यह नेटफ्लिक्स की किसी सीरीज जैसा है। लोकेशन, शूटिंग और सबटाइटल बदलते रहते हैं। लेकिन हर एपिसोड में वही कहानी बार-बार दोहराई जाती है; वामपंथी सरकारों का तख्तापलट और अमेरिकी कारोबारी दोहन तथा दबदबे के लिए समर्थक सरकारों को बिठाना।
इन लड़ाइयों को अलग-अलग नाम दिए जाते हैं जैसे कम्युनिज्म के खिलाफ युद्ध, ड्रग्स के खिलाफ युद्ध, आतंकवाद के खिलाफ युद्ध और भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध वगैरह। भ्रष्टाचार का औजार ब्राजील में वर्कर्स पार्टी की सरकार और उस क्षेत्र में कुछ वामपंथी राष्ट्रपतियों के तख्तापलट के लिए इस्तेमाल किया गया था।
कुछ कहानियां तो सस्पेंस, ड्रामा के मामले में नेटफ्लिक्स फिल्मों को भी मात दे सकती हैं। कई में तो जोरदार संगीत का मजा ले सकते हैं। मसलन, 1989 में राष्ट्रपति नोरिएगा के खिलाफ पनामा में अमेरिकी हमले को याद कीजिए। नोरिएगा असल में सीआइए के पेरोल पर थे लेकिन कंट्रोल से बाहर हो गए थे। नोरिएगा ने पोप के प्रतिनिधि के घर में शरण ली, तो अमेरिकी फौजियों ने भगोड़े को बाहर निकालने के लिए दस दिनों तक लगातार बिल्डिंग के चारों ओर बहुत तेज रॉक और हेवी-मेटल म्यूजिक बजाया। उस ऑपरेशन को ‘ऑपरेशन निफ्टी पैकेज’ नाम दिया गया था। तब बजाया गया एक गाना तो एलिस कूपर का ‘नो मोर मिस्टर नाइस गॉ’ था। नींद न आने और अमेरिकी म्यूजिक हथियार की यातना बर्दाश्त न कर पाने के कारण नोरिएगा ने सरेंडर कर दिया। अमेरिकी उन्हें पकड़ ले गए और अपनी एक जेल में डाल दिया।
क्या अमेरिका का ‘ड्रग्स के खिलाफ युद्ध’ वेनेजुएला पर दबाव बनाने का दिखावा भर है? अपने पहले कार्यकाल 2019 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोल्टन वेनेजुएला के राष्ट्रपति मदुरो को सत्ता से हटाने की धमकी दे रहे थे, तो रिचर्ड ब्रैनसन और उनकी कंपनी ने वेनेजुएला की सीमा पार कोलंबिया में बड़ा म्यूजिक कॉन्सर्ट आयोजित किया। उसे वेनेजुएला एड लाइव कहा गया, इसका मकसद सत्ता परिवर्तन ऑपरेशन के लिए बैकग्राउंड म्यूजिक देना था।

वे दिनः काराकास में अर्जेंटिना के क्रिसनर (दाएं), ब्राजील के लूला के साथ वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो शॉवेज (बीच में)
अब राष्ट्रपति मदुरो को हटाने के मौजूदा अभियान में अमेरिकियों ने ‘ड्रग्स पर युद्ध’ के नाम से शुरुआत की, लेकिन ज्यादा फायदा बटोरने के लिए उसे बदलकर ‘आतंकवाद पर युद्ध’ कर दिया। वेनेजुएला न तो ड्रग्स का मुख्य स्रोत है और न ही अमेरिका के लिए कोई आतंकवादी खतरा है। अमेरिका का असली मकसद मदुरो की वामपंथी सरकार को हटाना, अमेरिका समर्थक दक्षिणपंथी सरकार बनाना, वेनेजुएला के तेल क्षेत्रों पर कब्जा करना और कुछ पुराने हिसाब-किताब बराबर करना है।
वेनेजुएला में चल रहा सरकार बदलने का ऑपरेशन पिछले तीन दशकों में अमेरिका की चौथी कोशिश है। पहली कोशिश 2002 में की गई थी, जब अमेरिका की शह पर तख्तापलट हुआ था जिसमें वामपंथी नेता, राष्ट्रपति शावेज को सत्ता से हटा दिया गया था। लेकिन तख्तापलट नाकाम रहा और शावेज दो दिन बाद सत्ता में लौट आए। तख्तापलट से पहले, राष्ट्रीय तेल कंपनी पीडीवीएसए के अमेरिका समर्थक कर्मचारियों की एक बड़ी हड़ताल से माहौल बनाया गया था। उन्होंने तेल का उत्पादन, घरेलू वितरण और निर्यात रोक दिया, जिससे अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा की जिंदगी ठप हो गई। राष्ट्रपति लूला को पेट्रोल की कमी से निपटने में शावेज की मदद के लिए तेल के जहाज भेजने पड़े। उसके बाद, शावेज ने कंपनी के 15000 कर्मचारियों को निकाल दिया और वहां अपने राजनैतिक वफादारों को बैठा दिया।
दूसरी कोशिश 2019 में हुई, जब ट्रम्प प्रशासन ने मदुरो को निर्वाचित राष्ट्रपति मानने से इनकार कर दिया और आरोप लगाया कि चुनाव में धांधली हुई थी। अमेरिका ने लेजिस्लेटिव असेंबली के अध्यक्ष जुआन गुएडो को चुना और उन्हें असली राष्ट्रपति घोषित कर दिया। अमेरिका ने यूरोपीय संघ और कुछ दक्षिणपंथी लैटिन अमेरिकी राष्ट्रपतियों सहित लगभग 50 देशों को अपने फैसले का पालन करने के लिए मजबूर किया। लेकिन वह प्रोजेक्ट भी नाकाम रहा क्योंकि गुएडो गबन के आरोप में बदनाम हो गए। उन्होंने और कुछ अमेरिकी वकील सहित उनके साथियों ने निर्वासित सरकार चलाने के नाम पर अमेरिकी बैंकों में वेनेजुएला के फंड से लाखों डॉलर चुरा लिए थे।
तीसरी कोशिश अमेरिकी निजी कंपनियों ने की। भाड़े के रिटायर मरीन सैनिकों के साथ ‘ऑपरेशन गिडियन’ की साजिश रची गई। उन्होंने समुद्र के रास्ते वेनेजुएला में घुसने, राष्ट्रपति मदुरो को पकड़ने, उन्हें अमेरिका ले आने और उस समय वाशिंगटन में घोषित 1.5 करोड डॉलर इनाम पाने की कोशिश की। वेनेजुएला के अधिकारियों ने भाड़े के सैनिकों को पकड़ लिया। हालांकि ट्रम्प प्रशासन ने दावा किया कि वह कोई ऑफिशियल ऑपरेशन नहीं था, लेकिन उन्होंने चुपचाप बातचीत करके उन अपराधियों को रिहा करवा लिया और उन्हें वापस अमेरिका ले आए।
अब चौथी कोशिश में एक और सबप्लॉट जुड़ गया, जिसे विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने लिखा, जिनके मां-बाप क्यूबा की क्रांति के बाद भाग आए थे। उनका क्यूबा और वेनेजुएला के खिलाफ एक निजी एजेंडा है। क्यूबा को राष्ट्रपति मदुरो को खुफिया और सुरक्षा संबंधी मदद मुहैया कराने के बदले वेनेजुएला से तेल मिलता है। अमेरिका की तरफ से कई बार हमले, तख्तापलट और हत्या की कोशिशों से बचने के बाद क्यूबा वेनेजुएला सरकार को अपनी गोपनीय सलाह से अवगत कराता बता रहा है। रूबियो क्यूबा और वेनेजुएला दोनों को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। वे इस मौके का इस्तेमाल अपने चुनाव क्षेत्र में क्यूबा और वेनेजुएला मूल के बड़ी संख्या में वोटरों के बीच हीरो बनने के लिए भी कर रहे हैं।

रिहा करोः मैनहट्टन फेडरल कोर्ट के बाहर मदुरो की रिहाई के लिए प्रदर्शन
वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है, लगभग 303 अरब बैरल, जो सऊदी अरब के 267 अरब बैरल से ज्यादा है। 1998 में वामपंथी शावेज के सत्ता में आने तक वेनेजुएला अपने 90 प्रतिशत तेल का निर्यात अमेरिका को करता था। शावेज अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम करना चाहते थे। सो, चीन और भारत जैसे दूसरे देशों के साथ व्यापार बढ़ाया। जब अमेरिकी तेल कंपनियों ने उनकी शर्तें नहीं मानीं, तो उन्होंने उन्हें बाहर निकाल दिया। अमेरिका ने जवाब में प्रतिबंध लगाए और वेनेजुएला के तेल उत्पादन और निर्यात को ठप करने के कदम उठाए। हालांकि, अमेरिकी तेल कंपनी शेवरॉन ने अपनी मजबूत लॉबिंग पावर से अपना लाइसेंस रिन्यू करवा लिया है और अभी भी वेनेजुएला में तेल उत्पादन कर रही है और चुपचाप अमेरिका को निर्यात कर रही है।
बतौर खांटी वामपंथी शावेज अमेरिकी साम्राज्यवाद और नवउदारवाद के खिलाफ खुलकर बोलते रहे। जब लैटिन अमेरिकी देश एमईआरसीओएसयूआर, यूएनएएसयूआर और सीईएलएसी जैसी क्षेत्रीय संधियों के जरिए क्षेत्रीय एकीकरण की कोशिश कर रहे थे, तो अमेरिका ने 1995 में एफटीएए (फ्री ट्रेड एरिया ऑफ अमेरिका) के अपने जवाबी प्रस्ताव से उन्हें रोकने की कोशिश की। अमेरिका ने तर्क दिया कि एफटीएए पर अमल करने का रास्ता साफ करने के लिए लैटिन अमेरिका की क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय संधियों और समूहों को खत्म कर देना चाहिए। शावेज ने ब्राजील के लूला और अर्जेंटीना के किर्चनर जैसे अन्य वामपंथी राष्ट्रपतियों के साथ मिलकर एफटीएए प्रोजेक्ट को मिटा दिया और एफटएए के विकल्प के तौर पर एएलबीए संधि कायम की। शावेज ने छोटे लैटिन अमेरिकी और कैरेबियाई देशों को राजनैतिक समर्थन के बदले सस्ता तेल दिया। फिदेल कास्त्रो के प्रशंसक रहे शावेज ने क्यूबा को तेल और आर्थिक मदद देने की हर संभव कोशिश की। शावेज अपने देश में और क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत नेता थे, इसलिए 2002 में तख्तापलट की नाकाम कोशिश के बाद अमेरिका ने उन पर कोई सीधा हमला नहीं किया। लेकिन अब वेनेजुएला आंतरिक और बाहरी तौर पर कमजोर है और अमेरिका को लगता है कि अब हिसाब चुकाने का समय आ गया है। मदुरो ने अपनी नासमझी से राष्ट्रपति लूला का समर्थन भी खो दिया है, जो शावेज के मामले की तरह ही महत्वपूर्ण हो सकता था। न तो चीन और न ही रूस को अमेरिका के खिलाफ वेनेजुएला के लिए खड़ा होना फायदेमंद लगता है।
शावेज के करिश्मे और नेतृत्व क्षमता के बल पर जमीनी स्तर पर जन समर्थन था, जिसकी बदौलत उन्होंने अपनी लोकप्रियता के आधार पर कई चुनाव जीते। लेकिन मदुरो में न तो वे क्षमताएं हैं और न ही लोकप्रियता। अटकल यह है कि क्यूबा के एक अस्पताल में शावेज के आखिरी दिनों में क्यूबा के लोगों ने उनके उत्तराधिकारी के तौर पर मदुरो के नाम की सिफारिश की थी। मदुरो कोई आम लातीनी कौडिलो (ताकतवर आदमी) नहीं हैं। वे अन्य शाविस्टा नेताओं और सेना के सामूहिक नेतृत्व का एक चेहरा भर हैं। अगर उन्हें मार दिया जाता है या हटा दिया जाता है, तो गृह मंत्री डियोसडाडो कैबेलो सत्ता संभाल लेंगे, जो इस सरकार में सबसे ताकतवर हैं।
अमेरिका ने राष्ट्रपति मदुरो और उनके साथियों पर अमेरिका में ड्रग्स तस्करी कराने का आरोप लगाया है। यह झूठा आरोप है। यहां तक कि अमेरिकी सरकारी सूत्रों के अनुसार भी, वेनेजुएला से अमेरिका पहुंचने वाली ड्रग्स का हिस्सा बहुत कम है।
दूसरे, ड्रग्स सप्लाई साइड की समस्या नहीं है। ड्रग्स मांग और खपत से चलने वाला अरबों डॉलर का अमेरिकी धंधा है। लाखों अमेरिकी लोग ड्रग्स पर खूब पैसे खर्च करते हैं, ताकि जहां से भी मिल सके, वहां से ड्रग्स लेकर नशा कर सकें। कुछ साल पहले, एक अमेरिकी फर्म, पर्ड्यू फार्मा ने अपनी ओपिओइड ऑक्सीकॉन्टिन की आक्रामक मार्केटिंग की और अरबों डॉलर कमाए। हजारों अमेरिकियों को उसकी लत लग गई और अंतत: उसी नशे के चक्कर में वे जान गंवा बैठे। डीईए ने उस कंपनी के खिलाफ ड्रग वॉर नहीं छेड़ा। न्याय विभाग ने उसके साथ एक डील की और कंपनी कुछ जुर्माना देकर बच गई। जब तक अमेरिकी लोग ड्रग्स की मांग करते रहेंगे और उसके लिए पैसे देते रहेंगे, यह धंधा चलता रहेगा। पाब्लो एस्कोबार की हत्या या लंबे समय तक चले ड्रग वॉर के बाद भी अमेरिका में ड्रग्स की खपत कम नहीं हुई है। ड्रग्स अमेरिका का घरेलू मुद्दा है। लेकिन अमेरिका ने दूसरे देशों को दोषी ठहराते हुए एक झूठी कहानी गढ़ी है और हॉलीवुड ने फिल्मों और नेटफ्लिक्स सीरियल नारकोस के जरिए इस झूठ को फैलाया है।
लैटिन अमेरिकी ड्रग कार्टेल को अमेरिकी बंदूकों से ताकत मिली है। अमेरिका ही ड्रग माफिया को बंदूकों की अवैध सप्लाई का मुख्य स्रोत है। मैक्सिको में पूरे देश के लिए सिर्फ दो बंदूक की दुकानें हैं। उन्हें मैक्सिको की सेना चलाती है, जिसके पास कड़ी चेकिंग और कंट्रोल के तरीके हैं। लेकिन मैक्सिको की सीमा से सटे अमेरिका में करीब 10,000 बंदूक की दुकानें हैं। हर साल करीब 200,000 अमेरिकी बंदूकें अवैध रूप से मैक्सिको पहुंचती हैं। ये बंदूकें अमेरिका में ड्रग्स से ज्यादा लैटिन अमेरिकी लोगों की मौत का कारण बनती हैं। अमेरिका इस मुद्दे को मानने और बंदूक की तस्करी को रोकने के लिए कोई कार्रवाई करने से इनकार करता है।
ड्रग वॉर ने अमेरिका में डीईए और उसके ठेकेदारों के लिए मुनाफे और ताकत का अरबों डॉलर का बिजनेस एम्पायर बना दिया है। जाहिर है, ये लोग इस युद्ध को हमेशा के लिए जारी रखना चाहते हैं। साथ ही, अमेरिका ड्रग वॉर का इस्तेमाल लैटिन अमेरिकी सरकारों की खुफिया एजेंसियों और फौज में घुसपैठ करने के लिए करता है।
यह सच है कि 2024 में राष्ट्रपति मदुरो चुनाव में धांधली कर जीते थे। अमेरिका ने मादुरो के सिर पर 5 करोड़ डॉलर और दूसरे वेनेज़ुएला के नेताओं, जजों और जनरलों पर 10 करोड़ डॉलर से ज्यादा का इनाम घोषित किया है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव होते, तो मदुरो हार जाते और अमेरिका समर्थक विपक्ष सत्ता में आ जाता। फौरन, नई सरकार मदुरो और सैकड़ों अन्य लोगों को अमेरिकी अधिकारियों को सौंप देती, ताकि उन्हें अमेरिकी जेलों में डाला जा सके। अमेरिका ने अपनी अदालतों में मनगढ़ंत आरोपों पर वेनेजुएला के कई नेताओं को उनकी गैर-मौजूदगी में दोषी ठहराकर पहले ही जमीन तैयार कर ली है।
होंडुरास के पूर्व राष्ट्रपति जुआन हर्नांडेज के साथ भी यही हुआ था। वे 2014 से 2022 तक दो बार सत्ता में रहे। अमेरिका ने उन्हें ‘‘अच्छा आदमी’’ कहा। जैसे ही उनका कार्यकाल खत्म हुआ, डीईए ने उनके घर को घेर लिया, उन्हें पकड़ लिया, अमेरिका ले गए, उन पर ड्रग्स के आरोप लगाए और चालीस साल के लिए जेल में डाल दिया। किस्मत से, वे ट्रम्प के हाथ गरम करने में कामयाब रहे और पिछले हफ्ते उन्हें माफ कर रिहा कर दिया गया। तो, वेनेजुएला का सत्ता पक्ष अमेरिका समर्थक विपक्ष को सत्ता में आने देकर सामूहिक आत्महत्या क्यों करेगा? इस तरह अमेरिका ही वेनेजुएला में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव और लोकतांत्रिक बदलाव में बाधा बन गया है।
लैटिन अमेरिकी लोग व्यंग्य में कहते हैं कि अमेरिका में कोई सैन्य तख्तापलट नहीं हुआ है क्योंकि वाशिंगटन में कोई अमेरिकी दूतावास नहीं है। अफसोस कि अमेरिकियों ने मूर्खता या हेकड़ी में कराकास में अपना दूतावास बंद कर दिया था। अगर होता, तो वे कुछ कर्नलों को अपने साथ मिला सकते थे और उनका इस्तेमाल करके सेना को बांटकर विशुद्ध अमेरिकी शैली में तख्तापलट करा सकते थे। 2002 तक अमेरिकी रक्षा अटैची कराकास में अपने दूतावास की बिल्डिंग से काम नहीं करते थे। उनके ऑफिस वेनेजुएला सेना मुख्यालय के अंदर थे। इस तरह उन्होंने 2002 का तख्तापलट को आसानी से अंजाम दिया था। नाकाम तख्तापलट के बाद राष्ट्रपति शावेज ने उन्हें बाहर निकाल दिया।
वेनेजुएला के लोग चाविस्टा के कुशासन और अमेरिकी प्रतिबंधों और दखलंदाजी के बीच बुरे फंसे हैं। वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था एक दशक से ज्यादा समय से बर्बाद है। महंगाई है। खाने-पीने और जरूरी चीजों की कमी है क्योंकि सरकार के पास आयात के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा नहीं है। अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से तेल का निर्यात और उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। शावेज ने निजी क्षेत्र के कारोबार को व्यवस्थित तरीके और बेरहमी से खत्म कर दिया था क्योंकि अमेरिका समर्थक कारोबारी दिग्गजों ने उनके खिलाफ तख्तापलट का समर्थन किया था। वेनेजुएला के लाखों लोग इस अराजकता से भागकर दूसरे देशों में शरण ले चुके हैं।
वेनेजुएला राहत की गुहार लगा रहा है, लेकिन बदलाव अंदर से आना चाहिए, अमेरिका के जंगी जहाजों या मिसाइलों से नहीं। वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो काराकास में सत्ता बदलाव के लिए अमेरिकी फौजी दखल की मांग कर रही हैं। बेशक, यह कोई नई बात नहीं है। वे बस पिछले दो दशकों में अपने पूर्ववर्तियों की तरह ही कर रही हैं, जो सब यही करते रहे थे। शावेज से पहले लगभग पांच दशकों तक वेनेजुएला पर बारी-बारी से राज करने वाली दो मुख्य अभिजात वर्ग की भ्रष्ट राजनैतिक पार्टियां 1998 के चुनावों में साफ हो गईं। शावेज की जबरदस्त जीत और उनकी भारी लोकप्रियता के मद्देनजर विपक्षी नेताओं ने अगले चुनावों में हिस्सा लेने से मना कर दिया। शावेज ने इस मौके का फायदा उठाकर कांग्रेस में भारी बहुमत हासिल किया, संविधान बदला और सत्ता अपने हाथ में ले ली। विपक्ष की गैर-मौजूदगी में वे तानाशाह बन गए। उन्होंने फौजियों को नागरिक प्रशासन की नौकरियां देकर और उन्हें भ्रष्ट होने और हिस्सेदार बनने देकर अपने साथ मिला लिया था। मदुरो को बस वही विरासत मिली है।
जब तक अमेरिका वेनेजुएला में सत्ताधारी बड़े नेताओं के सिर पर इनाम तलवार लटकाए रखेगा, तब तक निष्पक्ष चुनाव और सरकार में लोकतांत्रिक बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं है। वेनेजुएला के विपक्ष को मदुरो सरकार के नेताओं के साथ सीधे टकराना और बातचीत करनी चाहिए और उनकी सुरक्षा की गारंटी देनी चाहिए। अर्जेंटीना, ब्राजील और चिली की राजनैतिक पार्टियों ने बिना किसी बाहरी दखल के, खुद सरकारों से लड़कर आततायी फौजी तानाशाही से लोकतंत्र बहाल किया था। चिली के बेरहम तानाशाह पिनोशे ने 1990 में फौजी और मानवाधिकारों के हनन में शामिल अधिकारियों की रक्षा के लिए बनाए गए संवैधानिक, कानूनी, सैन्य और व्यक्तिगत छूट और गारंटी का पैकेज मिला, तो निर्वाचित सरकार को सत्ता सौंपने पर राजी हुए। वे जीवन भर सीनेटर बने रहे और चिली के सालाना तांबे के निर्यात रेवेन्यू का 10 प्रतिशत पाते रहे।
(लेखक लैटिन अमेरिका के विशेषज्ञ हैं और 2000-03 में वेनेजुएला में राजदूत रहे हैं)