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किसान आंदोलन : मंडियों पर डीबीटी वार, पंजाब-हरियाणा की मंडी और आढ़ती व्यवस्था पर चोट

“केंद्र ने रबी फसल की खरीद में सीधे किसानों के खाते में पैसा डालकर पंजाब और हरियाणा की मंडी और आढ़ती...
किसान आंदोलन : मंडियों पर डीबीटी वार, पंजाब-हरियाणा की मंडी और आढ़ती व्यवस्था पर चोट

“केंद्र ने रबी फसल की खरीद में सीधे किसानों के खाते में पैसा डालकर पंजाब और हरियाणा की मंडी और आढ़ती व्यवस्था पर की चोट”

लगभग ग्यारह महीने से-पहले छह महीने पंजाब में और पांच महीने से दिल्ली की सीमा पर- डटे किसान आंदोलन का हौसला तोड़ने के लिए क्या केंद्र अब किसानों के खाते में सीधे नकद हस्तांतरण (डीबीटी) को औजार बनाना चाहता है? क्या इसके जरिए कृषि उपज मंडियां खत्म करने और अंतत: एमएसपी को बेमानी बनाने का उपाय रचा जा रहा है? दरअसल ये सवाल इसलिए मौजूं हो उठे हैं क्योंकि पहली दफा केंद्र के भारी दबाव में पंजाब में रबी फसलों की खरीद में किसानों के खातों में पैसे डाले गए और गेहूं खरीद के मौसम में कई मंडियां बंद पड़ी हैं। किसान आंदोलन के बड़े नेताओं में एक, भारतीय किसान यूनियन (राजेवाल) के अध्यक्ष बलबीर सिंह राजेवाल ने आउटलुक से कहा, ‘‘तीन कृषि कानूनों में केंद्र ने राज्य सरकारों द्वारा संचालित मंडियों को खत्म करने का प्रावधान किया है। इन कानूनों को लागू करने पर सुप्रीम कोर्ट ने भले फिलहाल रोक लगा दी है पर डीबीटी के रास्ते केंद्र ने पहले आढ़तियों को कमजोर करने की साजिश रची है, उसके बाद सात दशक पुरानी मंडियों को तोड़ना चाहती है। डीबीटी के जरिए सीधे बैंक खाते में भुगतान पाने के लिए किसानों को दशकों पुरानी परिवारों की संयुक्त जमीनों के अलग से पंजीकरण का ब्यौरा देना अनिवार्य है, जो इतनी कम अवधि में पूरा करना इसलिए मुश्किल है क्योंकि ज्यादातर किसान परिवारों की साझी जमीनें कानूनी विवाद में फंसी हैं।’’

गौरतलब है कि विवादास्पद केंद्रीय कृषि कानूनों को रद्द कराने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी अधिकार बनाने के लिए किसानों का मोर्चा दिल्ली से सटे हरियाणा के सिंघु-कुंडली, टिकरी बार्डर, राजस्थान के शहजहांपुर बॉर्डर और उत्तर प्रदेश के गाजीपुर और पलवल बॉर्डर पर आज भी डटे हैं। आंदोलन का दायरा भी पंजाब और हरियाणा से बढ़कर उत्तर प्रदेश और राजस्थान, मध्य प्रदेश के इलाकों में फैल चुका है। इस बीच, आंदोलन कई तरह की ऊंच-नीच से गुजर चुका है जिसमें 26 जनवरी की ट्रैक्टर रैली के दौरान लाला किले की घटना भी है। आंदोलन को खालिस्तानी और बड़े किसानों तथा आढ़तियों का आंदोलन साबित करने की कोशिशें भी हुईं, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। अब देखना है कि किसानों के खाते में सीधे भुगतान का क्या असर होता है।

पहले पंजाब की कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने किसान आंदोलन का मूड भांप कर केंद्र के डीबीटी प्रस्ताव को सीधे खारिज कर दिया था। लेकिन केंद्रीय खाद्य आपूर्ति और सार्वजनिक वितरण प्रणाली मंत्री पीयूष गोयल ने इसके बिना केंद्रीय यानी एफसीआइ खरीद न करने की धमकी दी तो कैप्टन सरकार को झुकना पड़ा। मुख्यमंत्री के कहने पर पंजाब के 28,000 पंजीकृत आढ़तियों ने खरीद के पहले दिन 10 अप्रैल की दोपहर ही हड़ताल खत्म करने की घोषणा की। पहले डीबीटी का विरोध करने वाले कैप्टन ने आढ़तियों के साथ डटे रहने का ऐलान किया था।

आढ़ती 1965 से केंद्र की खरीद एजेंसी भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) के लिए खरीद प्रक्रिया में सहायक रहे हैं। अब उन्हें बिचौलिया बता करके भुगतान प्रक्रिया से बाहर किया जा रहा है।  किसानों के बैंक खाते में फसलों का भुगतान बैंक कर्ज की किस्त काटकर किया जा रहा है। इससे किसान आंदोलन और पंजाब की सियासत प्रभावित हो सकती है।

केंद्र के पहले कानून ‘कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण 2020)’ में किसानों को एपीएमसी मंडियों के बाहर भी अपनी उपज बेचने का प्रावधान है। आढ़तियों को किनारे करके किसानों को सीधे भुगतान एक तरह से सरकारी मंडियों के मुकाबले प्रस्तावित निजी मंडियों का रास्ता साफ करने जैसा है। सीधे भुगतान से किसानों-आढ़तियों के बीच दशकों पुराने लेन-देन के संबंधों में दरार डालने की कोशिश का भी आरोप है। शायद कोशिश यह है कि पंजाब के बाद दिल्ली की सीमाओं पर जारी किसान आंदोलन की फंडिंग करने से आढ़तियों को दूर किया जाए। पंजाब की सियासत में भी खासा दखल रखने वाली आढ़तिया लॉबी कांग्रेेस और शिरोमणि अकाली दल की चुनावी फाइनेंसर भी है। आढ़ती फेडरेशन के अध्यक्ष तथा पंजाब मंडी बोर्ड के उपाध्यक्ष विजय कालरा गुट कांग्रेस समर्थित है तो आढ़ती एसोसिएशन के अध्यक्ष रविंदर सिंह चीमा अकाली-भाजपा सरकार के समय पंजाब मंंडी बोर्ड के उपाध्यक्ष थे।

केंद्रीय पूल के लिए पंजाब और हरियाणा से एमएसपी पर गेहूं और धान की 87,690 करोड़ रुपये की खरीद का डीबीटी से भुगतान चालू रबी सीजन से अनिवार्य कर केंद्र ने 56 साल से चली आ रही आढ़ती व्यवस्था पर चोट की है। इससे राज्य सरकार का राजस्व भी प्रभावित होगा। नाराज आढ़तियों के असहयोग, बारदाने तथा प्रवासी श्रमिकों की कमी के चलते मंडियों में 50 फीसदी से अधिक गेहूं का उठान नहीं हो पाया है। लिहाजा, मंडियां गेहूं से अटी हैं और किसान लंबे इंतजार से परेशान हैं। हरियाणा में एक अप्रैल से गेहंू की खरीद प्रक्रिया शुरू हुई। 23 अप्रैल तक मंडियों में 75 लाख टन आवक में से 30 लाख टन का उठान हो पाया है। पंजाब में 10 अप्रैल से खरीद शुरू हुई। 64 लाख टन आवक में 59 लाख टन खरीद का सरकारी दावा है पर उठान 25 लाख टन हुआ है। किसानों को फसल बेचने के लिए हफ्ते से अधिक इंतजार करना पड़ रहा है।

हरियाणा की मंडियों के लिए राज्य सरकार ने पब्लिक फाइनेंिशयल मैनेजमेंट सिस्टम (पीएफएमएस) रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया के तहत लाभार्थियों का डाटाबेस तैयार कर ‘मेरी फसल मेरा ब्यौरा’ पोर्टल की शुरुआत 2018 में ही कर दी थी। लेकिन पंजाब पर डीबीटी बगैर तैयारी के ही थोप दी गई है। तीन साल की तैयारी के बावजूद हरियाणा के किसानों को पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन में अप्रैल के पहले हफ्ते भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। पंजाब के किसान मंडियों में फसल ले जाने से पहले पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन नहीं कर पाए तो उन्हें कूपन जारी किए जा रहे हैं। कूपन की बारी के इंतजार में किसानों को अपनी उपज को खेतों में ही खुले में रखना पड़ रहा है।

पंजाब आढ़ती एसोसिएशन के अध्यक्ष किसान नेता रविंदर सिंह चीमा कहते हैं, ‘‘किसानों और आढ़तियों के बीच डीबीटी की दीवार खड़ी करके सदियों पुराने संबंध तोड़ने की केंद्र की कोशिशें नाकाम साबित हो रही हैं। 1961 से एपीएमसी एक्ट तहत राज्य सरकारों के नियंत्रण में आई मंडियों से पहले मुगल काल से ही मंडियों में किसानों और आढ़तियों के बीच व्यापारिक लेन-देन के संबंध रहे हैं। किसानों की ओर पंजाब के 28,000 लाइसेंसशुदा आढ़तियों का करीब 30,000 करोड़ का कर्ज बकाया रहता है। किसान आढ़ती का कर्ज नहीं मारेगा। बैंक खाते में पैसे आने के बावजूद वे चेक से आढ़तियों का बकाया चुका रहे हैं।’’

चीमा का कहना है कि बंगाल में चुनाव के चलते इस बार मंडियों में 30 फीसदी बारदाने (जूट की बोरियां) की कमी है, जिससे गेहूं उठान में देरी हो रही है। 135 लाख टन गेहूं के लिए बारदाने की 5.42 लाख गांठों (एक गांठ में 500 बोरियां) की जरूरत है। कमी 68,000 गांठों की है। केंद्र सरकार भुगतान की प्रक्रिया से आढ़तियों को किनारे नहीं करती तो आढ़ती अपने प्रयासों से यह कमी पूरी करते। 2012 में भी बारदाने की कमी हुई थी, तब आढ़तियों ने ही बारदाने का इंतजाम कर खरीद व्यवस्था को सुचारू बनाए रखा था।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के पूर्व चेयरमैन डॉ.एस.एस. जोहल कहते हैं, ‘‘आगे चलकर केंद्र व राज्य सरकारों की तमाम सब्सिडी को डीबीटी के तहत लाने की योजना है। केंद्र सरकार का छुपा एजेंडा एमएसपी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को खत्म कर मंडियों में सरकारी खरीद बंद करने के रूप में सामने आएगा। डीबीटी केवल भुगतान का ऑनलाइन जरिया है यह आढ़तियों का विकल्प कभी नहीं हो सकता।’’

डीबीटी के लिए ‘मेरी फसल मेरा ब्यौरा’ कारगर होने का दावा करने वाले हरियाणा के कृषि मंत्री जय प्रकाश दलाल ने आउटलुक से कहा, ‘‘मंडियों के सूदखोर साहूकारों के चंगुल में फंसे किसानों को उनके कर्ज जाल से निकालने में केंद्र का डीबीटी भुगतान क्रांतिकारी कदम है। गेहूं के उठान में देरी जींद, कैथल, रोहतक, सोनीपत और पानीपत में इसलिए आई क्योंकि इन जिलों की मंडियों में 90 फीसदी गेहूं की फसल की आवक का दबाव सरकारी खरीद एजेंसियों पर है, जबकि दक्षिणी हरियाणा के रेवाड़ी, नारनौल, महेंद्रगढ़, पलवल आदि जिलों की मंडियों में 50 फीसदी गेहूं की खरीद सरकारी एजेंसियों ने की है और बाकी सरसों की फसल प्राइवेट खरीदारों द्वारा की जा रही है।’’ हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा, ‘‘उठान न होने से 30 लाख टन से अधिक गेहूं मंडियों में खुले में पड़ा है। सरकार का दावा था कि 48 घंटे के भीतर मंंडियों से गेहूं का उठान होगा। 72 घंटे के भीतर किसानों को भुगतान का दावा भी झूठा साबित हुआ क्योंकि खरीद के तीन हफ्ते बाद भी 80 फीसदी किसानों को भुगतान नहीं हुआ है।’’ 

 

केंद्र सरकार आढ़तियों को कमजोर करके सात दशक पुरानी मंडियों को तोड़ना चाहती है

बलवीर सिंह राजेवाल

अध्यक्ष, भाकियू (राजेवाल)

 

आढ़ती-किसान संबंध सिर्फ कर्ज तक सीमित नहीं

ढाई फीसदी आढ़त दर से ही पंजाब और हरियाणा के लाइसेंसशुदा पंजीकृत आढ़तियों की सालाना कमाई 2020-21 में केंद्रीय पूल के लिए खरीदे गए 87,690 करोड़ रुपये के गेहूं और धान पर करीब 2200 करोड़ रुपये बैठती है। सेंटर फॉर रिसर्च इन रूरल ऐंड इंडस्ट्रियल डवलपमेंट (क्रिड)के कृषि अर्थशास्त्री डॉ. आर.एस. घुम्मण के मुताबिक देश में 86 फीसदी किसान दो हेक्टेयर से कम जमीन के मालिक हैं, जिनमें 60 फीसदी बैंकों के सस्ते कर्ज से वंचित होने के कारण साहूकारों के महंगे कर्ज पर निर्भर हैं। आढ़ती सालाना 18 से 24 फीसदी ब्याज पर कर्ज देते हैं। कृषि के लिए बैंक कर्ज पर ब्याज दर 1980 के 22 फीसदी से घटकर आज 4 फीसदी पर आ गई है, लेकिन साहूकारों की ब्याज दरें वही हैं। सालभर में दो फसलें बेचने के बाद अमूमन एक किसान के हाथ (आढ़ती को भुगतान के बाद) 30 फीसदी नकदी आती है। 70 फीसदी रकम आढ़ती का कर्ज-ब्याज चुकाने, खाद, बीज, कृषि उपकरण, डीजल और घर का राशन, कपड़े आदि खरीदने में खर्च हो रही है। मंडी के इर्द-गिर्द इन चीजों का कारोबार भी आढ़तियों और उनके परिवार के पास है।