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2024 की चुनौतियां/नजरिया: किसमें है मोदी सत्ता पलटने की ताकत

विपक्ष गणित के जरिये 2024 में बाजी उलटने की सोच रहा पर उसके पास लोकलुभावन विश्वसनीय अफसाने का अभाव ही सबसे बड़ा रोड़ा
12 राज्यों में ही सही, क्या राहुल यात्रा कांग्रेस को सक्रिय कर पाएगी?

भाजपा खालिस अपने बूते सिर्फ दो बड़े राज्यों में है, उत्तर प्रदेश और गुजरात। कांग्रेस के पास भी दो ही राज्य हैं, राजस्थान और छत्तीसगढ़। 2024 में कांग्रेस कम से कम सौ सीटों पर जीत चाहती है। वहीं भाजपा हर हाल में 272 के बहुमत के आंकड़े को तीसरी बार पार करना चाहती है। बाकी दर्जन भर राज्यों में क्षत्रपों की सत्ता है जबकि कर्नाटक और मध्य प्रदेश में भाजपा ने कांग्रेस के विधायकों को तोड़कर या खरीद कर सरकार बनाई। विपक्ष का बंटा होना ही मोदी की जीत पर मुहर है। विपक्ष अगर राज्यवार सीटों को लेकर एकजुट हो जाए तो 2024 में मोदी को हराना बाएं हाथ का खेल है। पटना से दिल्ली पहुंच कर विपक्ष को एकजुट करने में लगे (बिहार के मुख्यमंत्री) नीतीश कुमार की बैठक का यही वह मंत्र है, जिस पर हर बैठक में चर्चा होती रही। और बहस का अंत कांग्रेस क्या करेगी, इस पर आकर चर्चा खत्म हो गई। यानी ओटीटी प्लेटफॉर्म की किसी वेब सिरीज की तर्ज पर अगली बैठक का इंतजार विपक्ष का हर वह नेता कर रहा है, जो 2024 में मोदी सत्ता को गद्दी पर देखना नहीं चाहता।

कांग्रेस विपक्ष के लिए सस्पेंस है। राहुल की भारत जोड़ो यात्रा ने इस सस्पेंस को और बढ़ा दिया है क्योंकि कांग्रेस के भीतर यह सवाल जोर पकड़ने लगा है कि यात्रा खत्म होने के बाद राहुल गांधी बदल चुके होंगे, कांग्रेस बदल जाएगी, देश का नजरिया भी कांग्रेस के संघर्ष को मान्यता देगा और 2024 में प्रधानमंत्री मोदी के सामने राजनीतिक चुनौती देते हुए राहुल गांधी ही खड़े होंगे। यानी मोदी की सत्ता को चुनौती देगा कौन, यह सवाल कांग्रेस और बाकी विपक्ष की गोलबंदी पर जा टिका है। नीतीश हर किसी को यही समझा रहे हैं कि विपक्ष एकजुट होगा तो कांग्रेस को विपक्ष के पीछे खड़ा होना ही पड़ेगा। वही नीतीश कांग्रेस को भी यही मैसेज दे रहे हैं कि अगर कांग्रेस चुनौती देती हुई दिखाई देगी और राहुल अगुवाई करते हुए नजर आ गए तो फिर एकजुट विपक्ष कांग्रेस के पीछे खड़ा होने से कतराएगा नहीं।

सभी को एकजुट करने निकले नीतीश हों या विपक्ष के कद्दावर क्षत्रप, सभी के सामने सवाल तीन हैं। एक, लोकसभा चुनाव को विधानसभा चुनाव से अलग देखकर क्या क्षत्रप अपनी राजनीति साध पाएंगे या बचा पाएंगे? दूसरे, कांग्रेस जिन राज्यों में भाजपा से सीधे नहीं टकराती उन राज्यों में क्षत्रप कांग्रेस को नेतृत्व कैसे थमा दें? तीसरे, कांग्रेस के बिना विपक्ष की एकजुटता उसी तीसरे मोर्चे की शक्ल ले पाएगी जो सफल नहीं होता बल्कि सत्ताधारी पार्टी को लाभ पहुंचा देता है। इन सवालों का जवाब न तो नीतीश के पास है, न ही ममता बनर्जी, शरद पवार, के. चंद्रशेखर राव, केजरीवाल, अखिलेश यादव, चंद्रबाबू नायडू या उद्धव ठाकरे के पास। सिर्फ सीताराम येचुरी यह कहकर सहमति बनाना चाहते हैं कि जब सवाल लोकतंत्र और संविधान का हो तो राजनीति की छोटी-छोटी लकीरें मिटानी होंगी। 2024 की बिसात यहीं से शुरू होती है। मुद्दे मायने रखेंगे। परसेप्शन मायने रखेगा। या फिर गणित मायने रखेगा। मोदी खुद परसेप्शन पर टिके हैं। विपक्ष की एकजुटता गणित देख रही है। कांग्रेस मुद्दों के आसरे अपनी मौजूदगी चाहती है।

नरेंद्र मोदी का परसेप्शन हिंदुत्व और राष्ट्रवाद पर टिका है, जिसका विस्तार भाजपा इस हद तक कर चुकी है कि जातिगत और धार्मिक ध्रुवीकरण हो या राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल, सारे मुद्दे इस दायरे में आकर सिमट जाएं। और जहां क्षत्रप इस सवाल को भेदने में सफल हो जाएं, वहां सोशल इंजीनियरिंग और 80-20 का खुला खेल खेला जा सके। इस परसेप्शन को मजबूत बनाने में पहली बार मेनस्ट्रीम मीडिया को भी समाज के ध्रुवीकरण का हथियार बना दिया गया है। संवैधानिक संस्थान हों या न्यायिक फैसलों की धार, सब कुछ राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में सिमटा दिया गया है। असल मुश्किल यही है कि मोदी के राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के परसेप्शन को भेदने में विपक्ष फेल हो चुका है। इस परसेप्शन को भेदने के लिए विपक्ष के पास लोकतंत्र और संविधान का ही सवाल है, लेकिन आम आदमी के लिए विपक्ष के ये सवाल चुनावी जीत नहीं दिला सकते। 2024 में भी यही मुश्किल विपक्ष के सामने है कि वह मोदी के परसेप्शन को कैसे भेदे।

कांग्रेस जानती है कि विपक्ष की कतार में तमाम राजनीतिक दलों की तुलना में वह अकेली पार्टी है जिसको मिले वोट समूचे विपक्ष से भी ज्यादा हैं। यानी जो कांग्रेस सबसे बुरे दिनों को 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में  देख चुकी है बावजूद इसके विपक्ष के बाकी दलों की तुलना में उसकी स्थिति बेहतर है, लेकिन उसी के पास 2024 के लिए कोई तुरुप का पत्ता नहीं है। कोई मुद्दा ऐसा नहीं है जो मोदी की सत्ता को भेद सके। 2024 से पहले छत्तीसगढ़ और राजस्थान का किला अगर बच गया तो 2014 के बाद कांग्रेस की यह सबसे बड़ी सफलता होगी। ‘गब्बर सिंह टैक्स’ और ‘चौकीदार चोर है’ जैसे लोकप्रिय नारों के जरिये तीखे प्रहार कांग्रेस को मोदी के खिलाफ वोट नहीं दिला सके। उलटे कांग्रेसियों की एक लंबी कतार ही राहुल गांधी को निशाने पर लेकर मोदी के खेमे में चली गई। इस कड़ी में गुलाम नबी आजाद के मोदी प्रेम ने तो भाजपा की ‘मुसलमान माइनस भारत’ की राजनीति में जैसे पैबंद लगा दिया। या कहिए एनआरसी-सीएए के जरिये मुसलमानों को हाशिये पर धकेलने की भाजपा की सोच को चुनौती देने वाली कांग्रेस की राजनीति की धार को ही आजाद ने कांग्रेस छोड़कर और मोदी की तारीफ करके भोथरा कर दिया।

तो, 2024 में मोदी सत्ता के विकल्प के लिए कांग्रेस के पास भी परसेप्शन बनाने का संघर्ष है। इसीलिए तो कांग्रेस मोदी के परसेप्शन को राहुल गांधी के जरिये ही भेदने के खातिर भारत जोड़ो यात्रा पर निकल पड़ी। लेकिन यह यात्रा वोट में तब्दील हो पाएगी? 12 राज्यों में ही सही, क्या राहुल यात्रा कांग्रेस को सक्रिय कर पाएगी? जबकि राहुल गांधी उन्हीं गलियों से निकलेंगे जहां महंगाई-बेरोजगारी, नफरत-डर के सवाल खासे बड़े हैं। फिर, पहली बार कांग्रेस ने सेंटर से राइट न जाकर खुद को लेफ्ट की ओर धकेला है जबकि वामंथियों का केरल छोड़कर हर जगह सूपड़ा साफ हो चला है। तीन दशक तक बंगाल में राज करने वाले वामपंथियों के पास आज एक भी सीट नहीं है। फिर, कारपोरेट को लेकर तमाम मामलों में मोदी सत्ता ने खुद को कांग्रेस से कई कदम आगे कर लिया है। कांग्रेस का संकट है कि अंबानी-अडाणी का विरोध करने के बावजूद कांग्रेस शासित राजस्थान-छत्तीसगढ़ के पास अंबानी-अडाणी के धंधे को बढ़ाए बगैर कोई मॉडल नहीं है। यानी मुद्दों का खोखलापन कांग्रेस के जरिये ही मोदी सत्ता के लिए ऑक्सीजन का काम कर रहा है। तो फिर 2024 में कोई चमत्कार ही कांग्रेस को खड़ा कर सकता है। लेकिन वह चमत्कार मोदी के राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल पर कैसे भारी पड़ेगा?

इसलिए तीसरी और आखिरी कड़ी में विपक्ष का भरोसा चुनावी सीटों के गणित पर है जहां वह मान कर चल रहा है कि 2019 में ही जब आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल की कुल 73 सीटों में से एक भी सीट भाजपा नहीं जीत पाई तो इस बार कैसे जीतेगी। फिर बंगाल, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, पंजाब की 126 सीटों में से पिछली बार भाजपा 52 सीटें जीती थी, अगर वह आधी भी हो जाए तो भाजपा एक झटके में 277 पर आ जाएगी।  2019 में भाजपा को सबसे ज्यादा लाभ जिन राज्यों में हुआ, वहां उसने कांग्रेस-जेडीएस-शिवसेना को तोड़कर सत्ता पाई है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य प्रदेश की 105 सीटों में से 76 पर भाजपा जीती थी, अगर यहां वह 50 सीटें भी जीतती है तो मोदी का आंकड़ा बहुमत से कम 250 पर आ जाएगा। साथ ही कांग्रेस अगर राजस्थान और छत्तीसगढ़ का किला बचा लेती है और केजरीवाल दिल्ली में कुछ कमाल करते हैं तो भाजपा को सरकार बनाना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि इन तीन राज्यों की 43 में से 40 सीटें उसके पास हैं। अगर ये आधी हो गईं तो भाजपा 225 से 240 सीटों के बीच फंस जाएगी। अगर ऐसा होता है तो सत्ता की खातिर संघ भाजपा के भीतर मोदी का विकल्प खोजना शुरू कर देगा क्योंकि विपक्ष की एक लंबी कतार है जो भाजपा को पसंद करती है लेकिन मोदी के खिलाफ है।

विपक्ष के इस रवैए को कांग्रेस भी समझ रही है और संघ भी। इसीलिए सत्ता को लेकर संघ ज्यादा चितिंत नहीं है पर विपक्ष की एकजुटता को लेकर कांग्रेस में कोई उत्साह नहीं है। कांग्रेस मान रही है कि वह है तो ही विपक्ष है। इसलिए भारत जोड़ो यात्रा के जरिये कांग्रेस के सपने बड़े हैं। उसे लगने लगा है कि भारत जोड़ो यात्रा का रंग अगर जनता पर चढ़ गया तो जनता ही 2024 में विपक्ष की भूमिका में खड़ी हो सकती है। तब मोदी की सत्ता को पलटने में वक्त नहीं लगेगा। यानी 2024 का सबसे बड़ा जवाब यही है कि मोदी की सत्ता तभी पलटेगी जब 2024 के लोकसभा चुनाव में जनता खुद राजनीतिक भूमिका में आ जाए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और टिप्पणीकार हैं। विचार निजी हैं)