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2 फरवरी 2026 · FEB 02 , 2026

स्मृतिः उपस्थिति बनी रहेगी

ज्ञानरंजन की कहानियां किसी बड़े ऐतिहासिक प्रसंग या नाटकीय मोड़ से नहीं बनतीं। वे उस आदमी को पकड़ती हैं, जो अपने रोजमर्रा में थोड़ा-थोड़ा खिसकता है
ज्ञानरंजन (21 नवंबर 1936-08 जनवरी 2026)

ज्ञानरंजन के निधन के बाद यह एहसास गहराता है कि कुछ लेखक अपने जाने के बाद भी अनुपस्थित नहीं होते। उनकी उपस्थिति रूप बदल लेती है, शब्दों में, दृष्टि में और उस तरीके में, जिससे हम अपने समय को पढ़ते हैं। उनका जाना केवल एक लेखक के न रहने की सूचना भर नहीं है, बल्कि उस रचनात्मक चेतना के और स्पष्ट हो जाने का क्षण है, जो चुपचाप, बिना घोषणाओं के, अपने समय को लगातार समझती रही। ऐसे समय में उनकी रचनाओं की ओर लौटना श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उपस्थिति को पहचानने का एक जरूरी प्रयास बन जाता है।

ज्ञानरंजन की कहानियां किसी बड़े ऐतिहासिक प्रसंग या नाटकीय मोड़ से नहीं बनतीं। वे उस आदमी को पकड़ती हैं, जो अपने रोजमर्रा में थोड़ा-थोड़ा खिसकता है। अपने निर्णयों में, अपने संबंधों में, अपने नैतिक बोध में। यह खिसकन अचानक नहीं होती, बल्कि इतनी स्वाभाविक होती है कि व्यक्ति को स्वयं भी उसका एहसास नहीं होता। यही वह जगह है जहां ज्ञानरंजन अपने समय का उद्घाटन करते हैं, उसमें शामिल होकर नहीं, बल्कि उसे उजागर करते हुए।

‘बहिर्गमन’ को इसी संदर्भ में पढ़ना चाहिए। यह कहानी बाहर जाने की घटना नहीं, बल्कि बाहर जाने की मानसिकता को खोलती है। यहां बाहर जाना किसी मजबूरी का परिणाम नहीं, बल्कि चयन है। ऐसा चयन, जो धीरे-धीरे भीतर को अप्रासंगिक बना देता है। मनोहर, सोमदत्त और कथावाचक के बीच बना संबंध व्यक्तिगत त्रिकोण नहीं, बल्कि हमारे समय की संरचना है। एक वह है जो जाना चाहता है, एक वह जो जा चुका है और एक वह जो ठहरकर देख रहा है। आज के महानगरों में यह स्थिति हर जगह दिखाई देती है, करियर, संबंध, विचार और यहां तक की भाषा के स्तर पर भी। ज्ञानरंजन यहां प्रगति या अवसर पर प्रश्न नहीं उठाते, बल्कि उस क्षति को दर्ज करते हैं, जो इस चयन के साथ चुपचाप घटित होती है। कहानी के अंतिम दृश्य में विदाई के समय देर तक उठा हुआ हाथ इसी चुप क्षति का सबसे सघन प्रतीक बन जाता है।

‘घंटा’ कहानी को केवल व्यक्तिगत नैतिक द्वंद्व के रूप में पढ़ना अब अपर्याप्त है। आज यह कहानी समय के अनुशासन और संस्थागत नियंत्रण की कथा बन जाती है। ‘घंटा’ वह अंतराल है, जहां व्यक्ति स्वयं को टालता है अपनी असहमति, अपनी बेचैनी और अपने प्रश्नों को। आज के कार्यस्थलों, शैक्षणिक संस्थानों और यहां तक कि रचनात्मक संसार में भी यह ‘घंटा’ फैल चुका है। ज्ञानरंजन यह नहीं दिखाते कि व्यवस्था कैसे दमन करती है, बल्कि यह कि व्यक्ति कैसे धीरे-धीरे व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है।

‘फेंस के इधर-उधर’ ज्ञानरंजन की सबसे दूरगामी कहानियों में से एक है। यहां फेंस केवल पड़ोस की सीमा नहीं, बल्कि उस मानसिक रेखा का संकेत है, जिसके जरिए हम दूसरों को देखते, आंकते और नियंत्रित करना चाहते हैं। यह कहानी आज के डिजिटल समय में और अधिक अर्थवान हो जाती है, जहां निजी जीवन लगभग समाप्त हो चुका है। सोशल मीडिया, न्यूज चैनल और सार्वजनिक विमर्श ने हर व्यक्ति को एक-दूसरे का पड़ोसी बना दिया है। बिना निकटता के, बिना संवाद के। ज्ञानरंजन ने बहुत पहले यह पहचान लिया था कि निगरानी की यह इच्छा केवल सत्ता की नहीं, सामान्य जीवन की भी एक प्रवृत्ति बनती जा रही है।

‘अमरूद का पेड़’ में वे जीवन की उस परत को छूते हैं, जिसे आधुनिक समय सबसे पहले खो देता है। साझा अनुभव की सहजता। यह कहानी किसी बड़े संघर्ष की नहीं, बल्कि उस नैतिक स्पेस की है, जहां चीजें केवल उपयोग की वस्तु नहीं होतीं, बल्कि संबंधों की स्मृति बन जाती हैं। आज, जब हर बात निजी स्वामित्व और त्वरित लाभ के दायरे में सिमट गई है, यह कहानी हमें याद दिलाती है कि नैतिकता छोटे निर्णयों और साधारण क्षणों में आकार लेती है।

‘पिता’ कहानी पढ़ते हुए धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता है कि यहां पिता केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक उपस्थिति है। ऐसी उपस्थिति, जो शारीरिक रूप से अनुपस्थित होने के बाद भी जीवन को निर्देशित करती है। इस कहानी से बाहर आते हुए ज्ञानरंजन स्वयं ऐसे ही पिता-तुल्य व्यक्तित्व के रूप में दिखाई देते हैं।

बतौर संपादक, ‘पहल’ पत्रिका के माध्यम से, उन्होंने असंख्य लेखकों और रचनात्मक आवाजों को स्थान दिया। वे संपादक नहीं, संरक्षक की तरह उपस्थित रहे। बिना किसी सत्ता-भाव के, बिना किसी आधिकारिक मुद्रा के। आज, जब संपादन भी प्रबंधन और ब्रांडिंग का हिस्सा बनता जा रहा है, ज्ञानरंजन का संपादकीय व्यक्तित्व और अधिक विशिष्ट लगता है। 

शायद इसलिए ज्ञानरंजन का व्यक्तित्व उनकी रचनाओं से अलग नहीं दिखाई देता। उनमें वह दुर्लभ गुण था, जो आज के समय में लगभग अनुपस्थित हो चुका है, बिना केंद्र में आए प्रभाव डालने की क्षमता। उनके जाने के बाद स्पष्ट होता है कि कुछ लेखक शब्दों के साथ नहीं जाते, समय के भीतर रह जाते हैं।

ज्ञानरंजन को पढ़ते हुए हम केवल साहित्य नहीं पढ़ते, हम अपने समय की बनावट को पढ़ते हैं। शायद यही कारण है कि उनकी अनुपस्थिति हमें बार-बार उनकी ओर लौटने को बाध्य करती है। अब वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कहानियों की तरह, वे हमेशा हमारे भीतर उपस्थित रहेंगे।

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