वाकई अंधेरी दुनिया
16 मार्च के अंक में, ‘अंधेरी दुनिया का आईना’ पढ़ कर स्तब्ध हूं। आखिर दुनिया किस ओर जा रही है। क्या वाकई हमारे समाज से मूल्य खत्म होते जा रहे हैं। इस लेख को पढ़ने के बाद लगता है, जैसे हम मनुष्य होना ही भूल गए हैं। शायद जानवर भी हमसे ज्यादा नैतिकता रखते होंगे। आखिर कैसे कोई महिला किसी पुरुष के लिए शिकार तलाश सकती है। मैक्सवेल के बारे में पढ़ कर मन घृणा से भर उठा। इसकी चर्चाएं तो आम हैं कि विकृत पुरुष वासना के वशीभूत स्त्री को सिर्फ विलासिता की वस्तु मानते हैं। लेकिन मैक्सवेल तो स्त्री है, उसके जमीर ने कैसे उसे दूसरी लड़कियों को जाल में फंसाने की इजाजत दी होगी। वह भी मासूम बच्चियों को। लगता है यह सब दूसरी दुनिया की बातें हैं। इन पर भरोसा करने का मन नहीं करता। अगर यह सब कुछ ऐसा ही चलता रहा, तो बाहरवालों पर तो दूर शायद हम घर के किसी व्यक्ति पर भी भरोसा करने लायक नहीं बचेंगे।
कमलकांत भाटी | रेवाड़ी, हरियाणा
गुनाहगारों को हो सजा
यौन अपराधी एपस्टीन के बारे में 16 मार्च के अंक में, ‘अंधेरी दुनिया का आईना’ आवरण कथा पढ़ी। जितना ज्यादा एपस्टीन के बारे में पढ़ते जा रहे हैं, लग रहा है कि यह कोई उपन्यास या फिल्मी पटकथा है। एपस्टीन के साथ-साथ उन चेहरों से भी नकाब उतर रहे हैं, जो इज्जतदार समझे जाते थे। वह जो करता था, वह तो अपराधी है ही, वे लोग भी कम गुनाहगार नहीं हैं, जो उसके बुलावे पर उसके आइलैंड पर जाते थे। इन लोगों में ऐसे लोग भी शामिल हैं, जिनकी समाज में प्रतिष्ठा है। वे लोग परोपकार के लिए, अपने प्रखर विचारों के लिए जाने जाते हैं। दुनिया उनकी बातें गौर से सुनती है। उन्हें सुन कर उस पर अमल करती है। वही लोग लड़कियों के बारे में कितनी गंदी सोच रखते हैं। एपस्टीन तो दुनिया में नहीं है लेकिन उसके साथ गुनाह में जो लोग भी भागीदार रहे हैं, उन्हें फांसी की सजा दे देनी चाहिए। इस मामले से यह भी समझ आता है कि सिर्फ पढ़ाई से ही किसी की मानसिकता नहीं बदली जा सकती। किसी स्त्री के साथ गलत न करने के लिए अंदरूनी ताकत जरूरी है। वरना क्या वजह है कि राजनैतिक नेता, राजनयिक, वैज्ञानिक, कुलपति, समाजशास्त्री, जैसे लोग एपस्टीन के जाल में फंस गए।
रूपमश्री वडोला | देहरादून, उत्तराखंड
सच्चा कलाकार
16 अगस्त के अंक में, ‘तुम ही न हो तो’ लेख पढ़ा। अरिजित सिंह के प्रशंसकों की कोई कमी नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि वे नई पीढ़ी के पसंदीदा गायकों में एक हैं। लेकिन जो बात उन्हें सबसे अलग बनाती है, वह है उनकी सादगी। वे आज भी सादा तरीके से रहना पसंद करते हैं। बेशक उनकी आवाज में जादू है। लेकिन आवाज की ही तरह उनका व्यक्तित्व भी बहुत बड़ा है। अपने करियर में जब सब अच्छा चल रहा हो, तब गाना छोड़ देना सबके बूते की बात नहीं है। अरिजित इसलिए ऐसा कर सके क्योंकि उनके दिमाग में शांति है। वे पैसे और शोहरत के पीछे नहीं भागते। इसी वजह से उनकी आवाज लोगों के दिल तक उतरती है। अरिजित फिर वापस गायन की दुनिया में आएं, उनके प्रशंसक दिल से यही चाहते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि सलमान खान से विवाद के बाद से उन्हें काम मिलना लगभग बंद हो गया था। इस इंडस्ट्री में वैसे भी किसी बड़े आदमी की दुश्मनी महंगी पड़ती है।
प्रशांत वाजे|कोल्हापुर, महाराष्ट्र
सोच समझ कर
16 मार्च का संपादकीय, ‘समावेशी सिनेमा’, स्पष्ट संदेश देता है। नई फिल्म घूसखोर पंडत के शीर्षक पर बवाल होगा, यह तो बनाने वाले को पहले से पता था। लेकिन वे लोग भी चाहते हैं कि विवाद बढ़े, तो कम से कम चर्चा चलती रहेगी। आज के दौर में सिनेमा किसी न किसी समुदाय को नीचे गिराने, नाम खराब करने की दृष्टि से ही बनाया जा रहा है। कहानी लिखी जाएगी, तो ऐसी कि खास समुदाय पर निशाना रहे। कलाकार के कपड़े, भावभंगिमा ऐसी रहेगी कि दर्शक तुरंत पहचान जाएं कि किसकी बात हो रही है। यह हिंदी सिनेमा का दुर्भाग्य है कि यहां स्टीरियोटाइप चित्रण हो रहे हैं। लेख में बिलकुल सही लिखा है कि शुरुआत से ही पारसी समुदाय से लेकर बिहारियों तक और दक्षिण भारतीयों से लेकर पूर्वोत्तर के लोगों सहित कई समाजों की परदे पर ऐसी छवि गढ़ी गई, जो वास्तविकता से परे थी। बस इस दौर में इतना फर्क आया है कि लोग अपमानजनक चित्रण पर आवाज उठाने लगे हैं। ज्यादा संख्या में मामले अदालत पहुंच रहे हैं। कहानी की मांग पर चरित्र गढ़ना बुरी बात नहीं है, लेकिन यह तय होना चाहिए कि कोई भी समुदाय नफरत के एजेंडे की भेंट न चढ़े।
परवीन अहमद | रोहतक, हरियाणा
मेहनत का रंग
‘जांबाजी के नए हुनरमंद’ (16 मार्च) जम्मू और कश्मीर की क्रिकेट टीम की मेहनत को दिखाता अच्छा लेख है। 67 साल बाद यदि टीम ने रणजी ट्रॉफी जीती है, तो यह इतिहास में दर्ज करने वाली घटना तो है ही साथ ही यह टीम की इच्छाशक्ति भी बताती है। जम्मू-कश्मीर टीम के लिए इस पहली खिताबी जीत को और भी खास बनाने वाली बात यह है कि उन्होंने न केवल फाइनल में शक्तिशाली कर्नाटक को हराया, बल्कि सत्र के दौरान राजस्थान, दिल्ली, हैदराबाद, बंगाल और मध्य प्रदेश जैसी टीमों को हराया, जो पहले से ही खिताब विजेता टीमें रही हैं। यह उनकी प्रतिभा और दृढ़ संकल्प का प्रमाण है। उनके वर्षों के संघर्ष और आत्मविश्वास का आखिरकार फल मिला है। उनके तेज गेंदबाज आकिब नबी ने सत्र में 12 के औसत से 60 विकेट लिए। एक तेज गेंदबाज के लिए यह अभूतपूर्व उपलब्धि है। कप्तान पारस डोगरा ने रणजी में 10,000 रन पूरे किए और अब्दुल समद और शुभम खजूरिया ने खिताब जीतने की यात्रा में उनका पूरा साथ दिया। जम्मू-कश्मीर क्रिकेट संघ के प्रशासक ब्रिगेडियर अनिल कुमार गुप्ता की भी भूमिका इस खिताबी जीत में अहम है, क्योंकि उन्होंने जम्मू-कश्मीर के क्रिकेटरों को टी20 लीग मैचों के प्रभाव से दूर रखा और उन्हें रेड गेंद क्रिकेट चुनने के लिए प्रेरित किया। जम्मू-कश्मीर की युवा पीढ़ी इस सफलता से प्रेरणा लेकर अपना भविष्य इस खेल में बनाएगी।
बाल गोविंद | नोएडा, उत्तर प्रदेश
स्थानीय प्रयास जरूरी
16 मार्च के अंक में, ‘सबरीमाला का फिर लंबा साया’, विवाद को नए सिरे से बताती है। सबसे पहले तो यह समझना होगा कि महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा राजनीति या राजनैतिक हस्तक्षेप से हल नहीं होगा। यह परंपरा शुरुआत से रही है। अचानक एक दिन कोई नेता या कोर्ट कहे कि महिलाओं को प्रवेश दो तो यह मुमकिन नहीं है। बेहतर होगा कि वहां स्थानीय स्तर पर ही इस बारे में चेतना जागृत हो, वहां के पुजारी ही इस मुद्दे को लोगों को समझाएं। यही बेहतर हल है।
प्रवेश सुमन | पटना, बिहार
पुरस्कृत पत्रः हैवानियत की हद
16 मार्च की आवरण कथा, ‘शैतानी सरगना’ रोंगटे खड़े कर देती है। एपस्टीन को शैतान नहीं हैवान कहना चाहिए। जो व्यक्ति गरीब मासूम बच्चियों को फुसला कर नरक में झोंक सकता है, वह हैवान ही होगा। इस बार की आवरण कथा के हर हिस्से में एक अलग ही कहानी है। जिन लोगों को हम पूजते हैं, इज्जत करते हैं वे भी इस खेल में शामिल है, यह सोच कर ही दिल टूट जाता है। लगता है दुनिया में अब ईमानदारी जैसा कुछ नहीं। जो पकड़ा गया उसे भले ही चोर का तमगा मिल गया हो, लेकिन सच यही है कि अब किसी पर भरोसा करने का मन नहीं करता। हम जाति, धर्म में ही उलझे हुए हैं और दुनिया इस सबको छोड़ इतनी आगे बढ़ गई है कि उसके लिए बस लड़कियों का सौदा ही सबकुछ रह गया है।
प्रेरणा यादव|मथुरा, उत्तर प्रदेश