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आतंकवाद के ज्वलंत मुद्दे से त्रस्त विश्व को अनोखा समाधान सुझाती ‘आज़मगढ़’

कमलेश मिश्रा डॉक्युमेंट्री और लघु फिल्मों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले लेखक,...
आतंकवाद के ज्वलंत मुद्दे से त्रस्त विश्व को अनोखा समाधान सुझाती  ‘आज़मगढ़’

कमलेश मिश्रा डॉक्युमेंट्री और लघु फिल्मों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले लेखक, निर्माता-निर्देशक हैं जिन्होंने डेढ़ घंटे की पहली फीचर फिल्म “आज़मगढ़’’ लिखी और निर्देशित की है। सबके चहेते, सुविख्यात पंकज त्रिपाठी के साथ नवोदित अनुज शर्मा, अमिता वालिया, रामजी बाली, सुसेन बरार, प्रदीप गुलाटी तथा अन्य कलाकारों ने इसमें अभिनय किया है। “आज़मगढ़’ में इक्कीसवीं सदी के आरंभ का दौर दिखाया है जब भारत समेत अमेरिका और यूरोप तक आतंकी हमलों से त्रस्त थे। 

 

बेहद सुलझी मानसिकता और निहायत संवेदनशील प्रकृति के कमलेश मिश्रा ने इस फिल्म का निर्माण बड़े सधे अंदाज़ में किया है। आतंकी हमलों के तार उत्तर प्रदेश के ‘आज़मगढ़’ शहर से जुड़े थे अतः उन्होंने ‘आज़मगढ़’ को कहानी के केंद्र में रखा। फिल्म की कहानी उन सच्ची घटनाओं पर आधारित है जिसमें बाटला हाउस एनकाउंटर में शामिल आज़मगढ़ के लड़कों ने पकड़े जाने पर बताया था कि आतंकवादी बनाने के लिए उनका किस तरह ब्रेन वॉश किया गया था। आतंकवाद पर बनी बहुतेरी फिल्मों से अलहदा इस फिल्म में उन्होंने ना फालतू का रोमांस दिखाया, ना अकारण खून-खराबा दिखाया। उन्होंने निम्न मध्यमवर्गीय परिवार वाले माँ-बेटे की भावनात्मक कहानी दिखाई है। ‘आज़मगढ़’ का फिल्मांकन उत्तर प्रदेश के आजमगढ़, वाराणसी, अलीगढ़ और दिल्ली की वास्तविक लोकेशनों पर हुआ है। ये फिल्म पंकज त्रिपाठी और कमलेश मिश्रा के सिनेमाई सफर के आरंभिक दौर की है जब फिल्म में चित्रित शहरों का माहौल आज से बिल्कुल अलग था। फिल्म देखकर लगता है कि कमलेश मिश्रा ने कतर-ब्योंत करके, सीमित बजट में इसका निर्माण किया है। 

 

 

इक्कीसवीं सदी के आरंभ में जुनूनी दहशतगर्दों द्वारा आतंकवाद का निहायत गलीज, गलत रास्ता अपनाकर समूचे विश्व में वर्चस्व स्थापित करके हुकूमत कायम करने हेतु बम विस्फोटों द्वारा दहशत भरा आतंक फैलाना; छोटे-बड़े शहरों में बम-धमाकों से सैंकड़ों बेगुनाहों की जान जाने और माल-असबाब का नुकसान होने पर बड़े फख्र से बर्बादी की ज़िम्मेदारी लेकर जश्न मनाना और जेहादियों को शहीद का दर्जा देना; विशेष शांतिप्रिय समुदाय से शिक्षित युवाओं को चुनकर उन्हें मज़हब का वास्ता देना और बहला-फुसलाकर या मर्ज़ी के खिलाफ़ ज़बरदस्ती, अज्ञात स्थानों पर ले जाकर उनका ब्रेनवॉश करके आतंकवादी गतिविधियों में शामिल करने हेतु प्रशिक्षित करना; अपने मज़हब और कौम को सर्वश्रेष्ठ मानकर दुनिया पर कब्जा करने की बेतुकी ख़्वाहिश की ख़ातिर, जुनूनी-खुंख्वार दहशतगर्द आकाओं द्वारा ख़ुद आगे ना आकर, मानव बमों को कुर्बानी के लिए तैयार करके खास-ओ-आम को तबाह करने के लिए भेजना; और जैसा संसार का नियम है कि बुराई का अंत बुरा होता है तो अंत में अपने अंजाम को पहुंचना; कमलेश मिश्रा द्वारा निर्देशित ‘आज़मगढ़’ की कहानी का सार यही है। 

 

 

शानदार, बेहतरीन, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पंकज त्रिपाठी की बेमिसाल, अनूठी अभिनय प्रतिभा किसी परिचय की मोहताज नहीं है। उन्होंने बेहद सधे अंदाज़ में ‘अशरफ’ नामक शातिर मौलवी का किरदार निभाया है जो बजाहिर तो पढ़ाई के लिए शहर आने वाले प्रतिभाशाली नौजवानों को ऊंची तालीम के लिए प्रोत्साहित करता है। पर दरअसल अपने आकाओं के निर्देश पर वो दिमाग के तेज युवा मुस्लिम लड़कों को मज़हब की दुहाई देकर, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक दबाव डालकर, जेहाद की राह पर चलने के लिए उनका ब्रेनवॉश करता है। फिल्म में पंकज त्रिपाठी और अनुज शर्मा के कुछ संवाद बेहद प्रभावोत्पादक हैं। ‘मिशन में इमोशन नहीं’ - फिल्म की ये टैगलाइन जो पोस्टर पर भी अंकित है, मानीखेज़ और जानदार है। 

‘आज़मगढ़’ में नवोदित अभिनेता ‘अनुज शर्मा’ मेधावी छात्र ‘आमिर’ के रोल में है और अमिता वालिया उसकी विधवा माँ के रोल में है। फिल्म की शुरुआत में बारहवीं कक्षा में पूरे सूबे में अव्वल आने की ख़बर, ख़ुशी-ख़ुशी माँ को सुनाने के लिए ‘आमिर’ दौड़ा-दौड़ा आता है। परीक्षा का सर्वश्रेष्ठ परिणाम आने के बावजूद, मोहल्ले का हिंदू लड़का उसको ताना देता है कि ‘वो तालीम हासिल करके भी आतंकवादी ही बनेगा क्योंकि आज़मगढ़ की ज़मीन ‘राहुल सांकृत्यायन, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, शिबली नोमानी, कैफी आज़मी’ जैसे विद्वानों की बजाए आतंकवादी पैदा करने लगी है। सीमित संसाधनों के बावजूद, ऊंची पढ़ाई के लिए माँ उसको अलीगढ़ भेजती है। ‘आमिर’ के वहम-ओ-गुमान में भी नहीं रहता कि अलीगढ़ में उसकी ज़िंदगी कैसा निर्णायक मोड़ लेगी। आमिर को उस लड़के की बात कचोटती है और उसको गलत साबित करने के लिए वो आतंकवादी संगठन में शामिल होकर, अपने अंदाज़ में जवाब देता है जिसका अंत देखने से ताल्लुक रखता है। पूरी फिल्म में ‘आमिर’ की विचलित करने वाली ख़ामोशी से अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि उसका अगला कदम क्या होगा। ‘अनुज शर्मा’ ने संवादों की बजाए आँखों के भावों से बेहतर अभिनय किया है। कमलेश मिश्रा ने नए कलाकारों से अच्छा अभिनय करवाकर कुशल निर्देशकीय क्षमता का परिचय दिया है। 

 

कमलेश मिश्रा को सच्ची घटनाओं पर आधारित कहानी होने से असली पात्रों की पहचान छुपानी पड़ी। कहानी की संवेदनशीलता के मद्देनज़र, कुछ मसलों पर निर्णय करना उनके लिए कठिन रहा होगा। फिल्म में बेवजह के बम विस्फोट और हमले नहीं दिखाना समझदारी भरा निर्णय था। फिल्म की कहानी रहस्यपूर्ण या उबाऊ नहीं है इसलिए अंत तक दर्शकों की उत्सुकता बनी रहती है। कमलेश मिश्रा ने फिल्म में रावण दहन का प्रसंग और आतंकवादियों का समूल नाश, जिस प्रतीकात्मक अंदाज़ में दिखाया है, उसके लिए वे निःसन्देह बधाई के पात्र हैं। ‘आज़मगढ़’ से मनोरंजन की अपेक्षा रखने वालों को निराशा होगी क्योंकि इस संजीदा फिल्म का संदेश स्पष्ट है कि देश की सुरक्षा की ख़ातिर बेशक प्राणों की आहुति क्यों ना देनी पड़े पर अपने देश के प्रति प्रेम-सम्मान, हर कौम और मज़हब से ऊपर होना चाहिए । 

कमलेश मिश्रा द्वारा कलमबद्ध गीत के बोल ‘ये जो नारे हैं, अंगारे हैं’ काफी अच्छे हैं। प्रताप सोमवंशी लिखित, दरगाह पर फिल्माई गई कव्वाली ‘किसकी लागी नज़र’ रूहानी और सुकूनदायक है। फिल्म में बार-बार आतंकवादी घटना संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़ दिखाने से कहानी का तारतम्य टूटता है जो खटकता है। कमलेश मिश्रा ने अधिकतर डॉक्युमेंट्रीज़ बनाई हैं इसलिए फिल्म में डॉक्युमेंट्री का प्रभाव झलकता है। कहीं-कहीं संवाद अदायगी स्पष्ट ना होने से सुनने में दिक्कत होती है। फिल्म का पार्श्व संगीत और अच्छा होता तो कहानी को गति दे सकता था। फिल्म वाले अक्सर सीन की डिमांड के बहाने नायक-नायिका का रोमांस दिखाते और उन्हें गवाते-नचाते हैं पर कमलेश मिश्रा ने ‘आज़मगढ़’ में ऐसे ज़बरदस्ती के प्रयोग नहीं किए हैं, जो उनके गंभीर स्वभाव का परिचायक है अतः काबिले-तारीफ़ है।  

‘आज़मगढ़’ २०१९ में उर्दू सर्टिफिकेट के साथ सेंसर द्वारा पास की गई थी जो नफीस उर्दू में लिखे संवादों वाली साफ़-सुथरी फिल्म है। २०२० में कोविड महामारी की वजह से ये सिनेमाघरों में रिलीज नहीं की जा सकी थी। हाल ही में पंकज त्रिपाठी और कमलेश मिश्रा के बीच भी फिल्म को लेकर विवाद हुआ था। ‘आज़मगढ़’ २८ अप्रैल, २०२३ को ओटीटी एप ‘मास्क टीवी’ पर रिलीज की गई है। आतंकवाद जैसी ज्वलंत समस्या पर आधारित, कमलेश मिश्रा द्वारा निर्देशित और पंकज त्रिपाठी अभिनीत ‘आज़मगढ़’ सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर सकती है। 

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