जर-जोखिम, खैर-खतरे हमेशा ही अमूमन बारीकियों, ब्यौरों में होते हैं। अभी तो अंतरिम साझा पत्र में दिशा का संकेत है। फिर भी, भारत-अमेरिका का यह व्यापार करार जब भी आखिरकार पूरा होगा, तो उसका असर सिर्फ व्यापार और टैरिफ से कहीं आगे जाकर भू-राजनैतिक दायरे में दिखेगा। भारत अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अपने पुराने संतुलन बनाने के रुख से पूरी तरह अलग होने का ऐलान शायद न करे और सार्वजनिक बयानों में रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर दिया जाता रहेगा। लेकिन असलियत में नई दिल्ली वॉशिंगटन के करीब आती दिख रही है, न सिर्फ निवेश और अमेरिकी बाजार तक पहुंच के लिए, बल्कि सामरिक रुख और 3,488 किलोमीटर की विवादित सीमा पर चीन की बढ़ती ताकत के मामले में भी।
यूं तो इस रुख की शुरुआत करीब 25 साल पहले हुई थी। 2000 में बिल क्लिंटन के दौरे के बाद भारत-अमेरिका संबंधों को बढ़ावा मिला और मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भारत-अमेरिका एटमी करार हुए। पिछले साल ट्रम्प के टैरिफ वॉर और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की तरफ अमेरिका के झुकाव से द्विपक्षीय संबंधों को झटका लगा था। अब, व्यापार सौदे की घोषणा और टैरिफ 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने के साथ सहयोग का नया अध्याय शुरू हुआ है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व राजदूत सैयद अकबरुद्दीन ने चीन का नाम लिए बिना कहा, ‘‘इस सौदे का महत्व भू-राजनैतिक स्तर का भी है। इससे भारत को उत्तरी सीमा पर तनाव सहने में थोड़ा सहारा मिलेगा, टेक्नोलॉजी स्थानांतरण में सहूलियत मिलेगी और पड़ोसी देशों के मोर्चे भी सहज होंगे।’’
भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भी अमेरिका का महत्व बहुत ज्यादा है। नई दिल्ली को रोजगार पैदा करने और व्यापार बढ़ाने के लिए अमेरिकी निवेश और टेक्नोलॉजी की जरूरत है, ताकि भारत 2047 तक विकसित देश बन सके।
अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने के लिए तैयार चीन का आर्थिक और सैन्य शक्ति के रूप में उदय वाशिंगटन और नई दिल्ली के साथ आने की बड़ी वजह है। रिटायर राजनयिक अनिल बाधवा कहते हैं, ‘‘अमेरिका अपनी चीन और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की रणनीतियों के मामले में भारत को अहम मानता है। इसलिए दोनों का साथ रणनीतिक मजबूरी है।’’
चीन के भारत के खिलाफ आक्रामक रवैए ने नई दिल्ली को वाशिंगटन की ओर देखने पर मजबूर किया है, जिसका नतीजा 2020 की गर्मियों में लद्दाख में सैन्य टकराव के रूप में सामने दिखा था। अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान का क्वाड समूह चीन को रोकने की कोशिश है। भारत को चीन की रक्षा क्षमताओं के बराबर पहुंचने में एक दशक से ज्यादा समय लगेगा इसलिए अमेरिका के साथ काम करने से एशिया में चीन की चालों को कमजोर करने में मदद मिल सकती है।
इससे रूस का क्या होगा, जो भारत का पारंपरिक और लंबे समय से सहयोगी रहा है? दिसंबर में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के नई दिल्ली दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी गर्मजोशी साफ दिखी थी। अब मॉस्को के साथ रिश्तों का क्या होगा? सऊदी अरब और यूएई में देश के पूर्व राजदूत तलमीज अहमद कहते हैं, ‘‘सत्ता में शीर्ष राजनैतिक नेतृत्व में एक व्यापक समझ दिखती है। रूस भारतीय सिस्टम में इस कदर गहराई से जुड़ा हुआ है कि अमेरिका के साथ सौदे से ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। यह अनोखा रिश्ता है, जो किसी तीसरे देश पर निर्भर नहीं है।’’
रूस को इस करार और रूसी तेल न खरीदने की भारत की मजबूरियों के बारे में पता होगा। वहां से तेल की खरीद काफी कम हो गई है, फिर भी कुछ तेल निजी क्षेत्र से खरीदा जा रहा है, जो उन दो मुख्य कंपनियों से बाहर हैं जिन पर हाल ही में ट्रम्प प्रशासन ने बंदिश लगाई थी।
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के नंदन उन्नीकृष्णन कहते हैं, ‘‘कोई बड़ा टकराव नहीं होगा, लेकिन दूरी बढ़ेगी। दोनों देश कई मुद्दों पर एक साथ काम करते रहेंगे, जिसमें बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार, संयुक्त राष्ट्र सुधार, रक्षा, अंतरिक्ष और कई अन्य प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं।’’
बाधवा कहते हैं, ‘‘रूस के साथ भारत के रिश्ते स्थिर रहेंगे। तेल की खरीद कई कारणों से जरूरी हो गई थी और आसान भी हुई, जिसमें रूसी तेल पर बड़ी रियायत शामिल थी।’’
आजादी के बाद से रणनीतिक स्वायत्तता भारत की विदेश नीति का मार्गदर्शक सिद्धांत रहा है और उसने नई दिल्ली को काफी फायदा पहुंचाया है। लेकिन राजनैतिक नेतृत्व, चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों ने अमेरिका और रूसी दोनों खेमों में अपनी जगह बनाने की कोशिश की है।
अलबत्ता, सत्ता-प्रतिष्ठान की उम्मीदों और रणनीतिक स्वायत्तता के पुराने दिनों में लौटने की चाहत के बावजूद, भारत-रूस संबंधों को नुकसान होना तय है क्योंकि नई दिल्ली धीरे-धीरे अमेरिका के करीब जा रही है।
भारत तब तक संतुलन बनाने का काम जारी रखेगा जब तक बनाए रख सकता है। हालांकि रणनीतिक स्वायत्तता नीति के बजाय फसाने की तरह बनी रहेगी। कूटनीति एक भाषा बोल सकती है जबकि कठोर अंतरराष्ट्रीय राजनीति गठबंधन तय करेगी। लेकिन एक सवाल यह है कि क्या अमेरिका, खासकर मनमौजी डोनाल्ड ट्रम्प पर भरोसा किया जा सकता है।