नोलॉजी उत्पाद, कृषि उत्‍पाद और कोयला खरीदना है। अमेरिका से भारत का मौजूदा सालाना आयात लगभग 46 अरब डॉलर (वित्त वर्ष 25) है। इस वादे का मतलब है कि हर साल लगभग 100 अरब डॉलर की खरीद करनी होगी, जो मौजूदा स्‍तर से 118 प्रतिशत ज्यादा है। रूस से तेल लेना बंद करने से यह लक्ष्‍य बहुत ज्‍यादा है और इसका असर हमारी अर्थव्‍यवस्‍था पर पड़ना तय है।

कृषि का मामला

भारत अमेरिका से कई तरह के खाद्य और कृषि उत्‍पाद पर ‘‘टैरिफ खत्म कर देगा या काफी घटा देगा।’’ भारत में मौजूदा कृषि टैरिफ दुनिया में सबसे ज्यादा है (औसतन 64 प्रतिशत, जिसमें मांस, फल, सब्जियों और अनाज पर ड्यूटी 100 प्रतिशत से ज्यादा है)। ये टैरिफ खास तौर पर भारत के 40 करोड़ से ज्‍यादा किसानों को बचाने के लिए लगाए गए थे, जिनमें 86 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसान हैं जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है। आइए देखें भारत किन कृषि उपज और उत्पादों के मामलों में बाजार खोल रहा है:

• सूखे डिस्टिलरी अनाज (डीडीजी): पशु चारे के लिए भारत में मक्‍का, सोयाबीन वगैरह पर इसका सीधा असर दिखेगा। अमेरिकी डीडीजी काफी सस्ते हैं और भारत में सोयाबीन किसानों के बाजार की जगह ले लेंगे।

. सोयाबीन तेल: मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में तिलहन किसानों पर असर पड़ेगा।

•  ट्री नट्स (बादाम, अखरोट, पिस्ता): कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के किसानों पर भारी असर पड़ेगा, क्योंकि अमेरिकी माल काफी सस्ता पड़ेगा। ये फसलें ही पहाड़ी खेती करने वाले छोटे किसानों की आजिविका का साधन हैं।

• ताजे और डिब्बाबंद प्रसंस्कृत फल: इनकी खुली आमद से देश में सेब, अंगूर और खट्टे फलों के किसानों पर असर पड़ेगा।

• वाइन और शराब: अमेरिका से मुकाबले में घरेलू सेक्टर पर असर पड़ेगा।

• लाल ज्वार: देश में चारा उगाने वाले किसानों पर सीधे असर होगा।

इसमें एक मामला यह भी है कि ये सभी कृषि उत्पाद मोटे तौर पर जीएम फसलें होंगी, जिन पर भारत में अब तक रोक रही है।

गैर-टैरिफ प्रतिबंधों को खत्म करना

भारत छह महीने के अंदर अमेरिकी मेडिकल डिवाइस पर लंबे समय से चली आ रही गैर-टैरिफ रुकावटों को दूर करने, रोक लगाने वाली आइसीटी आयात लाइसेंस को खत्म करने और यह देखने पर राजी हो गया है कि अमेरिका के मानकों को स्वीकार किया जाएगा। यह अपनी नियामक स्‍वायत्तता छोड़ देने का मामला है। इससे देश के घरेलू मेडिकल उपकरण मैन्युफैक्चरिंग प्रोग्राम (मेक इन इंडिया) और स्वदेशी मानक कमजोर होंगे। अमेरिकी स्टैंडर्ड को स्वीकार करने का मतलब है कि भारत मानक ब्‍यूरो का सर्टिफिकेशन सिस्टम बेमानी या कमजोर हो सकता है।

इसके अलावा साझा पत्र में कहा गया है कि भारत “सभी अमेरिकी औद्योगिक उत्‍पादों पर टैरिफ खत्म करेगा या कम करेगा।” यह बहुत बड़ी बात है। मशीनरी (44 फीसदी तक), केमिकल (22 फीसदी), और दूसरे इंडस्ट्रियल इनपुट पर भारत के टैरिफ अभी भी डेवलप हो रहे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए सुरक्षा कवच थे। इसे हटा लेने से भारतीय उद्योग होड़ में शायद ही टिक पाएं।

रक्षा सहयोग फ्रेमवर्क (10 साल)

ट्रम्प के कार्यकारी आदेश में कहा गया है कि भारत ने “अगले 10 साल में डिफेंस सहयोग बढ़ाने के लिए अमेरिका के साथ एक फ्रेमवर्क बनाने का वादा किया है।” हालांकि इसके ब्‍यौरे अभी नहीं हैं। लेकिन इसमें अमेरिकी रक्षा सामान की ज्यादा खरीद शामिल हो सकती है, जिससे भारत रूसी मिलिट्री हार्डवेयर से और दूर हो जाएगा, जिस पर हमारी सेना निर्भर रही है। यह दीर्घावधिक रणनीतिक रुख मोड़ना है।

करार के नीतिगत मायने

इस करार से नीतिगत मामले में भारत के भविष्‍य की नीतियों पर मुक्‍त फैसले पर अंकुश लग सकता है। हालांकि परस्पर टैरिफ 25 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत हो गया, लेकिन यह मुश्किल से ही “फ्री ट्रेड” जैसा प्रबंध है। भारत के मुख्य श्रम-सघन निर्यात सेक्टर (टेक्सटाइल, लेदर, फुटवियर, प्लास्टिक, होम डेकोर, हस्तकला के सामान) अभी भी 18 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ का सामना कर रहे हैं। रत्‍न, हीरे, जेनेरिक फार्मास्यूटिकल और एयरक्राफ्ट पार्ट्स के लिए जीरो-टैरिफ का वादा सशर्त है। उसके लिए “अंतरिम करार का सफल होना” जरूरी है और दवाई में यह “अमेरिकी कानून की धारा 232 की जांच के नतीजों पर निर्भर है।”

संशोधन” क्लॉज में अंतर

साझा पत्र में कहा गया है कि अगर कोई भी देश अपने तय टैरिफ में बदलाव करता है, तो दूसरा “अपने वादे में बदलाव कर सकता है।” कागज पर यह बराबरी का लगता है। लेकिन, अमेरिका को ज्यादा बढ़त है। भारत निर्यात पर निर्भर है, और अमेरिका कभी भी 25 प्रतिशत जुर्माना टैरिफ लगा सकता है। भारत की जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता कई वजहों से सीमित है। मूल नियम ऐसा बनाने का वादा किया गया है कि फायदे “अमेरिका और भारत को मिलें।” यह सुनने में निष्‍पक्ष लगता है, लेकिन यह भारत की तीसरे देश के सामान (खासकर चीनी) के लिए निर्यात हब के तौर पर काम करने को सीमित करता है। इससे भारत के एशियाई सप्लाई चेन में शामिल होने में रुकावट पैदा आएगी।

 दोनों देश “अपने और एक-दूसरे में निवेश समीक्षा और निर्यात नियंत्रण” पर सहयोग के साथ “आर्थिक तालमेल को मजबूत करने” और “तीसरे पक्ष के लिए गैर-बाजार नीतियों में बदलाव” पर सहमत हैं। यह चीन के ‌िखलाफ के साथ न जुड़ने की कूटनीतिक भाषा है।

डिजिटल व्यापार नियम

भारत “डिजिटल व्यापार में भेदभाव वाले या बोझिल तरीकों और दूसरी रुकावटों को दूर करने” का वादा करता है। भारत की डेटा स्‍थानीयकरण की जरूरतें, डिजिटल सर्विस टैक्स के प्रस्ताव और प्लेटफॉर्म रेगुलेशन, ये सभी अमेरिका की शिकायतें रही हैं। यह क्लॉज इशारा करता है कि भारत अमेरिका की पसंद वाले ओपन-डेटा सिस्टम के पक्ष में अपने डिजिटल स्वायत्तता रुख को नरम करेगा, जिससे अमेरिका की बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों को फायदा होगा।

भारत को फायदे

हालांकि कई फायदे शर्तों के साथ या बाद में होने वाले हैं। टैरिफ 50 प्रतिशत से 18 प्रतिशत तक की कमी बेशक काफी बड़ी है। भारत के टेक्सटाइल, लेदर, फुटवियर, केमिकल और हस्तकला उत्पाद निर्यात करने वालों को अमेरिकी बाजार में बेहतर दाम मिलता है। 18 प्रतिशत पर, भारत का टैरिफ रेट अब बांग्लादेश (20 प्रतिशत), वियतनाम (21 प्रतिशत), और चीन (30 प्रतिशत) से कम है, जिससे भारतीय एक्सपोर्ट करने वालों को दुनिया के सबसे बड़े बाजार में होड़ के लिए बढ़त मिलती है।

अगर अंतरिम साझा पत्र फाइनल हो जाता है, तो रत्न, हीरे और जेनेरिक दवाइयों पर शून्य टैरिफ लग सकता है। भारत के रत्न-जेवरात सेक्टर (जिसमें लगभग 50 लाख लोग काम करते हैं, जो निर्यात में लगभग 16 प्रतिशत का हिस्सा है) और फार्मास्यूटिकल सेक्टर को फायदा हो सकता है। हालांकि, यह अभी भी चल रही बातचीत पर निर्भर है।

स्टील, एल्युमिनियम और कॉपर टैरिफ हटाना

स्टील, एल्युमिनियम, कॉपर और भारतीय एयरक्राफ्ट पार्ट्स पर लगाए गए अमेरिकी टैरिफ हटा दिए जाएंगे। भारत को वाहनों के कल-पुर्जों लिए एक टैरिफ रेट कोटा भी मिलेगा। इससे भारत की बढ़ती एयरोस्पेस और मोटर पार्ट्स इंडस्ट्री को फायदा हो सकता है।

टेक्नोलॉजी तक पहुंच

‘‘डेटा सेंटर में इस्तेमाल होने वाले जीपीयू और दूसरे सामान सहित टेक्नोलॉजी उत्पाद में ट्रेड को काफी बढ़ाने’’ का वादा भारत के एआइ और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए रणनीतिक रूप से जरूरी है। पहले एक्सपोर्ट कंट्रोल सिस्टम की वजह से अमेरिकी सेमीकंडक्टर और कंप्यूटिंग हार्डवेयर तक पहुंच पर रोक थी।

भविष्य की वार्ता का फ्रेमवर्क

अमेरिका ने “पुष्टि की है कि वह द्विपक्षीय व्‍यापार वार्ता के दौरान टैरिफ में और कटौती के लिए भारत के अनुरोध पर विचार कर सकता है।” हालांकि यह बाध्यकारी नहीं है। पूरा फ्रेमवर्क एक बड़े द्विपक्षीय व्यापार समझौते की ओर एक कदम के तौर पर बनाया गया है।

व्यापार की शर्तें

ग्राफिक

 

भारतीय सामान पर टैरिफ

पहले

तेल कहीं से भी खरीदने को आजाद

अमेरिका को निर्यात पर औसत 2.4-3 फीसद टैरिफ

शुरुआती ट्रम्प टैरिफ

रूस से तेल खरीदने पर 25 प्रतिशत जुर्माना

परस्पर टैरिफ 25 प्रतिशत

अंतरिम करार के बाद

25 प्रतिशत जुर्माना हटा

परस्पर टैरिफ 18 प्रतिशत

 

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