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23 जनवरी 2023 · JAN 23 , 2023

नेपाल: प्रचंड सत्ता परिक्रमा

नई सरकार का टिके रहना सकारात्मक होगा लेकिन प्रचंड की छवि से भविष्य पर सवाल
प्रधानमंत्री प्रचंड

नेपाल में पुष्प कमल दहाल (प्रचंड) ने 26 दिसम्बर को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। अपनी प्रकृति के अनुरूप हर बार की तरह फिर उन्होंने सारे अनुमानों को गलत साबित करते हुए केपी ओली से हाथ मिला लिया जिसके साथ पिछले दो वर्षों से उनका शीत युद्ध चल रहा था और शेर बहादुर देउबा का साथ छोड़ दिया जिसके साथ मिल कर उन्होंने पाँच पार्टियों का मोर्चा बनाया था और चुनाव लड़ा था।

2008 में राजतंत्र की समाप्ति के बाद प्रचंड तीसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं। केपी ओली तीन बार और देउबा पाँच बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं। अगर प्रचंड ने ‘धोखा’ नहीं दिया होता तो देउबा को छठी बार इस पद को सुशोभित करने का अवसर मिलता। प्रसंगवश यह बताना दिलचस्प होगा कि जनता की समस्याओं से आंखें मूंदे ‘कुर्सी दौड़’ में लगे नेताओं से क्षुब्ध हो कर इस बार चुनाव के मौके पर युवकों के एक समूह ने सोशल मीडिया पर #NoNotAgain अभियान चलाया और यह अभियान इतना व्यापक हो गया कि नेपाल के मुख्य चुनाव आयुक्त को एक चेतावनी जारी करनी पड़ी कि अगर सोशल मीडिया पर नेताओं के खिलाफ नकारात्मक टिप्पणी करता कोई पाया जाएगा तो उसे एक लाख रुपये का जुर्माना या पाँच वर्ष की सजा या दोनों भुगतना होगा। इससे पता चलता है कि नेपाल की जनता में इस बार चुनाव को लेकर बहुत हताशा थी।

इस चुनाव में कुछ सर्वथा नई पार्टियों ने अच्छा प्रदर्शन किया। चुनाव से महज कुछ ही माह पूर्व जुलाई 2022 में स्थापित ‘राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी’ को 20 सीटें, जनवरी 2022 में स्थापित ‘पीपुल्स फ्रीडम पार्टी’ को चार सीटें और 2019 में स्थापित ‘जनमत पार्टी’ को छह सीटें मिली हैं। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रबि लमिछाने पहले एक टेलीविजन चैनल में लोकप्रिय ऐंकर थे और उन्हें अब प्रचंड ने अपने मंत्रिमंडल में उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री का पद सौंपा है।

बदलाव की पृष्ठभूमि

कितने दूर कितने पासः केपी ओली

सितंबर 2015 में नेपाल का संविधान बना और संविधान बनने के दूसरे ही दिन से आर्थिक नाकाबंदी शुरू हो गई। नए संविधान के कुछ प्रावधानों से भारत खुश नहीं था और संविधान निर्माण की प्रक्रिया के दौरान भारत की दखलंदाजी पर नेपाल के कम्युनिस्ट नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर आपत्ति की थी। उसी वर्ष अक्टूबर में केपी ओली प्रधानमंत्री बने और फरवरी 2016 तक उनको इस नाकाबंदी से जूझना पड़ा। केपी ओली की सरकार माओवादियों के समर्थन से बनी थी और जैसे ही माओवादी नेता प्रचंड ने जुलाई 2016 में समर्थन वापस लेने की घोषणा की, उनकी सरकार गिर गई। प्रचंड ने नेपाली कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई, प्रधानमंत्री भी बन गए लेकिन उनके इस कदम को नेपाली जनता ने पसंद नहीं किया और सब ने यह आशंका व्यक्त की कि प्रचंड ने भारत के इशारे पर ओली की सरकार गिराई- वह भी ऐसे समय जब प्रधानमंत्री के रूप में केपी ओली भारत की दादागिरी का मुकाबला कर रहे थे। इस घटना के बाद नेपाल में बहुत कुछ हुआ।

माओवादी नेता प्रचंड और नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा ने बारी-बारी प्रधानमंत्री का पद संभाला और सत्ता संचालन किया। नए संविधान के तहत नवगठित राज्यों के चुनाव सफलतापूर्वक हुए। फिर एक अप्रत्याशित घटना हुई- केपी ओली की पार्टी नेकपा (एमाले) और प्रचंड की पार्टी नेकपा (माओवादी केंद्र) ने मिलजुल कर चुनाव में हिस्सा लिया। चुनाव में इस गठजोड़ को अप्रत्याशित सफलता मिली। भारत के सत्ताधारी वर्ग की परंपरागत रूप से पसंदीदा पार्टी नेपाली कांग्रेस हाशिये पर चली गई और इन दोनों वामपंथी पार्टियों की एकता ने कम्युनिस्टों को नवगठित संसद में दो-तिहाई के करीब पहुंचा दिया। चुनाव से पहले हुए एक समझौते के तहत फरवरी 2018 में केपी ओली एक बार फिर प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए। इसके कुछ ही समय बाद मई 2018 में दोनों पार्टियों का विलय हो गया और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के नाम से एक नई पार्टी का उदय हुआ। नेपाल की जनता को ऐसा महसूस हुआ कि एक बार फिर देश की राजनीति में कम्युनिस्टों का वर्चस्व स्थापित हो गया है।

लेकिन उनका यह हर्षोन्माद बहुत दिनों तक नहीं टिक सका। 2020 आते-आते प्रचंड और ओली के बीच अनेक मुद्दों को लेकर तनाव काफी बढ़ गया जिसकी परिणति पार्टियों के अलग होने में हुई। एक अदालती निर्णय के तहत केपी ओली के पास उनकी पार्टी नेकपा (एमाले) और प्रचंड के पास उनकी पार्टी नेकपा (माओवादी केंद्र) वापस चली गई। बेशक, नेकपा (एमाले) से उसके कुछ प्रमुख नेता ओली की नीतियों का विरोध करते हुए अलग हुए जिनमें दो पूर्व प्रधानमंत्री माधव नेपाल और झलनाथ खनाल भी थे। माधव नेपाल ने नेकपा (एकीकृत समाजवादी) नाम से एक अलग पार्टी बना ली। अब केपी ओली की सरकार अल्पमत में आ गई थी लिहाजा उसे जाना पड़ा और उसकी जगह ले ली शेर बहादुर देउबा की सरकार ने, जो पांच पार्टियों का गठजोड़ थी।

जिन दिनों नाकाबंदी चल रही थी केपी ओली ने चीन के साथ कुछ समझौते किए थे ताकि जरूरी सामानों की आपूर्ति में भारत की ओर से जो रुकावट पैदा की गई है उसका समाधान ढूंढा जाए। नाकाबंदी की घटना ने ओली को सचमुच भारत के विरुद्ध खड़ा कर दिया था। ऐसी स्थिति में ओली का प्रधानमंत्री पद पर चुना जाना भारत सरकार के लिए बहुत सुखद नहीं था। अप्रैल 2018 में केपी ओली जब भारत सरकार के निमंत्रण पर प्रधानमंत्री की हैसियत से दिल्ली आए थे, तब यात्रा से महज चार दिन पहले उनके विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली ने पत्रकारों से बातचीत में नाकाबंदी के दिनों को याद करते हुए कहा था, 'उस समय हमने जो रुख अख्तियार किया उस पर हमें गर्व है'। उनका आशय भारत के सामने न झुकने से था। चीन की ओर खुलकर मुखातिब होने का भी वही दौर था।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान चीन का नेपाल की बहुत सारी परियोजनाओं में जबर्दस्त निवेश हुआ है। बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआइ) के जरिये चीन ने नेपाल के इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास की भी अच्छी-खासी योजना तैयार की है। संभवत: चीन के ही आश्वासन के आधार पर 2018 में केपी ओली ने अगले पांच साल का जो कार्यक्रम तैयार किया उसके अनुसार ईस्ट वेस्ट हाईवे के समानांतर रेल लाइन बिछाना, रसुवागढ़ी से लेकर लुंबिनी तक रेल व्यवस्था तैयार करना, काठमांडो के चारों तरफ रिंग रोड को मेट्रो रेल व्यवस्था से संपन्न करना और परिवहन के क्षेत्र में नेपाल में एक क्रांति लाना है। हाइड्रोइलेक्ट्रिक के क्षेत्र में भी उन्होंने अनेक परियोजनाएं शुरू कीं। ओली ने प्रधानमंत्री रहते हुए चीन के साथ एक ‘ट्रांजिट ऐंड ट्रांस्पोर्टेशन एग्रीमेंट’ किया गया था। इससे नेपाल को चीन के समुद्री एवं थल बंदरगाहों तक जाने की सुविधा मिल जाती है जिससे भू-आवेष्ठित नेपाल की भारत पर निर्भरता कम होगी।

अब देखना है कि प्रचंड के प्रधानमंत्रित्व काल में ओली की शुरू की हुई ये परियोजनाएं, खास तौर पर बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव तथा नेपाल और चीन के बीच रेल लाइन बिछाने की योजना कितना आगे बढ़ती है। प्रचंड के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के अगले दिन ही एक छह सदस्यीय चीनी प्रतिनिधिमंडल का काठमांडो पहुंचना इस बात का संकेत है कि चीन को इस दिशा में काफी उम्मीद है।

दो साल के बाद?

मौजूदा चुनाव में देउबा के सत्तारूढ़ गठबंधन को 136 सीटें मिली हैं। 275 सदस्यों की प्रतिनिधि सभा में बहुमत के लिए कुल 138 सीटों की जरूरत होती है। गठबंधन के पास दो सीटें कम थीं। गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी नेपाली कांग्रेस के पास 89 और प्रचंड की नेकपा माओवादी केंद्र के पास महज 32 सीटें हैं। इसके अलावा नेकपा (एकीकृत समाजवादी) के पास 10, लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के पास चार और राष्ट्रीय जन मोर्चा पार्टी के पास एक सीट है। इन सब का योग 136 होता है। इस बात पर तो मौखिक रूप से एक सहमति बन गई थी कि देउबा और प्रचंड ढाई-ढाई साल के लिए प्रधानमंत्री रहेंगे लेकिन पहले इस पद को कौन संभालेगा, इस पर गतिरोध बना रहा। इसकी परिणति प्रचंड के मोर्चे से अलग हो कर केपी ओली के खेमे में चले जाने के रूप में हुई। कम से कम सतह पर तो यही दिखाई दे रहा है।

लेकिन मामला इतना आसान नहीं है। 2015 के बाद से ही जब से भारत ने नेपाल के खिलाफ आर्थिक नाकाबंदी लगाई, चीन की सक्रियता बढ़ती चली गई। नेपाली राजनीतिक प्रेक्षकों और मीडिया का मानना है कि 2018 में भी दोनों पार्टियों को एक साथ लाने में चीन की महत्वपूर्ण भूमिका थी। 2020 में जब प्रचंड और केपी ओली के बीच मतभेद काफी तीखा हो गया उस समय भी नेपाल स्थित चीनी राजदूत ने काफी हद तक खुले तौर पर दोनों नेताओं के बीच एकता कराने की कोशिश की थी। दरअसल आर्थिक नाकाबंदी जैसा मूर्खतापूर्ण कदम उठाकर भारत ने नेपाल को चीन के काफी करीब पहुंचा दिया था।

इस पृष्ठभूमि में देखें तो भारत यही चाहता था कि उसकी परंपरागत पार्टी नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार का गठन हो। कांग्रेस गठबंधन में रहते हुए अगर किसी तरह प्रचंड प्रधानमंत्री बनते तो भी भारत उतना असहज नहीं महसूस करता जितना अभी केपी ओली के नेतृत्व वाले गठबंधन में प्रचंड के प्रधानमंत्री बनने से वह महसूस कर रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि 78 सीटों वाली नेकपा एमाले के सामने 32 सीटों वाली प्रचंड की पार्टी नेकपा (माओवादी केंद्र) क्या स्वतंत्र ढंग से काम कर पाएगी?

दक्षिण एशिया के सत्ता समीकरण को देखते हुए इस सरकार का टिके रहना सकारात्मक परिणाम देगा। चूंकि नए संविधान में यह प्रावधान है कि सरकार के शपथ ग्रहण के बाद दो साल तक अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता इसलिए कम से कम दो साल तक तो इसका टिके रहना निश्चित ही है। लेकिन प्रचंड की एक ‘ढुलमुल’, ‘अविश्वसनीय’ और ‘सत्तालोलुप’ नेता वाली जो छवि बन गई है उसे देखते हुए कुछ कहा नहीं जा सकता कि दो साल बाद इस सरकार का भविष्य क्या होगा!  

(लेखक नेपाली राजनीति के जानकार और वरिष्ठ स्तंभकार हैं)