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दक्षिण पूर्व एशिया के हालात

वैश्विक आर्थिक मंदी है। यूरोप की हालत बदतर हो गई है। अमेरिका और चीन जैसे देश भी परेशान हैं। नए बाजार और सस्ता कच्चा माल की तलाश में ये देश परेशान हैं। इस लिहाज से दक्षिण पूर्व एशिया में इन देशों को रास्ता नजर आ रहा है।
दक्षिण पूर्व एशिया के हालात

जापान और यूरोजोन की अर्थव्यवस्था बहुत खराब है। 2016 की पहली तिमाही में अमेरिका का आर्थिक विकास एक फीसद से भी कम रहा। अमेरिका का औद्योगिक उत्पादन 1.6 फीसद से नीचे चला गया। चीन का विकास दर छह फीसद से घटकर तीन फीसद पर आ गया है। चीन में हड़तालें बढ़ गई हैं। 2015 में 27 सौ हड़तालें हुईं। 2016 में छह हजार। इस्पात के 60 फीसद कारखाने बंद हो गए हैं।

अमेरिका और चीन- दोनों ही देशों में दक्षिण पूर्व एशिया के बाजार पर कब्जे की होड़ भारत और पाकिस्तान पर केंद्रित हो गई है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने देश को अमेरिका के करीब ले गए हैं। ऐसे में चीन अपनी चाल चल रहा है। चीन ने नेपाल को अपने पाले में लिया है, जो पाकिस्तान के नजदीक है। जाहिर तौर पर कश्मीर और पूर्वोत्तर में भारत-विरोधी गतिविधियां चला रहा है पाकिस्तान। उद्देश्य है भारत के हितों को प्रभावित करना।

दूसरी ओर, अमेरिका ने दक्षिणी चीन सागर में अपनी गतिविधियां बढ़ाकर चीन पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। अमेरिका के रक्षा सचिव आश कार्टर के अनुसार, अमेरिका दक्षिणी प्रशांत के प्रति समर्पित और मजबूत है। लेकिन चीन को दक्षिण चीन सागर में उकसावे की कार्रवाई से बाज आना चाहिए। चीन अगर विवादित क्षेत्र में जमीन पर दखल की कोशिश करता है तो नतीजे बुरे होंगे। दक्षिणी प्रशांत नीति के लिहाज से इस सागर क्षेत्र का अमेरिका के लिए सामरिक महत्व है। जबकि, चीन आर्थिक, राजनीतिक और सैनिक नियंत्रण चाहता है।

अमेरिकी और चीनी एक दूसरे से नहीं लड़ेंगे। दोनों ही परमाणु शक्ति संपन्न हैं। दोनों ने एक-दूसरे की अर्थव्यवस्था में अच्छा-खासा निवेश किया है। लेकिन छाया युद्ध दोनों के बीच जारी है और इससे दोनों को नहीं रोका जा सकता। इस छाया युद्ध में भारत और पाकिस्तान का इस्तेमाल हो रहा है। ऐसा लगता है कि हमलोग बारूद के ढेर पर बैठे हैं, जहां कभी भी विस्फोट हो सकता है।

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