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कैशलेस अर्थव्यवस्था का सपना सच करने के लिए ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी जरूरी

किसी देश की वृद्धि और विकास का प्रमुख सूचक अर्थव्यवस्था में सब का समावेश होता है। बहुत से देशों की...
कैशलेस अर्थव्यवस्था का सपना सच करने के लिए ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी जरूरी

किसी देश की वृद्धि और विकास का प्रमुख सूचक अर्थव्यवस्था में सब का समावेश होता है। बहुत से देशों की सर्वोपरि प्राथमिकता सस्ती वित्तीय सेवाओं के साथ अर्थव्यवस्था में सब का समावेश है। भारत भी इनमें एक है। जी-20 देशों ने लैंगिक समानता के लक्ष्य पूरे करने और सतत विकास को बढ़ावा देने हेतु अर्थव्यवस्था में सब के समावेश के महत्व पर बार-बार प्रकाश डाला है। किसी देश की वैश्विक प्रगति महिला सशक्तिकरण पर निर्भर करती है जैसा कि संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव कोफी आनन ने एक बार कहा था- ‘महिला सशक्तिकरण ही विकास का सबसे अधिक प्रभावी साधन है।’’ उन्होंने अर्थव्यवस्था में सब के समावेश के माध्यम से आर्थिक लैंगिक समानता के महत्व पर भी जोर दिया।

यह देखा गया है कि अत्यधिक गरीबी में गुजर करते लोग अक्सर डिजिटल ट्रांजेक्शन का लाभ नहीं ले पाते हैं। मोटे तौर पर उन्हें जिन्दगी को आसान बनाती डिजिटल सुविधाओं की जानकारी नहीं होती है। और चूंकि टियर 1 और टियर 2 शहरों की महिलाएं अर्थव्यवस्था में समावेश के मॉडल में महत्वपूर्ण भागीदारी करती हैं इसलिए उन्हें जानकारी देना सर्वोपरि प्राथमिकता होनी चाहिए।

विकसित देशों में अर्थव्यवस्था में सब के समावेश का मॉडल संरचनात्मक लक्ष्य पूरा करने का माध्यम बन रहा है। इसलिए भारत जैसे विकासशील देशों में इस मॉडल को लागू करने से गांवों के विकास में मदद मिल सकती है। गांवों की महिलाओं को नकद के हिसाब-किताब, बचत, बैंक के काम-काज, बीमा, निवेश और अन्य वित्तीय सेवाओं के बारे में जानकारी देता प्रगतिशील वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम भारत के गांवों में लैंगिक पिछ़ड़ापन दूर करने में सहायक हो सकता है। टियर 1 और टियर 2 शहरों में सस्ती वित्तीय सेवाओं के माध्यम से महिला सशक्तिकरण की सुविधा देना सतत विकास की सुनियोजित व्यवस्था हो सकती है।

यह देखा गया है कि गांवों की अधिकतर महिलाओं के लिए वित्तीय जानकारी सुलभ नहीं है और फिर साक्षरता में भी कमी है इसलिए वे बैंकिंग सेवाओं, खासकर ऑनलाइन या डिजिटल सेवाओं का लाभ लेने में असमर्थ हैं। यह भी एक हकीकत है कि बैंकों में ज़्यादातार पुरुष होते हैं इसलिए महिलाएं बैंक जाने में असहज महसूस करती हैं। इस दृष्टिकोण से गांवों की महिलाओं के लिए अर्थव्यवस्था में समावेश और डिजिटल शिक्षा का महत्व और स्पष्ट हो जाता है।
इन चुनौतियों को दूर करने के लिए भारत सरकार देश को कैशलेस अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में निरंतर प्रयासरत है जिसमें पुरुष और महिलाएं बराबरी की भागीदारी कर पाएं। लेकिन बैंकों की शाखाओं में पुरुषों की अधिकता से असहज महसूस करती महिलाओं का बैंक जाना आसान नहीं लगता है जबकि गांव के पुरुषों के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है। इसलिए वित्तीय साक्षरता कार्यक्रमों में डिजिटल साक्षरता को अहम स्थान देना होगा ताकि महिलाएं दूर किसी भी जगह से अपने मोबाइल फोन से ही बैंक के जरूरी काम करें।

कुछ फिनटेक कम्पनियां और संगठन भारत के दूरदराज के क्षेत्रों की महिलाओं में वित्तीय साक्षरता बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं और वित्तीय और डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम भी शुरू किए हैं। इनमें एक फिनटेक कम्पनी पेवर्ल्ड है जिसने अब तक विभिन्न क्षेत्रों की 10,000 से अधिक महिलाओं को रिटेल काम-काज करने में सक्षम बनाया है।

(लेखक पेवर्ल्ड के मुख्य परिचालन अधिकारी हैं।)

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