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2 मार्च 2026 · MAR 02 , 2026

शहरनामा: नाहन

नाहन की संस्कृति में पहाड़ी परंपराओं और मैदानी प्रभावों का सुंदर मेल है
यादों में शहर

पहाड़ों की गोद में सादगी का राज

शिवालिक की हरी-भरी पहाड़ियों पर बसा नाहन चकाचौंध भरा पर्यटन नगर नहीं, बल्कि शांत, संयमित और आत्मीय कस्बा है, जहां जीवन अपनी धीमी लय में बहता है। हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले का यह मुख्यालय, आकार में भले छोटा हो, पर अपनी ऐतिहासिक विरासत, सांस्कृतिक विविधता और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण गहरी पहचान रखता है।

रियासत की छाया

नाहन का अतीत सिरमौर रियासत से जुड़ा है। 17वीं सदी में राजा फतेह प्रकाश ने इसे राजधानी के रूप में विकसित किया। आज भी रानीताल, पक्का तालाब और चौगान मैदान जैसे स्थान उस दौर की शाही स्मृतियों को संजोए हुए हैं। चौगान मैदान कभी दरबारी समारोहों और जनसभाओं का केंद्र हुआ करता था। अब वहां बच्चे क्रिकेट खेलते हैं, बुजुर्ग टहलते हैं और शाम के समय परिवार खुले आसमान के नीचे सुकून तलाशते हैं। शहर की पुरानी इमारतों, सरकारी दफ्तरों और मंदिरों में राजशाही दौर की वास्तुकला की झलक मिलती है।

पानी में बसी यादें

नाहन का दिल कहे जाने वाला रानीताल सिर्फ एक जलाशय नहीं, बल्कि शहर की सामूहिक स्मृति है। यहां एक बड़ा शिव मंदिर है। यहां महल से लेकर शिव मंदिर तक एक सुरंग है। कहा जाता है कि रानी इसी सुंरग से आती-जाती थीं। इसे रानी के स्नान के लिए बनवाया गया था। आज इसकी सीढ़ियों पर बैठकर लोग सुबह की धूप और शाम की ठंडी हवा का आनंद लेते हैं। तालाब में पड़ती पहाड़ियों की परछाइयां मानो समय को ठहरा देती हैं। विला ग्राउंड भी ऐतिहासिक है। यहां की बेहताशा खूबसूरती मन मोह लेती है। पहले एक जमाना था, जब यहां दो सिनेमाघर होते थे, पर अब बस उनकी यादें हैं। रानीताल के आसपास की चाय की दुकानों को नाहनवासी ‘खुली संसद’ कहते हैं। 

लोकजीवन और संस्कृति

नाहन की संस्कृति में पहाड़ी परंपराओं और मैदानी प्रभावों का सुंदर मेल है। सिरमौर क्षेत्र में लोक देवताओं की पूजा, मेलों और उत्सवों का खास महत्व है। रेणुका मेला, बावड़ी मेला और हरियाली तीज जैसे पर्व यहां सामूहिक उल्लास के प्रतीक हैं। यहां की लोक-संस्कृति में नाटी नृत्य, पहाड़ी लोकगीत और देवी-देवताओं से जुड़ी कथाएं गहराई से रची-बसी हैं। गांवों में आज भी देवताओं की पालकी यात्राएं और जागरण देखे जा सकते हैं। ये आयोजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक एकता के प्रतीक भी हैं।

सादगी में स्वाद

नाहन का खान-पान इस शहर की तासीर जैसा ही सादा है। एक बात इसे खास बनाती है, इसका स्वाद। यहां का भोजन स्वाद से भरपूर है। यहां का सिरमौरी धाम खास मौकों पर बनता है, जिसमें चावल, दाल, राजमा, चावल और देसी घी का भरपूर इस्तेमाल होता है। यह थाली केवल भोजन नहीं, बल्कि परंपरा का उत्सव होती है। स्थानीय बाजारों में मिलने वाली नाहन की मिठाई, जलेबी, गुलाब जामुन और बाल मिठाई यहां की पहचान है। ठंडे मौसम में लोग मकई की रोटी, सरसों का साग और घर का बना घी बड़े चाव से खाते हैं। चाय के साथ मिलने वाले पहाड़ी नमकीन, पकौड़े और समोसे नाहन की शामों को और भी सुहावना बना देते हैं।

जीवंत बाजार

नाहन का मुख्य बाजार बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन यह अपनी आत्मीयता और रंगों के लिए जाना जाता है। यहां ऊनी कपड़ों की दुकानें, पुरानी किताबों के स्टॉल, सब्जी मंडी और मिठाई की दुकानों की कतारें हैं। यह बाजार केवल खरीदारी का स्थान नहीं, बल्कि सामाजिक मेलजोल का केंद्र है। लोग यहां मिलते हैं, हालचाल पूछते हैं और खबरों का आदान-प्रदान करते हैं। छोटे शहर का यही सौंदर्य है, जहां हर चेहरा जाना-पहचाना लगता है।

शिक्षा और प्रशासन

सिरमौर जिले का मुख्यालय होने के कारण नाहन प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र है। यहां के सरकारी कार्यालय, अदालतें और शैक्षणिक संस्थान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े हुए हैं। नाहन के पुराने स्कूल और कॉलेज पीढ़ियों से पहाड़ी युवाओं के सपनों को आकार देते आए हैं। यहां की शिक्षा व्यवस्था अनुशासन, सादगी और सामुदायिक मूल्यों पर आधारित है।

प्राकृतिक आकर्षण

रेणुका झील हिमाचल की सबसे बड़ी प्राकृतिक झील है, जो नाहन से लगभग 40 किलोमीटर दूर है। यह झील मां रेणुका से जुड़ी पौराणिक कथा के कारण धार्मिक महत्व रखती है। साथ ही, यह क्षेत्र जैव-विविधता के लिए भी प्रसिद्ध है। कालाअंब नाहन का प्रवेश द्वार माना जाता है, जहां औद्योगिक क्षेत्र के साथ-साथ घने जंगल और मंदिर भी हैं। यहीं 1875 में सिरमौर के महाराजा ने एक औद्योगिक इकाई की स्थापना की थी। यह फैक्ट्री कृषि यंत्रों, गन्ना कोल्हू और पानी के पंप जैसे उत्पादों के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध थी। 70 से ज्यादा साल इसमें काम हुआ और अब खंडहर के रूप में यह बस धरोहर बन कर रह गई है। पांवटा साहिब, जो गुरुद्वारा श्री पांवटा साहिब के लिए प्रसिद्ध है, सिख श्रद्धालुओं का प्रमुख केंद्र है। यहां से गुरु गोबिंद सिंह जी का ऐतिहासिक संबंध रहा है। हरिपुरधार और चूड़धार चोटी जैसे स्थल ट्रेकिंग और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाने जाते हैं। चूड़धार सिरमौर की सबसे ऊंची चोटी है, जहां से दूर-दूर तक हिमालय की शृंखलाएं दिखाई देती हैं।

आस्था और संतुलन

नाहन में मंदिरों की घंटियां किसी शोर की तरह नहीं, बल्कि शांति के संगीत की तरह बजती हैं। जगन्नाथ मंदिर, कालीस्थान और कई स्थानीय देवस्थल यहां के धार्मिक जीवन का हिस्सा हैं।

रीटा डासता

(आध्यात्मिक गुरु)

 

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