जमानत हक है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 में रहने, जीने और जीविका चलाने के अधिकार के अलावा उस मूलभूत न्याय-सिद्धांत से निकलता है कि आरोप साबित न हो, तब तक हर कोई बेकसूर है, जिसे साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष पर है। बरसो-बरस अगर अभियोजन आरोप-पत्र ही दाखिल न कर पाए या सुनी-सुनाई बातों और किसी एक के आरोप की शक्ल में गवाही या वादा माफ गवाह के कहे की पड़ताल में ही बरसों बिता दे, तो क्या आरोपी को जेल की जलालत झेलते रहनी चाहिए? इस चक्कर में एक-दो नहीं, आधा, पूरा या डेढ़ युग (युग 12 साल का माना जाता है) बीत जाए! दरअसल यूएपीए, पीएमएलए, राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम जैसे बेहद कठोर कानून आज मोटे तौर पर ऐसी ही व्यवस्था करते हैं और इस तरह मूलभूत न्याय-सिद्धांत पर आधारित संवैधानिक व्यवस्था में व्यतिक्रम पैदा करते हैं। ये कानून आरोप झुठलाने का दायित्व भी आरोपी पर डाल देते हैं। इस तरह मूलभूत अधिकार को उलटने का सवाल आज उसी तरह मौजूं है, जैसे आधी सदी पहले चर्चित एडीएम जबलपुर मामले में कहा गया था कि इमरजेंसी के दौरान नागरिक अधिकार मुल्तवी हो जाते हैं। खैर! वह तो बाद में सुप्रीम कोर्ट से भी खारिज हुआ और 1977 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए भी। फिर, उस संशोधन ने आंतरिक इमरजेंसी लगाने के प्रावधान को ही बेमानी बना दिया या इमरजेंसी की घोषणा नामुमकिन की झोली में डाल दिया। हालांकि बाद में आतंकवाद की बिना पर पोटा और फिर उसी शक्ल में कड़े कानून आए, जो इस दौर में इस कदर कड़े होते गए कि चाहे जांच एजेंसियां कितने ही बरस बिता दें और अंतत: आरोप साबित भी न हो पाए या अदालतें आरोपों को बेतुका बता दें, तब भी उनकी कोई जवाबदेही नहीं होती है।
यहां अगले पन्नों पर बिखरी आप बीती ऐसे लोगों की है, जो बौद्धिक और सामाजिक-राजनैतिक क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं और जाने-माने चेहरे हैं। इससे यह भी अंदाजा लगया जा सकता है कि गुमनाम लोगों को कैसी यातना और आपराधिक मानसिकता का शिकार होना पड़ता होगा। यह भी गौरतलब है कि हमारी जेलें ज्यादातर विचाराधीन कैदियों और जमानत मिलने के बावजूद पैसे और गवाही देने वाले के अभाव में जेल में पड़े लोगों से ही भरी हुई हैं। इन कहानियों में यह भी गौर किया जा सकता है कि कैसे लगातार और कई विधि आयोग तथा पुलिस सुधार आयोग की सिफारिशों के बावजूद पुलिसिया कार्रवाई और जेल की व्यवस्थाएं ज्यों की त्यों बनी हुई हैं।