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गांधीवादी घनश्याम शुक्ल जिन्होंने स्त्री शिक्षा के लिए भीख मांगने से भी परहेज नहीं किया

जिनके किरदार से आती हो सदाक़त की महक उनकी तदरीस से पत्थर भी पिघल सकते हैं   यह पंक्ति किसी अज्ञात की...
गांधीवादी घनश्याम शुक्ल जिन्होंने स्त्री शिक्षा के लिए भीख मांगने से भी परहेज नहीं किया

जिनके किरदार से आती हो सदाक़त की महक

उनकी तदरीस से पत्थर भी पिघल सकते हैं

 

यह पंक्ति किसी अज्ञात की है। ठीक इस पंक्ति की तरह ही, इस रिपोर्ताज का वह नायक भी अभी लगभग अज्ञात है, जिसकी तदरीस (शिक्षा) ने हजारों लड़कियों के भविष्य पर पड़े पत्थर को पिघला दिया।

 

जैसा की हिंदी समाज में हमेशा से होता आया है, मुक्तिबोध से लेकर रमाशंकर यादव विद्रोही तक को उनके मरने के बाद जाना गया। ठीक वैसे ही बिहार के सिवान जिला के पंजवार गांव निवासी निष्काम कर्मयोगी घनश्याम शुक्ल की सबसे अधिक चर्चा पिछले वर्ष उनकी मृत्यु के बाद हुई। हालांकि वह चर्चा भी ठेठ घुमंतू पत्रकारों, देहाती कलाधर्मियों और कुछ सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच ही महदूद रही।

 

गांधी, जेपी (जयप्रकाश नारायण), लोहिया और किशन पटनायक के विचारों के अनुयायी घनश्याम शुक्ल प्रखर राजनैतिक चिंतक थे। वह ताउम्र अध्ययनशील रहे। घनश्याम शुक्ल के छात्र और बाद में उनके सहयोगी रहे रमन तिवारी बताते हैं कि उनके 'गुरूजी' अपने अंतिम वर्षों में भी सात से आठ घंटे पढ़ा करते थे।

 

ज्ञान की चमक उनके साम्य आवरण और आचरण से भी झलकती थी। उनका पूरा व्यक्तित्व संस्कृत के श्लोक 'विद्या ददाति विनयम' को चरितार्थ करता था। ऐसा कहा जाने लगा है कि शुक्ल ने अपने प्रयासों से पंजवार को बिहार का दूसरा नालंदा (ज्ञान की धरती) बना दिया। हालांकि कभी पंजवार को श्रापित बताया जाता था। आस-पास के गांवों में यह चर्चा आम थी कि पंजावर को हरदेव बाबा का श्राप है कि वहां का कोई भी बच्चा मैट्रिक पास नहीं करेगा।

 

इस कथित श्राप को धता बताकर सबसे पहले पंजवार के सत्यनारायण मिश्र, रघुनाथ प्रसाद और सुरेंद्र लाल ने मैट्रिक पास की थी। तब पंजवार में कोई स्कूल नहीं था। यह तीनों दोस्त अपने गांव से 10 किलोमीटर दूर सिसवन गांव में पढ़ने जाते थे। बाद में सत्यनारायण मिश्र आईपीएस बने और बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के चेयरपर्सन हुए। सुरेंद्र लाल प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) बने और प्रमोशन पाकर एडीएम की कुर्सी तक पहुंचे। वहीं रघुनाथ प्रसाद डीआईजी बने।

 

घनश्याम शुक्ल के जन्म (5 नवंबर, 1949) के नौ साल पहले 1940 में सत्यनारायण मिश्र ने पंजवार में एक पुस्तकालय की स्थापना की। बाद में मिश्र ने ही शुक्ल को लाइब्रेरियन बना दिया। इसके बाद से शुक्ल पुस्तकाल में ही रहने लगे। कालांतर में घनश्याम शुक्ल पुस्तकालय को गांव के बीच से थोड़ा बाहर निकाल मुख्य सड़क के नजदीक ले आए। आज उस पुस्तकालय को 'विद्या मंदिर पुस्तकालय' के नाम से जाना जाता है। ग्रामीणों की स्मृतियों में आज भी लाइब्रेरी के सामने झाड़ू लगाते शुक्ल की छवि ताजा है।

 

घनश्याम शुक्ल ने सिवान के डीएवी कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। उनका विषय- समाजशास्त्र, हिंदी साहित्य और राजनीति विज्ञान था। 1982 में उन्हें जमनपुरा गांव स्थित सरकारी मध्य विद्यालय में शिक्षक की नौकरी मिली। उन्हें कवि गोपाल सिंह नेपाली और प्रेमचंद की रचनाएँ बहुत पसंद थी। उन्होंने मैक्सिम गोर्की की माँ, सूरदास की सूरसागर और कालिदास की अभिज्ञान शाकुंतलम् कई बार पढ़ी थी। भारत को समझने के लिए वह नेहरू की 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' पढ़ने की सलाह दिया करते थे।

 

घनश्याम शुक्ल छात्र जीवन से ही राजनीतिक और सामाजिक कार्यों में सक्रिय थे। वह किशन पटनायक के नेतृत्व वाले लोहिया विचार मंच, सोशलिस्ट पार्टी के योजन सभा, समाजवादी जन परिषद, जनता पार्टी और समता संगठन से जुड़े रहे। जेपी के साथ आपातकाल विरोधी आंदोलन में भी शामिल हुए। उनके राजनीतिक जीवन के कई हतप्रभ करने वाले किस्से हैं, जिनका जिक्र आगे मिलेगा।

 

संस्थानों के निर्माण के जरिये राष्ट्र निर्माण

 

लाइब्रेरी को नए ढंग से पुनर्स्थापित करने के अलावा घनश्याम शुक्ल ने चार संस्थानों का निर्माण किया- कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (अब यह सरकारी हाईस्कूल हो चुका है), बिस्मिल्लाह खां संगीत महाविद्यालय, प्रभाप्रकाश महाविद्यालय और मैरी कॉम खेल एकेडमी। इन सभी संस्थानों के निर्माण के दौरान शुक्ल द्वारा किए गए संघर्ष की कहानी विस्मित करने वाली है।

 

भीख मांगकर लड़कियों के लिए खोला गांव का पहला स्कूल

 

घनश्याम शुक्ल ने साल 1982 में जन सहयोग से पंजवार में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला था। शुक्ल के स्कूल खोलने के विचार को गांव में खूब समर्थन मिला। पहले वह स्कूल का नाम 'प्रभा प्रकाश' रखना चाहते थे। यह नाम जयप्रकाश नारायण की पत्नी और स्वतंत्रता सेनानी प्रभावती और जेपी के नाम के संयोजन ( प्रभावती का 'प्रभा', जयप्रकाश नारायण का प्रकाश) से बना था। लेकिन बाद में इस नाम को त्यागना पड़ा।

 

दरअसल तब बिहार में कांग्रेस की सरकार थी और बिंदेश्वरी दुबे मुख्यमंत्री थी। शुक्ल को उनके सुधीजनों ने सलाह दी कि वह जेपी के नाम पर स्कूल का नाम न रखें, वरना सरकार से कोई सहायता नहीं मिलेगी। फिर शुक्ल ने स्कूल का नाम महात्मा गांधी की पत्नी और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कस्तूरबा गांधी के नाम पर रखा। काफी मशक्कत के बाद स्कूल का सरकारीकरण हुआ।

 

हालांकि इस स्कूल के खुलने के बाद, गांव में एक और स्कूल खुला था। घनश्याम शुक्ल के बड़े बेटे चंद्रभूषण शुक्ल बताते हैं कि तब लोग पिता जी से कहा करते थे कि आपके स्कूल का सरकारीकरण नहीं होगा क्योंकि आपके पैसा नहीं है। दूसरे स्कूल वाले के पास पैसा है, उनका हो जाएगा।

 

इस पर पिताजी जवाब दिया करते थे कि ठीक है हमारे पास पैसा नहीं है। लेकिन हमारे पास कटोरा है, भिक्षा का कटोरा। इसका कोई लिमिटेशन नहीं है। उनके पास जितना भी धन हो, उसका एक लिमिट होगा। लेकिन भिखारी का कोई लिमिट नहीं है। अनलिमिटेड है।'' घनश्याम शुक्ल के बेटे लोहे की वह छोटी पेटी भी दिखाई, जिसमें शुक्ल शिक्षा के लिए भिक्षा मांगा करते थे। पेटी पर आज भी लिखा है, ''शिक्षार्थ भिक्षा''

 

स्कूल की स्थापना के शुरुआती दिनों में आर्थिक सहयोग जुटाने के लिए शुक्ल ने एक विशेष तरह का कार्यक्रम भी चलाया था। चंद्रभूषण शुक्ल बताते हैं कि ''तब हम लोग बहुत छोटे थे। पिताजी हम बच्चों की टोली को हर घर से मुठिया वसूलने के लिए भेजते थे। मुठिया का मतलब एक-एक मुट्ठी अनाज वसूलना।

 

दरअसल पिताजी ने गांव के लोगों से निवेदन किया था कि जो भी उनके घर में बने, जैसे सात लोगों के लिए आटा/चावल बने, तो उसमें से एक मुट्ठी निकाल दें। एक मुट्ठी निकालने से घर में कम नहीं होता और इस तरह एक सप्ताह में आधा किलो आटा या चावल हो जाया करता था।'' मुठिया से जुटाए गए चावल और आटा को बेचकर, जो पैसे मिलते थे उसे शुक्ल स्कूल में लगाया करते थे।

 

 

लता मंगेशकर के लिए 30 किलोमीटर पैदल चले

 

घनश्याम शुक्ल कला को समाज के लिए जरूरी मानते थे। वह खुद अपने खाली वक्त में पेंटिंग बनाया करते थे। उन्हें संगीत सुनने का भी बहुत शौक था। वह बचपन से लता मंगेशकर के फैन थे। दीवानगी ऐसी कि लता मंगेशकर पर छपी मैगजीन को खरीदने के लिए वह सिवान से पंजवार (करीब 30 किलोमीटर) पैदल ही निकल पड़े थे।

 

बात उन दिनों की है, जब वह सिवान के डीएवी कॉलेज से इंटर की पढ़ाई कर रहे थे। उन्हें सिवान से अपने घर पंजवार आना था। सिवान रेलवे स्टेशन के पास स्थित ढाला से पंजवार के लिए बस मिलती थी। तब बस की टिकट का किराया दो रुपया हुआ करता था। घनश्याम शुक्ल को स्टेशन के पास एक मैगजीन दिखी, जिस पर लता मंगेशकर की तस्वीर छपी थी और उनसे जुड़ी कई रोचक जानकारी लिखी थी। मैगजीन की कीमत थी दो रुपये। शुक्ल के पास कुल पैसे थे दो रुपये। अब उन्हें यह फैसला लेना था कि वह टिकट लें या मैगजीन। अंत में उन्होंने मैगजीन को चुना और सिवान से पैदल पंजवार आए।

 

संगीत के प्रति उनके इसी रूझान ने उन्हें 11 मार्च, 1994 को 'बिस्मिल्ला ख़ाँ संगीत महाविद्यालय' की स्थापना करने की प्रेरणा दी। उन्होंने संगीत महाविद्यालय के एक का कक्ष नाम 'लता मंगेशकर कक्ष' रखा। इससे भी मजेदार बात यह है कि गांव में संगीत महाविद्यालय की स्थापना करने जैसा असामान्य काम करने वाले शुक्ल खुद उसके उद्घाटन समारोह में शामिल नहीं हुए थे। उद्घाटन वाले दिन वह एक सामाजिक कार्य के लिए दिल्ली में थे। दिल्ली का उनका प्रोग्राम पहले से तय था। उनका यह कदम बताता है कि वह क्रेडिट लेने से अधिक नेपथ्य के रहकर काम करने में यकीन रखते थे।

 

संगीत महाविद्यालय खोलने पर पुलिस में हुई शिकायत

 

घनश्याम शुक्ल द्वारा गांव में संगीत महाविद्यालय खोले जाने का भारी विरोध हुआ। अलग-अलग लोगों के विरोध का कारण भी अलग-अलग था। कई ग्रामीणों को शहनाई वादक बिस्मिल्ला ख़ाँ के नाम से परेशानी थी। उनका मानना था कि बिस्मिल्ला ख़ाँ के नाम पर संगीत महाविद्यालय का नाम होने से, गांव में मुसलमान आकर बस जाएंगे।

 

कुछ लोग तो संगीत महाविद्यालय की शिकायत लेकर पुलिस के पास ही पहुंच गए। उन्होंने पुलिस को बताया कि यहां कोई संगीत महाविद्यालय नहीं चल रहा, इसमें बाहर से कुछ चरवाहे वगैरा आकर हल्ला करते हैं। इससे पत्र-पत्रिका पढ़ने वालों को परेशानी भी हो रही है। पुलिस शिकायत के बाद प्रखंड स्तर के अधिकारी जांच के लिए पहुंचे। जांच में पता चला कि संगीत महाविद्यालय में 135 छात्र-छात्राओं का नामांकन हैं, जिसमें से 70 उपस्थित मिले। शिकायत गलत साबित हुई।

 

घनश्याम शुक्ल द्वारा शुरू किया गया बिस्मिल्ला ख़ाँ संगीत महाविद्यालय आज भी चलता है। प्रत्येक शनिवार क्लास होती है। इस संगीत महाविद्यालय से अब तक 18 लड़के-लड़कियों का चयन विभिन्न शिक्षण संस्थानों में बतौर म्यूजिक टीचर हो चुका है। ऐसे ही एक शिक्षक हैं संजय, जो कभी बिस्मिल्ला ख़ाँ संगीत महाविद्यालय के छात्र हुआ करते थे।

 

नेत्रहीन संजय संगीत महाविद्यालय तक पहुंचने और अपनी जिंदगी में आए सकारात्मक बदलाव का पूरा श्रेय घनश्याम शुक्ल को देते हैं। वह अपने अब-तक के सफर को याद करते हुए बताते हैं कि, ''मैंने गुरुजी से कहा था कि मेरी आँखों की रोशनी नहीं है। अगर संगीत सीख लूंगा तो जीवन जीने का कुछ आधार मिल जाएगा।''

 

बता दें कि इतना सुनने के बाद घनश्याम शुक्ल संजय को संगीत महाविद्यालय ले गए और टीचर से कहा कि इन्हें संगीत सिखाइए, जो पैसा लगेगा मैं दूंगा। इनसे पैसा मत मांगिएगा। उस वक्त संगीत महाविद्यालय की फीस मात्र 10 रुपये प्रति माह थी। लेकिन संजय वह भी देने में असमर्थ थे।

 

जब संजय का मल तक साफ करने को तैयार हो गए थे शुक्ल

 

घनश्याम शुक्ल समाज के सभी वंचित वर्गों को लेकर बेहद संवेदनशील थे। यही वजह थी कि दृष्टिबाधित संजय के प्रति उनका अनुराग थोड़ा अधिक था। संजय ने खुद हमसे बातचीत एक ऐसा प्रसंग बताया, जो उन्होंने उससे पहले कभी किसी को नहीं बताया था।

 

वह कहते हैं, ''साल 2001 की बात है। हम गुरुजी से बोले कि हमारे पास हारमोनियम नहीं है इसलिए हम रोज यहीं आकर अभ्यास किया करेंगे। दिन में पढ़ाई लिखाई और घर का कुछ काम करेंगे। शाम होने पर अपना टिफिन लेकर यहीं आ जाएंगे। लेकिन समस्या यह है कि मुझे दिखता नहीं है। ऐसे में अगर मुझे पेशाब करने या मल त्याग करने जाना होगा तो कैसे जाऊंगा?

 

इस पर गुरुजी ने कहा कि गर्मी का मौसम है आप छत पर सो लीजिएगा। और अगर पेशाब आए तो छत पर ही बिस्तर से थोड़ा हटकर कर लीजिएगा। मैं सुबह आऊंगा तो उसे पानी से धोकर झाड़ू मार दूंगा। लेकिन आप अभ्यास जारी रखिए। यदि आप मल त्याग भी कर देते हैं तो मैं उसे भी साफ कर दूंगा। लेकिन आप रोजाना आइए। आप टिफिन भी मत लाइए। मैं आपके लिए यहीं भोजन की व्यवस्था कर देता हूं।''

 

घनश्याम शुक्ल के गुजरने से अवसाद ग्रस्त हो चुके संजय भर्राई आवाज में कहते हैं, ''मेरी माँ मरी थीं तब मैं उतना दु:खी नहीं हुआ था जितना गुरुदेव के जान से मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ गया है।''

 

लड़कियों की शिक्षा के लिए लगा दी जीवन भर की पूंजी

 

गांव में लड़कियों की स्कूली शिक्षा के लिए विद्यालय खोल चुके घनश्याम शुक्ल नौकरी से रिटायर्ड होने के बाद एक बालिका महाविद्यालय की शुरुआत करना चाहते थे। शिक्षक के पद से सेवानिवृत्त होने के उपरांत उन्होंने साल 2008 में गांधी जयंती के मौके पर 'प्रभा प्रकाश डिग्री कॉलेज' की स्थापना की थी। वह इसी नाम से स्कूल भी खोलना चाहते थे, जिसका जिक्र ऊपर हो चुका है। बता दें कि जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती सिवान जिला की ही रहने वाली थीं।

 

प्रभा प्रकाश डिग्री कॉलेज को खोलने के लिए घनश्याम शुक्ल को बड़े जतन करने पड़े थे। उनकी जिंदगी भर की कमाई भी जब कम पड़ने लगी, तो वह चंदा के लिए दिल्ली तक गए थे। शुक्ल के स्कूलमेट बी.एन. जादव बताते हैं कि दोनों को 5-5 रुपये के दिल्ली में 10-10 रुपये के लिए बहुत दूर-दूर तक पैदल चलना पड़ा था। शुक्ल कहा करते थे कि, ''लेने वाले का हाथ हमेशा नीचे होता है और देने वाले का ऊपर। अगर कोई पांच रुपये भी दे दिया तो हम उसे धन कहते हैं और 500 भी दे दिया तो धन्यवाद कहते हैं।''

 

अपने आदर्शों के पक्के शुक्ल डिग्री कॉलेज के प्रांगण में लगे आम के पेड़ों का एक आम तक वहां पढ़ाने वाले शिक्षकों को नहीं खाने देते थे। उनका स्पष्ट कहना होता था कि शिक्षकों को पढ़ाने के लिए सैलरी मिलती है, वह कोई और लाभ नहीं ले सकते। शुक्ल उन्ही आमों को बेचकर, उसका पैसा कॉलेज में लगा दिया करते थे। उनका पूरा पेंशन भी कॉलेज की ही कोष में जाता था।  

 

'गुरुजी हमनियो के खेले के चाह तानि सन'

 

महिलाओं के उत्थान और लड़कियों की शिक्षा के लिए अपना जीवन खपा देने वाले घनश्याम शुक्ल को अपने क्षेत्र का प्रखर नारीवादी माना जाता है। लड़कियां उनके सामने अपनी बात बड़ी मुखरता से रखती थीं। एक रोज ऐसी ही दो लड़कियों ने शुक्ल के सामने खेलने की इच्छा व्यक्त की थी। लड़कों का मैच देख रहे शुक्ल के पास आकर लड़कियों ने कहा, 'गुरुजी हमनियो के खेले के चाह तानि सन'

 

लड़कियों की इस बात को सुनते ही उनके दिमाग में एक नई योजना कौंध गई। उन्होंने लड़कियों को अगली शाम खेलने के लिए बुलाया। इससे पहले उन्होंने करीब 25,000 रुपये का इंतजाम कर, खेल का सामान मंगाया। इस तरह घनश्याम शुक्ल ने साल 2018 में पंजवार में लड़कियों के लिए 'खेल एकेडमी' की भी स्थापना कर दी। उन्होंने इसका नाम मशहूर बॉक्सिंग चैंपियन मैरी कॉम के नाम पर रखा। वह कहते थे कि मैरीकॉम के नाम से लड़कियों कभी हार न मानने की प्रेरणा मिलेगी। क्योंकि मैरीकॉम शादी होने और मां बनने के बाद भी दो बार विश्व चैंपियन बनी हैं।

 

मैरीकॉम खेल एकेडमी से अब तक चार लड़कियां 'एकलव्य' के लिए चुनी जा चुकी हैं। एकलव्य बिहार सरकारी की खेल एकेडमी है, जिसमें खिलाड़ियों का रहना, खाना और पढ़ना सब मुफ्त होता है। मैरीकॉम में मुख्य रूप से लड़कियां हॉकी का अभ्यास करती हैं। पहली बार ट्रायल के लिए मैरी कॉम खेल एकेडमी से 18 लड़कियां पटना गयी थीं। पहली बार जाने पर न तो उन्हें कोई जानता था। न ही उनका कोई प्रभाव था।

 

मैरी कॉम खेल एकेडमी के कोच संतोष बताते हैं कि, ''हम लोग अपनी-अपनी चटाई लेकर पटना पहुंचे थे। लड़कियों ने पटना स्टेशन पर ही स्नान किया था और वहीं से तैयार होकर ट्रायल के लिए गयी थीं। पहली बार में ही हम 10 में से चार मारकर आए थे।''

 

शुक्ल के निधन से निराश मैरी कॉम खेल एकेडमी की एक नन्ही खिलाड़ी कहती है, '' बहुत दुख है कि सर अब नहीं रहे। पहले हम लोग आते थे, तो गुरुजी हम लोगों के साथ एक गार्जियन की तरह रहते थे। हम लोगों को मोटिवेट करते थे। हम पेपर नहीं पढ़ते, तो बोलते थे कि तुम लोग पेपर पढ़ा करो। महान -महान हस्तियों की जीवनी बताया करते थे। साथ ही किताब पढ़ने की सलाह भी दिया करते थे।''

 

 

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