हाल में जम्मू में मेडिकल कॉलेज पर उठे विवाद और ईरान में तनाव के मद्देनजर डॉक्टर बनने की ख्वाहिश रखने वाले कश्मीरी छात्रों की रुकावटें बढ़ती जा रही हैं। दशकों से डॉक्टर बनने की इच्छा रखने वाले कश्मीरी छात्रों के लिए ईरान पसंदीदा ठिकाना रहा है। विदेशों में मेडिकल की पढ़ाई पर अमूमन यूक्रेन, रूस, चीन और बांग्लादेश जैसे देशों का जिक्र होता है, लेकिन कश्मीर के छात्रों के लिए ईरान खास रहा है। वजह पढ़ाई सस्ती होने के साथ-साथ इतिहास, संस्कृति और आस्था इन्हें वहां से जोड़ती है।
जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (जेकेएसए) के मुताबिक, ईरान में कश्मीरी छात्रों की संख्या 2,000 से ज्यादा है, जिनमें 95 प्रतिशत मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं। लेकिन ईरान-इज्राएल लड़ाई और हाल में ईरान में विरोध प्रदर्शनों के दौर में विदेशों में पढ़ाई की ख्वाहिश रखने वाले छात्रों की मुश्किलें फिर सामने आ गई है। इससे पहले यूक्रेन युद्ध के कारण वहां से हजारों मेडिकल छात्रों को पढ़ाई बीच में छोड़ भारत लौटना पड़ा था।
ईरान के आकर्षण की मुख्य वजह सस्ती पढ़ाई है। भारत में किसी भी प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस का खर्च 1 करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है। इसके साथ यहां भारी डोनेशन फीस भी देना पड़ती है। एनईईटी या नीट में कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण सरकारी कॉलेजों में दाखिला ज्यादातर छात्रों की पहुंच से बाहर रहता है। यह हाल तब है, जब एमबीबीएस की सीटें बढ़कर करीब 1.18 लाख हो गई हैं। लेकिन नीट अभी भी बहुत कठिन परीक्षा है, जिसे पास करना मुश्किल होता है।
ईरान किफायती विकल्प देता है क्योंकि वहां एमबीबीएस की पूरी पढ़ाई का कुल खर्च आम तौर पर 20-30 लाख रुपये के बीच आता है। उसमें फीस, हॉस्टल का किराया और रहने-खाने का खर्च शामिल है। वहां कोई कैपिटेशन या डोनेशन फीस नहीं है। कश्मीर में मध्यम आय वाले परिवारों के लिए यह बहुत मायने रखता है।
हाल तक बांग्लादेश भी भारतीय छात्रों के लिए लोकप्रिय ठिकाना था। लेकिन वहां बढ़ती फीस से अब खर्च 40–45 लाख रुपये तक आने लगा है, और दाखिले के लिए जगह भी थोड़ी ही हैं। ईरान के सरकारी विश्वविद्यालयों और सस्ती फीस की वजह से बेहतर विकल्प है। तेहरान युनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज जैसे संस्थान कम खर्च में अंग्रेजी माध्यम के कोर्स भी मुहैया कराते हैं।
खर्च के अलावा, ईरान का कश्मीर में आकर्षण ऐतिहासिक-सांस्कृतिक वजहों से भी है। कश्मीर को अक्सर ईरान-ए-सगीर या छोटा ईरान कहा जाता है। यह 13वीं सदी से चली आ रही फारसी संस्कृति और मजहबी असर की विरासत है, खासकर मीर सैयद अली हमदानी की शिक्षाओं की वजह से। फारसी भाषा, वास्तुकला, कविता और मजहबी रीति-रिवाजों ने कश्मीरी समाज पर गहरी छाप छोड़ी है।

तेहरान में प्रदर्शन
कश्मीर इस्लामिक युनिवर्सिटी में इंटरनेशनल सेंटर फॉर स्पिरिचुअल स्टडीज के पूर्व डायरेक्टर प्रो. हामिद नसीम रफियाबादी कहते हैं कि कश्मीर के ईरान के साथ लंबे समय से गहरे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध रहे हैं। यह शाह हमदान जैसे फकीरों के फारसी असर की विरासत है, जिन्होंने घाटी में इस्लाम और उसकी कलाओं का विस्तार किया। फारसी सदियों तक आधिकारिक और दरबारी भाषा बनी रही और गनी कश्मीरी जैसे मशहूर कवियों और अल्लामा इकबाल ने भी इसमें बड़े पैमाने पर इस भाषा में लिखा, जो कश्मीर के ही थे। ईरानी असर आफताब, इमरोज और फिरोज जैसे नामों में भी दिखता है, जो अरबी के बजाय ईरानी मूल के हैं। जैसा कि इकबाल ने लिखा, ‘‘अफरीद आह मर्द ईरान-ए-सगीर’’ (शाह हमदान ने कश्मीर को छोटा ईरान बना दिया।)
इन वजहों से कश्मीरी छात्रों को ईरान ज्यादा सहज लगता है। खाने की आदतें, सामाजिक नियम, इस्लामिक तौर-तरीके और यहां तक कि कैंपस का माहौल भी पूर्वी यूरोप या पूर्वी एशिया के देशों के मुकाबले ज्यादा अपना लगता है। खासकर छात्राएं कैंपस के माहौल को ज्यादा सुरक्षित बताती हैं।
जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के संयोजक नासिर खुएहामी के अनुसार, सस्ती पढ़ाई और लंबे समय के सांस्कृतिक रिश्ते मुख्य वजहें हैं। वे कहते हैं, ‘‘ ईरान में पढ़ाई सस्ती है। भारत और ईरान के बीच गहरे अकादमिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं।’’
पहले कश्मीर के शिया संप्रदाय के छात्रों के लिए ईरान में पढ़ाई ज्यादा मुफीद थी, क्योंकि सांस्कृतिक माहौल और परगीस कोटा जैसी दाखिले में विशेष रियायतें आकर्षक थीं। हालांकि, बाद के दौर में सुन्नी संप्रदाय के छात्र भी खासकर मेडिकल पढ़ाई के लिए बड़ी संख्या में वहां दाखिले लेने लगे। इससे ईरान की अकादमिक माहौल की प्रतिष्ठा का भी अंदाजा होता है, न कि सिर्फ मजहबी खासियत का।
कश्मीर और ईरान के बीच शैक्षिक आदान-प्रदान 1980 के दशक से चला आ रहा है, शुरू में यह धर्मशास्त्र और धार्मिक स्टडीज पर केंद्रित था और बाद में मेडिसिन और इंजीनियरिंग तक फैल गया।
ज्यादातर कश्मीरी छात्र तेहरान, शिराज और किश जैसे शहरों में तेहरान युनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज, शाहिद बेहश्ती युनिवर्सिटी और इस्लामिक आजाद युनिवर्सिटी वगैरह में पढ़ते हैं। ईरान में लगभग 95 प्रतिशत कश्मीरी छात्र मेडिकल कोर्स में हैं।
दाखिले में तेजी 2015 के बाद शिक्षा क्षेत्र में समझौतों और प्रतिबंधों में ढील के बाद आई। फिर महामारी के दौरान ऑनलाइन एजुकेशन फेयर और डिजिटल एडमिशन प्रोसेस के जरिए और तेजी आई। कुछ ही साल में ईरान में कश्मीरी छात्रों की संख्या लगभग तीन गुना हो गई।
पिछले वर्ष ईरान और इज्राएल लड़ाई और फिर विरोध प्रदर्शनों की वजह से वहां से लोगों के लौटने का सिलसिला शुरू हुआ, जिससे चिंताएं बढ़ गई हैं। कई परिवारों को अभी भी 2022 की अफरा-तफरी याद है, जब भारतीय मेडिकल छात्रों को अपनी डिग्री के बीच में ही यूक्रेन से भागना पड़ा था और वे ट्रांसफर, मान्यता और भविष्य की संभावनाओं को लेकर अनिश्चित थे।
हालांकि अब तक कोई बड़ा व्यवधान नहीं हुआ है, लेकिन स्थिति संगीन बनी हुई है। हाल के घटनाक्रम गवाह हैं कि सिर्फ लागत और चैन ही ही नहीं, भू-राजनैतिक झटकों भी युवाओं के करियर के ठिकाने तय कर सकते हैं। खुएहामी ने बताया कि कई माता-पिता कई दिनों से अपने बच्चों से संपर्क नहीं कर पाए हैं। उन्होंने कहा, ‘‘विरोध प्रदर्शनों और कार्रवाई के बीच सोशल मीडिया और इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदियों के साथ-साथ कम्युनिकेशन की कमी ने सुरक्षा को लेकर डर बढ़ा दिया है।’’
विदेश मंत्री एस. जयशंकर से बात करने के बाद, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि केंद्र सरकार स्थिति पर करीब से नजर रख रही है। उमर ने एक्स पर लिखा, ‘‘उन्होंने जमीनी हालात और मंत्रालय की योजनाओं के बारे में अपना आकलन बताया। मैं उनके इस आश्वासन के लिए आभारी हूं कि ईरान में मौजूद कश्मीर के छात्रों और अन्य लोगों के हितों और जीवन की सुरक्षा के लिए सभी कदम उठाए जाएंगे।’’
हंदवाड़ा की राबिया वानी की छोटी बहन सेहरीन ईरान की अराक युनिवर्सिटी में एमबीबीएस के दूसरे साल में है। उन्होंने आउटलुक को बताया, ‘‘हम कश्मीर से हैं और जानते हैं कि अनिश्चितता के साथ जीना कैसा लगता है। लेकिन हर अस्थिरता हमें उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित कर देती है। हम दुनिया में शांति के लिए प्रार्थना करते हैं।’’