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जनता के मौन का खतरा भी

भारतवासी अपने संस्कार और हजारों वर्षों की परंपरा से धैर्यवान हैं। जीवन में कठिनाइयों से जूझना, श्रम के साथ प्रकृति-ईश्वर के प्रति आस्था। रखना उनके स्वभाव में है। इसलिए आर्थिक क्रांति की तरह सरकार द्वारा रातों-रात एक हजार और पांच सौ के नोटबंदी के फैसले पर देश के विभिन्न भागों में गंभीर समस्याओं, लंबी पंक्तियों, बीमारी के इलाज, असामयिक मृत्यु, विवाह में बाधाओं के बावजूद हिंसक घटनाएं नहीं हुई। सरकार ने इस धैर्य और मौन को निर्णय का व्यापक समर्थन एवं स्वीकृति करार दिया है।
जनता के मौन का खतरा भी

सुप्रीम कोर्ट तक ने चिंता व्यक्त की कि समय रहते लोगों के दैनन्दिन जीवन-यापन की परिस्थिति बिगड़ने पर उपद्रव तक हो सकते हैं। फिर भी 10 दिनों में इक्का-दुक्का स्‍थानों पर परस्पर टकराव की घटनाएं सामने आईं। देश भर के बैंक कर्मचारियों ने भी अद्भुत कार्यक्षमता से निरंतर सेवाएं दीं और एक-दो ने तो ड्यूटी निभाते हुए जान तक दे दी। लेकिन मांग के अनुरूप बैंक शाखा में करेंसी नहीं पहुंचने पर वे भी असहाय की तरह खेद ही व्यक्त कर सकते हैं। यों स्थिति सामान्य होने के लिए प्रधानमंत्री ने 50 दिन की अवधि दी है। लेकिन नियमों में संशोधनों और राहत के कुछ आपात कदमों की घोषणाएं भी हो रही हैं। लेकिन विशाल देश में आश्वासनों या नियमों पर अमल अथवा बैंक या डाकघरों में समुचित व्यवस्‍था संभव नहीं हो पा रही है। इसी कारण महानगरों, राजधानियों और शहरों से अधिक गंभीर मुसीबत ग्रामीण क्षेत्रों के भोले-भाले लोग झेल रहे हैं। सड़क या हॉट बार में छोटी दुकान लगाने वालों से लेकर ग्रामीण मजदूरों, खेतीहर किसानों को एक दिन-एक रात काटना मुश्किल हो रहा है। वे भयावह अकाल की स्थिति में बूंद-बूंद पानी की प्यास की तरह करेंसी नोट के दर्शन को तरस रहे हैं। गांव या शहर के लोगों को सीमा पार से हो रहे नकली करेंसी के आर्थिक हमलों एवं मोटे कालाबाजारियों के काले धन पर अंकुश को लेकर प्रसन्नता है। लेकिन आखिरकार, बच्चों-बूढ़ों या महिलाओं के लिए दैनन्दिन आवश्यक वस्तुओं के लिए भी त्रस्त रहने, अपने ही बैंक खातों से खून-पसीने की कमाई का एक हिस्सा न निकाल पाने के अस्‍थायी सही पर कठोर नियम-कानून से बेचैनी बढ़ रही है। पूर्वोत्तर राज्यों या वनांचल वाले प्रदेशों के दूरस्‍थ गांवों में आक्रोश उभरने लगा है। संभव है देर-सबेर स्थिति सुधर जाए। लेकिन जीवन में पहली बार युद्ध से बदतर स्थिति में काटे गए दिनों को क्या अति प्रभावित लोग भूल पाएंगे। इमरजेंसी में परिवार नियोजन के ऑपरेशन कार्यक्रम में कई स्‍थानों पर हुई जबर्दस्ती एवं ज्यादती के घाव ने संपूर्ण समाज को उत्तेजत कर दिया था। उस समय भी गांवों में न हिंसा भड़की और न ही विद्रोह हुआ। लेकिन सन 1977 में लोकतांत्रिक वोट का अधिकार मिलने पर कांग्रेस की सत्ता को जनता ने पूरी तरह उखाड़ फेंका। इसलिए अधिक धैर्य और मौन के दूरगामी खतरों को ध्यान में रखते हुए सरकार को कम से कम ग्रामीण क्षेत्रों में तत्काल बड़े पैमाने पर राहत एवं पूरे देश में नया विश्वास बनाने की आवश्यकता है।

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