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क्रिकेट: लौट आया रणजी का रंग

कई साल बाद दर्शकों ने रणजी ट्रॉफी के मैदानों पर वे नाम देखे, जिनके लिए लोग टीवी पर चैनल बदलते हैं
अंशुल कांबोज, रोहित शर्मा, विराट कोहली, करुण नायर और ऋषभ पंत रणजी ट्रॉफी में अपने खेल के जौहर दिखाएंगे

कभी भारतीय क्रिकेट टीम में जाने का रास्ता रणजी ट्रॉफी से होकर गुजरता था। उस टूर्नामेंट में रन का रेकॉर्ड बनाना या पचास विकेट लेना खिलाड़ियों का सपना हुआ करता था। कपिल देव, सुनील गावस्कर, गुंडप्पा विश्वनाथ, राहुल द्रविड़, वी.वी.एस. लक्ष्मण, अनिल कुंबले जैसे नाम इसी घरेलू क्रिकेट के मैदान से निकले हैं। लेकिन वक्त के साथ जब आइपीएल का दौर आया, कैलेंडर अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट से भर गया और क्रिकेट का केंद्र टीवी तक सिमट गया, तब रणजी जैसे टूर्नामेंट की चमक धुंधली पड़ने लगी। पिछले एक दशक में हालत यह हो गई कि राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ी घरेलू क्रिकेट का हिस्सा बनने से कतराने लगे। उनके लिए बीसीसीआइ विशेष तैयारी कैंप, एनसीए में रिहैब और आइपीएल से पहले फ्रेंचाइजी ट्रेनिंग ज्यादा अहम हो गई। वहीं, घरेलू खिलाड़ियों के लिए ये टूर्नामेंट अब चयन की औपचारिक राह भर बनकर रह गए थे। सिलेक्टरों की नजरें सीधे आइपीएल के शॉर्ट वीडियो क्लिप्स पर रहने लगीं। गेंदबाजों का प्रदर्शन टी20 में देखा जाने लगा, बल्लेबाजों का स्ट्राइक रेट चर्चा का केंद्र बन गया। इस बदलाव ने भारतीय क्रिकेट को तेजी से बदला। जब खिलाड़ी रणजी की भट्टी में बिना पके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रेड बॉल क्रिकेट में लौटते थे, तो उनका तालमेल बिगड़ा हुआ लगता था। विदेशों में टेस्ट सीरीज में लगातार हार ने इस बात को उजागर किया।

रणजी ट्रॉफी ने इन खिलाड़ियों के खेल को संवारा

रणजी ट्रॉफी ने इन खिलाड़ियों के खेल को संवारा

पर अब हालात बदल रहे हैं। कोच गौतम गंभीर और मुख्य चयनकर्ता अजित अगरकर की जोड़ी जब भारतीय क्रिकेट के नेतृत्व ढांचे में आई, तो उन्होंने जो पहली चीज तय की, वह यही थी कि टीम इंडिया के बड़े खिलाड़ी भी घरेलू क्रिकेट का हिस्सा बनेंगे। चाहे वे विराट कोहली हों, रोहित शर्मा हों या दूसरे वरिष्ठ खिलाड़ी, सभी को कहा गया कि टेस्ट टीम में जगह बनाए रखने के लिए घरेलू क्रिकेट में खेलना जरूरी होगा। इस फैसले का असर तुरंत दिखा। कई साल बाद दर्शकों ने रणजी ट्रॉफी के मैदानों पर वे नाम देखे, जिनके लिए लोग टीवी पर चैनल बदलते हैं। विराट कोहली और रोहित शर्मा जैसे खिलाड़ी जब रणजी में उतरे तो न सिर्फ दर्शक बढ़े, बल्कि बाकी खिलाड़ियों के आत्मविश्वास में भी उछाल आया। ड्रेसिंग रूम में एक ही टूर्नामेंट के लिए जब इतने वरिष्ठ भारतीय खिलाड़ी और किसी युवा खिलाड़ी के बीच बातचीत होती है, तो सिर्फ अनुभव नहीं, पूरी संस्कृति का आदान-प्रदान होता है।

ग्राफिक

चमकता सिताराः राजिंदर गोयल

चमकता सिताराः राजिंदर गोयल

रणजी ट्रॉफी की शुरुआत 1934 में हुई थी। उस समय भारतीय क्रिकेट शुरुआती दौर में था। यह टूर्नामेंट भारतीय खिलाड़ियों को मंच देता है, जहां वे लंबे फॉर्मेट में खुद को साबित कर सकें। स्वतंत्रता से पहले और उसके बाद भी रणजी का स्तर इतना ऊंचा रहा कि चयनकर्ताओं के लिए यह एकमात्र कसौटी हुआ करती थी। विजेता टीमों से खिलाड़ी सीधे राष्ट्रीय टीम में पहुंच जाते थे। मुंबई (तब बॉम्बे) का रणजी इतिहास किसी किंवदंती से कम नहीं। लगातार 15 बार ट्रॉफी जीतने वाली यह टीम भारतीय क्रिकेट की नर्सरी कही जाती थी। यहां से निकलने वाले खिलाड़ियों में संदीप पाटिल, रवि शास्त्री, दिलीप वेंगसरकर, सचिन तेंडुलकर, अजित अगरकर, अजिंक्य राहणे, रोहित शर्मा सभी ने किसी न किसी दौर में टीम इंडिया की नींव मजबूत की। इसी तरह दिल्ली, कर्नाटक, तमिलनाडु और सौराष्ट्र टीमों ने भी अपने-अपने समय में कई नामचीन खिलाड़ी देश को दिए। लेकिन धीरे-धीरे स्थिति बदली। 2008 में आइपीएल की शुरुआत के बाद घरेलू क्रिकेट की लोकप्रियता पर सीधा असर पड़ा। अब खिलाड़ियों के लिए ग्लैमर, पैसा और प्रसिद्धि आइपीएल में थी। एक महीने में जितना कमाया जा सकता था, वह पूरे घरेलू क्रिकेट सीजन से कई गुना ज्यादा था। स्वाभाविक था कि युवा खिलाड़ी लंबे फॉर्मेट की बजाय टी20 क्रिकेट की ओर झुकने लगे।

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इसके साथ ही राष्ट्रीय टीम का व्यस्त कार्यक्रम भी बढ़ता गया। टेस्ट, वनडे, टी20 फिर आइपीएल के बीच रणजी का कैलेंडर सीनियर खिलाड़ियों के शेड्यूल में फिट नहीं बैठता था। नतीजा यह हुआ कि घरेलू क्रिकेट में खेलने वाले और राष्ट्रीय टीम में जगह बनाने वाले खिलाड़ियों के बीच एक तरह की दूरी बन गई। दोनों अलग-अलग दुनिया में जी रहे थे। बीच के वर्षों में कई दिग्गजों ने आवाज भी उठाई कि घरेलू क्रिकेट की उपेक्षा आगे चलकर टेस्ट टीम को कमजोर कर देगी। क्रिकेट पंडितों ने कहा कि जो खिलाड़ी टेस्ट में टिकना चाहता है, उसे रणजी खेलना ही होगा। लेकिन नीतिगत रूप से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। अब जो बदला, वह बदलाव सोच का परिणाम है। गौतम गंभीर और अजित अगरकर ने साफ किया है कि टेस्ट टीम की कसौटी वही खिलाड़ी होंगे, जो घरेलू क्रिकेट में खुद को साबित करेंगे। अगर फिटनेस या फॉर्म की जांच करनी है, तो एनसीए नहीं बल्कि मैदान सबसे अच्छा मापक है। इस नीति ने रणजी को फिर से चर्चा में ला दिया है।

खिलाड़ी से कोच तकः वसीम जाफर

खिलाड़ी से कोच तकः वसीम जाफर

इसका असर सिर्फ खिलाड़ियों पर ही नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर पड़ने वाला है। दर्शकों की रुचि बढ़ रही है, राज्यों के क्रिकेट संघ मैदानों का रखरखाव बेहतर करने लगे हैं और युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का माहौल बन रहा है। सरफराज, करुण नायर, अंशुल कंबोज जैसे खिलाड़ियों को मौके मिलना बताता है कि फिर रणजी के अच्छे प्रदर्शन को देखा भी जा रहा है और सराहा भी जा रहा है। सीनियर खिलाड़ियों के साथ खेलने की प्रेरणा किसी वर्कशॉप या कोचिंग से कहीं बड़ी है। रणजी ट्रॉफी हमेशा से ही सिर्फ क्रिकेट न होकर भारतीय खेल भावना का प्रतीक रही है। पांच दिन की मेहनत, हर सत्र में रणनीति बदलना, मौसम और पिच की परीक्षा झेलना, ये सब अनुभव मिलकर किसी खिलाड़ी को अंतरराष्ट्रीय स्तर के लिए तैयार करते हैं। यही कारण है कि आज भी जो खिलाड़ी रणजी में लंबे समय तक टिके रहते हैं, वे विदेशी परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन करते हैं। माना जाता है कि सौराष्ट्र की टीम ने हाल के वर्षों में जो उभार दिखाया, उसके पीछे वही धैर्य और टीम संस्कृति थी, जो रणजी टूर्नामेंट सिखाता है। जयदेव उनादकट, चेतन सकारिया, अर्पित वासवाडा जैसे नाम इसी माहौल से निखरे। उन्होंने साबित किया कि घरेलू क्रिकेट में निरंतरता रखी जाए, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा जा सकता है।

विराट कोहली के साथ शाहरुख खान

विराट कोहली के साथ शाहरुख खान

इस टूर्नामेंट में बड़े खिलाड़ियों के लौटे आने से घरेलू खिलाड़ियों को समझ आ रहा है कि क्रिकेट सिर्फ फिटनेस या ताकत नहीं, बल्कि सोच और तैयारी का खेल है। अगर घरेलू क्रिकेट को दीर्घकालिक जीवंत रखना है, तो खिलाड़ियों को उचित पारिश्रमिक, अच्छे मैदान, बेहतर लाइव कवरेज और सम्मानजनक शेड्यूल देना होगा। एक समय था जब रणजी के मैचों की खबरें अखबारों के पहले पन्ने पर छपती थीं। आज सोशल मीडिया के दौर में वह स्थान फिर मिल सकता है, अगर इसमें वही ऊर्जा और प्रतियोगिता लौटे। यह एक टूर्नामेंट की वापसी नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट की आत्मा की वापसी है। यह वापसी छोटे शहरों और कस्बों के खिलाड़ियों को बड़ा सपना देखने की हिम्मत देती है। रणजी ट्रॉफी याद दिलाती है कि खेल का असली मूल्य ग्लैमर या विज्ञापन में नहीं, बल्कि वह मिट्टी है, जहां से प्रतिभा जन्म लेती है। जब तक वो मिट्टी उपजाऊ रहेगी, भारतीय क्रिकेट की जड़ें मजबूत रहेंगी। कहा जा सकता है, टीम इंडिया की असली शुरुआत अब भी रणजी ट्रॉफी से ही होती है।

 

 

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