दुआर के उत्तर पच्छिम कोण पर पकड़ी का दैत्याकार पेड़ था। उसकी जड़ें ऊपर-नीचे निकलती पसरती थोड़ी जमीन में थी और बाकी ऊपर भी। जेठ की निचाट दुपहरी में रमजान रिक्शा उसके नीचे खड़ा करके भुसौल में रखी खटिया बिछाकर घाम उतरने तक वहीं सोता। उन दिनों घड़ी देखना आया नहीं था, उसके आने का समय अपनी परछाई पर खड़े होने का समय था। यानी सूरज जब एकदम माथे पर आकर खड़ा हो जाता और हवा कहीं ठहर गयी लगती थी। दूर बगीचे की ओर ताकते दृश्य कांपते दिखते। रमजान जब आता तो इनार के डोल से दु-चार डोल पानी अपने पैरों ओर डालता और माथा-चेहरा भींगा लेता। फिर वही खटिया फिर वही नींद। गर्मियों की दुपहर इतनी शांत लगती गोया खुद बोलो तो अपनी आवाज अपरिचित लगे। वैसे में रमजान अपने पसन्द का एक गीत गाते गुनगुनाते सो जाता - 'ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं'...उसका जोर इन पंक्तियों ओर होता - सेहरा में आके भी मुझको सहारा ना मिला'। वैसे उसने खाना कभी माँगा हो सो याद नहीं पर सतुआ हफ्ते में तीन चार दुपहरी इया से मांग ही लेता और बगल की केरवानी से पतई काटकर उसी पर खा लेता। मैंने उसको घोरुआ पीते कभी-कभी देखा था। सीट के नीचे से टोंटीदार लोटे में मिर्च और नून का घोरुआ बनाकर पीता था। पापा कहते कि 'ते का कमालिस रे सार ? आधा दिन त पकड़ी के लगे सुतिये के बिता देबे ले? बकीयवा ऐने ओने टनडइली काटे में बीत जाला तोर।'- रमजान हँसोड़ था, ठठाकर हँसता और आसमान किनोर उंगली उठाकर कहता - चाचा वहां पैदल ही जाना है, सब एहिजा रह जाई। पेट भर आ डॉक्टर भर के कमा लेबे नी। एकरा से बेसी का होइ। - उसका रिक्शा पूरब टोला में खड़ा होता। हमारे यहाँ उसका आना दुपहरिया का ही था या जाड़ों में कभी कुछ विशेष बनने पर खाने या त्योहारों में। मुझे याद है वह हमेशा जालीदार बनियान पहनता और गले मे मल्टीपरपज गमछा लपेटे रहता। हाँ! यह अलग बात है कि जब उसके रिक्शा पर जानना सवारी चढ़ती तो बाकायदा कुर्ता पहनकर एकदम एहतियात से ले जाता। जाड़े में गांती और दो दिन पर, फिर साप्ताहिक, फिर पाक्षिक स्नान अवश्य कामिल रहता।
रमजान की खूबियाँ कई थी जिसमें एक तो गीत गाने का, दूसरा नाच देखने का। मुझे लगता है नाच का शौक उसको हजरत नचनिया के संघत से लगा था। हजरत से उसकी 'आयी मिलन की रात सइयाँ मारा ऐसा लात' टाइप का छेड़क रिश्ता था। हजरत के मौत के बाद रमजान के गीत कम हुए थे पर वह घूर के आगे बैठकर खाना खाने तक शोले या मेरा गाँव मेरा देश टाइप के फिल्मों की कथा अभिनय करके सुनाता। मैं मेरे भाई बहन या मेरे हमउम्र बुआ के लड़कों-लड़कियों को उसकी यह किस्सागोई खूब रुचती। जिन रातों में कुहासा अधिक पड़ता उन रातों में हमारे लंबे ओसारे में चट्टी की दीवार लटकाकर फर्श पर पुआल का लंबा बिस्तर लगता और पेटारी का तकिया, जिसपर मोटे रेशे वाले काले कंबल का चादर डाला जाता था। वैसा गर्म बिस्तर क्या कोई इंतजाम करेगा। बहरहाल, रमजान वही गांती में चुक्का मुक़ा बैठकर सुनाता फेर गब्बर सिंघवा होली के दिने आयिल घोड़ा पर बईठके, सउँसे रास्ता हवा से बतियावत गाँव ओरी आईल, खड़कुम खड़कुम खड़कुम - खड़कुम यानी घोड़े की टाप। गब्बरवा आयिल आ जय विरुआ के घेर के कहलस - क्या जी तुम्हीं लोग बेसी हवा काट रहा है ठकुरवा के साथे? आंय ? बोलता काहे नहीं है जी? रमजान पीछे गर्दन हिलाकर फिर सुनाता - ऐ सांभा! ठाकुरवा केने हैं लउक नहीं रहा है?'- रमजान की यह कहानी पूरी फिल्मी है वाली महफ़िल गर्मी के दोपहर के सतुआन पर या सर्दियों में लीटी और विशेष व्यंजनों के खाने के कॉल पर खत्म होती। हम सब भीतर खाने भाग जाते और वह ओसारा या पकड़ी के नीचे बैठकर अपना खाता। शोले या उसकी सुनाई कई फिल्में हमने इतनी ही सुनी, क्योंकि उसके नैरेशन में इतना विस्तार होता कि इंटरवल हो जाता। मुझे ठीक-ठीक याद है, इंटरवल का अर्थ उस पता नहीं कितने तक पढ़े रमजान से पता चला था। मेरे पापा रीना राय के चुप्पा फैन हैं, यह तब पता लगा जब एक रोज नाद में लगहर को सानी गोतते पापा जोर से बोले - रे! कबो नागिन भा रीना राय के कवनो फिलिम के कहानी हमरो के सुनाव। - रमजान वही से अपना काम रोक बोला था - उहे नु - तेरे संग प्यार में नहीं छोड़ना। चलs ना भईया जनता में लागल बा। - लाला यानी मेरे दादा तब जिंदा थे, वह ओसारे में बीमार और उम्रदराज़ होने की वजह से बैठे रहते थे। पापा ने जीभ काटी और एक मोटा विशेषण रमजान की ओर उछाला - सार लउकत नईखे के बइठल बा चिलाईल जरूरी रहल ह।
रमजान रोज का किस्सा रहा और उसके किस्से गीत भी। बस उसको अपने रिक्शे से मजाक पसंद नहीं था। न हतो हमलोगों को उसके पास फटकने देता न रिक्शे ओर एक छटाँक धूल बैठने देता। मुझे लगता था उसकी सारी दुनिया उसके रिक्शे के मोटे नारियल के रेशे वाली गद्देदार सीट के नीचे वाले खाली जगह में रहती गई। एक बार मैंने देखा था वह उसमें दो लाल रंग की फॉरेक्स (शायद यही नाम था) मेन्टल बत्ती (पेट्रोमैक्स) के खाली डिब्बे में पैसे रखा करता। मैं अमूमन अधिक नहीं बोलता सो मेरे लिए उसका रिक्शा एक्सेसेबल था। ऐक्सेसेबल मतलब उसके सीट ओर बैठना और उसपर पीछे बने पहाड़ एक पतली नदी कुछ पौधे और एक झोपड़ी को देख भर लेना। रमजान मजा लेता - हमार घर एहिजा ह।
मुझे रमजान की विदाई ठीक-ठीक याद नहीं, वह कब गया क्यों गया। कहाँ तो हमने सुना था कि वह अकेले है, उसके दोस्त के नाम पर हजरत नचनिया थे। हजरत के माटी दिए जाने के बाद नहर के रास्ते वही तो लाया था हमें। वह कहाँ गया, यह मैं जान नहीं पाया। बाद के कुछ वर्षों में जब मैं दिल्ली आ गया तो एक रोज पापा से पूछा - पापा ने इतना ही कहा - उ होने बड़हरिया ओरी छक्का टोला ओर के रहे। बाद में ओनही चल गईल। - मेरे जीवन के पहले किस्सागो को ऐसी एक्जिट मिलेगी, मुझे अंदाज़ा नहीं था। पर शायद ज़िन्दगी यही है। हम जब क्षणों में जीना चाहते हैं तब यादों की रेत के केवल कुछ क्षण हथेलियों से चिपके बचे रह जाते हैं। रमजान की फ़िल्म इंटरवल तक ही रह गई कभी द एन्ड आया ही नहीं। जिंदगी का हिसाब रखने वाले अगर रख सकें तो उनसे यह दरख्वास्त रहेगी कि मेरे बचपने में पहली विस्तृत पेंटिंग/स्केच मैंने दर्ज की थी तो वह रमजान के रिक्शे के पीछे दर्ज वही चित्र था जिसे वह हंसकर अपना घर कहता था, एक पहाड़, एक पतली नदी और एक छोटी झोपड़ी।
उस किरदार का एक्जिट क्यों-कब-कैसे-कहाँ ही रह गया। कभी न खत्म होने वाले इंटरवल का वह अप्रतिम किस्सागो था - रमजान । एक अधूरी कहानी बची रह गयी ऐसा लगता है कभी। कहानी अभी बाकी है दोस्त ...।
(डॉ. एम. के. पांडेय सत्यवती कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसियेट प्रोफेसर हैं)