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जनादेश ’23/राजस्थान: चाल-चरित्र एक, बस चेहरे अलग

बाहुबल और धनबल के मामले में भाजपा और कांग्रेस सहित छोटे प्रांतीय दलों के प्रत्याशियों का चरित्र कमोबेश एक जैसा
प्रचार के स्टारः नरेंद्र मोदी के साथ राजस्थान के भाजपा नेता

करीब हफ्ते भर क्रिकेट विश्व कप के चलते बेरंग रहा राजस्थान विधानसभा चुनाव आखिरी के चार दिन भी परवान नहीं चढ़ सका, जबकि दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलों कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने अपने स्टार प्रचारकों को मैदान में उतार दिया। एक तरफ नरेंद्र मोदी जैसे बड़े नेता अपनी पार्टी के वादे करते और दूसरी पार्टी के वादों का परदाफाश करते  नजर आए तो दूसरी तरफ राहुल गांधी ने कांग्रेस के वॉर रूम का दौरा कर जता दिया कि वे इस चुनाव को कितनी गंभीरता से ले रहे हैं।

ऑप्टिक्स की ऐसी राजनीति से मतदाता के भरोसे को अपने हक में टिकाए रखने और घोषणापत्र में दी गई कल्याणकारी गारंटियों के सहारे उसे लुभाए रखने की दोहरी कवायद के बरक्स दिवाली के ठीक बाद एक दिलचस्प रिपोर्ट सार्वजनिक होती है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की मौजूदा प्रत्याशियों और निवर्तमान विधायकों पर केंद्रित यह रिपोर्ट दोनों प्रमुख दलों की कल्याणकारी गारंटियों के समक्ष एक विडंबना उपस्थित करती है।

इस बार राजस्थान में चुनाव लड़ रहे कुल 1875 प्रत्याशियों में से करीब 30 फीसदी के ऊपर आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं और इनमें से 35 फीसदी करोड़पति हैं। पिछले चुनाव में प्रत्याशियों की संख्या 2000 से ज्यादा थी लेकिन आपराधिक मुकदमों वाले प्रत्याशी केवल 24 फीसदी थे। इस मामले में पार्टियों के अनुपात को देखें, तो 2018 से कांग्रेस ने दो फीसदी ज्यादा अपराधियों को टिकट दिए हैं लेकिन भाजपा ने पिछली बार के 17 फीसदी से बढ़ाकर अपराधियों को इस बार 31 फीसदी कर दिया है। बसपा और सीपीएम को छोड़ दें, तो निर्दलीय सहित बीटीपी, आप और आरएलपी के आपराधिक रिकॉर्ड वाले प्रत्याशी इस बार बढ़े हैं।

ये आंकड़े इसलिए अहम हैं क्योंकि तकरीबन सभी दलों ने 13 फरवरी, 2020 को सुप्रीम कोर्ट के दिए आदेश की खुलेआम धज्जियां उड़ाई हैं। सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि राजनीतिक दलों को यह स्पष्ट करना होगा कि उन्होंने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार क्यों खड़े किए और साफ-सुथरे उम्मीदवार क्यों नहीं दिए। इस संदर्भ में एडीआर की रिपोर्ट कहती हैः “2023 में हुए पिछले चार विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों ने आपराधिक प्रत्याशी चुनने के पीछे निराधार और वाहियात कारण गिनवाए थे, जैसे व्यक्ति की लोकप्रियता, उसका सामाजिक काम, या यह कि आपराधिक प्रकरण राजनीति से प्रेरित है। दागदार छवि वाले उम्मीदवारों को खड़ा करने का यह ठोस और वैध कारण नहीं है। यह डेटा साफ तौर से बताता है कि चुनाव प्रणाली को सुधारने में राजनीतिक दलों की कोई दिलचस्पी नहीं है और हमारा लोकतंत्र कानून तोड़ने वालों को कानून बनाने वालों के रूप में चुनकर उन्हीं के हाथों प्रताड़ित होता रहेगा।”

राहुल गांधी के गहलोत और पायलट

राहुल गांधी के साथ गहलोत और पायलट

यह तो केवल अपराध से जुड़े प्रत्याशियों के आंकड़े हैं। ये चुनाव मतदाताओं को लाभ की गारंटी देने के नुक्ते पर हो रहे हैं, इसलिए यह भी देखना दिलचस्प होगा कि जिन्हें सदन में पहुंच कर लोगों को लाभ पहुंचाना है उनकी अपनी आर्थिक स्थिति क्या है। रिपोर्ट के अनुसार 13.5 फीसदी प्रत्याशी पांच करोड़ रुपये से ज्यादा संपत्ति के मालिक हैं, करीब 11 फीसदी प्रत्याशियों की संपत्ति दो से पांच करोड़ रुपये के बीच है जबकि पचास लाख से दो करोड़ के बीच के संपत्तिधारक उम्मीदवार 22 फीसदी हैं। इस तरह मोटे तौर से माना जा सकता है कि एक-तिहाई से ज्यादा (35 फीसदी) उम्मीदवार करोड़पति हैं। यह आंकड़ा 2018 में 27 फीसदी था।

यह 35 फीसदी का आंकड़ा प्रांतीय दलों और निर्दलीयों के चलते है वरना अगर भाजपा और कांग्रेस को ही लें, तो औसत करोड़पति उम्मीदवार 86 फीसदी ठहरेंगे। भाजपा ने 88 फीसदी और कांग्रेस ने 84 फीसदी करोड़पति उम्मीदवार खड़े किए हैं। चुनाव में लड़ने और चुने जाने का सीधा संबंध कैसे पैसे के साथ है, यह बीटीपी के आंकड़े से साफ होता है जिसका पिछले चुनाव में एक भी प्रत्याशी करोड़पति नहीं था, लेकिन इस बार एक करोड़पति है।

बाहुबल और धनबल के मामले में प्रत्याशियों की संख्या का 2018 के मुकाबले इस बार बढ़ना इस तथ्य में भी झलकता है कि इस बार राजनीतिक दलों ने कम संख्या में पढ़े-लिखे लोगों को चुनाव में उतारा है। रिपोर्ट में साक्षर, पांचवीं पास, आठवीं पास, दसवीं पास, इंटर पास, स्नातक, परस्नातक की श्रेणियों में इस बार 2018 की तुलना में कम उम्मीदवार खड़े हैं। केवल एक श्रेणी ग्रेजुएट प्रोफेशनल्स की है जिसकी योग्यता वाले प्रत्याशी मामूली रूप से बढ़े हैं।

इसके अलावा कुल प्रत्याशियों का केवल 10 फीसदी महिलाएं हैं। यह सभी राजनीतिक दलों के लिए एक विडंबना है क्योंकि सभी ने एक स्वर में महिला आरक्षण का समर्थन किया था। कांग्रेस पार्टी ने महिला आरक्षण के मुद्दे पर सरकार का समर्थन करते हुए संसद में पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के आरक्षण की बात विशेष रूप से उठाई थी। इसलिए माना जा रहा था कि दोनों राष्ट्रीय दल अबकी विधानसभा चुनावों में टिकट वितरण में महिलाओं और ओबीसी को तवज्जो देंगे। दोनों दलों ने महिलाओं को तो खास तवज्जो नहीं दी, लेकिन ओबीसी के मामले में कांग्रेस दो कदम ही भाजपा से आगे रही। भाजपा ने राजस्थान में 70 ओबीसी उतारे हैं तो कांग्रेस ने 72 ओबीसी प्रत्याशी दिए हैं।

ये आंकड़े इस बात की ओर संकेत करते हैं कि राजनीतिक दलों की दी हुई कल्याणकारी गारंटी के साथ उनके चुने प्रत्याशियों का प्रोफाइल असंगत है। प्रत्याशी यदि करोड़पति और अपराधी होंगे, तो राज्य की गारंटी पर संदेह ही पैदा करेंगे। लाभार्थी शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल करने वाली भाजपा और राजस्थान चुनाव में इसके प्रयोग से न्यूनतम आय गारंटी का प्रचार करने वाली कांग्रेस, दोनों ही इस मामले में समान मंशा को प्रदर्शित करती हैं।

असल में, पूंजी के पुनर्वितरण और उत्पादक रोजगार, इन दोनों फॉर्मूलों से इतर सरकारी इमदाद की शक्ल में वादे किए जा रहे हैं। साथ ही विरोधी के भ्रष्टाचार गिनाए जा रहे हैं। कांग्रेस, भाजपा, आरएलपी, आप आदि दलों के प्रत्याशियों के समान प्रोफाइल से इतर एक और सच्चाई यह है कि चुनाव प्रचार का यह तरीका भी इन दलों को एक बनाता है। इस बार बड़ी दिक्कत यह भी है कि न तो कांग्रेस सरकार के खिलाफ कोई हवा है, न ही भाजपा या अन्य दल अपना कोई चुनावी एजेंडा खड़ा कर पाए हैं।

ऐसे में राजस्थान का मतदाता या तो अंत तक भ्रमित रहेगा या फिर हो सकता है कि उसने काफी पहले ही मन बना लिया हो कि किसको वोट देना है। राजस्थान का मतदाता आम तौर से मुखर भी नहीं होता, इसलिए राजस्थान को लेकर किए जाने वाले चुनावी सर्वे, दावे और पोल अक्सर गलत साबित होते रहे हैं।

इस बार खास तौर से चुनाव प्रचार के दौरान एक एक बाद एक पड़े त्योहार और विश्व कप क्रिकेट ने चुनाव को कायदे से खड़ा नहीं होने दिया है। प्रत्याशियों के मामले में सबसे ज्यादा गरम जिले जयपुर की शहरी सीटें करीब हफ्ता भर ठंडी पड़ी रही हैं। जयपुर जिले की सीटों पर कुल 199 प्रत्याशी खड़े हैं लेकिन हवामहल, विद्याधर नगर, किशनपोल, सिविल लाइंस, मालवीय नगर, सांगानेर, झोटवाड़ा जैसी शहरी सीटों पर प्रत्याशियों को अपने प्रचार कार्यक्रम आखिरी समय पर टालने या बदलने पड़ गए क्योंकि कार्यकर्ताओं का टोटा पड़ा हुआ था। शायद यही वजह है कि नवंबर के शुरुआती दो हफ्ते नेताओं की सभाओं में भीड़ नहीं रही और कुर्सियां खाली दिखाई दीं। मजबूरी में कई प्रत्याशियों को क्रिकेट मैच दिखाने के लिए अपने दफ्तरों में और क्षेत्र में एलईडी स्क्रीन लगवाने पड़े। इस तरह क्रिकेट और चुनाव की होड़ में राजस्थान में क्रिकेट विजयी रहा, जब तक कि 19 नवंबर को फाइनल मैच नहीं निपट गया।

बमुश्किल हफ्ता दस दिन के प्रचार के सहारे 25 नवंबर को एक ही दिन में कुल 200 सीटों पर होने वाला मतदान 3 दिसंबर को क्या रंग लाएगा, बेरंग रहे माहौल के आधार पर इसका जवाब देना किसी के लिए संभव नहीं है। इसके बावजूद, जानकारों की मानें तो नतीजों के स्वाभाविक से ज्यादा अप्रत्याशित रहने से इंकार नहीं किया जा सकता।