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नोटबंदी को लेकर मनमोहन सिंह ने क्या कहा था? क्या उनकी बातें सच साबित हुईं

8 नवंबर 2016 की रात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की घोषणा ने एक बड़े बदलाव की दस्तक दी। उस आधी रात के बाद 1000-500...
नोटबंदी को लेकर मनमोहन सिंह ने क्या कहा था? क्या उनकी बातें सच साबित हुईं

8 नवंबर 2016 की रात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की घोषणा ने एक बड़े बदलाव की दस्तक दी। उस आधी रात के बाद 1000-500 के बड़े नोट एक झटके में चलन से बाहर हो गए। नोटबंदी लागू हो गई। जहां सरकार इस कड़े कदम को ऐतिहासिक बता रही थी, वहीं विपक्ष ने इसे विध्वंसकारी करार दिया।

इन सब घटनाओं के बीच पूर्व प्रधानमंत्री (अर्थशास्‍त्री ) डॉ. मनमोहन सिंह की नोटबंदी को लेकर आशंकाएं सामने आईं। आगे चलकर उनकी बातें काफी हद सक सच साबित होती भी दिखाई दीं।

दरअसल, सितंबर में माह में सरकार की तरफ से जारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल-जून 2017 की तिमाही में जीडीपी की दर पिछले साल की इसी अवधि की 7.9 प्रतिशत की तुलना में 2 प्रतिशत से अधिक गिरकर 5.7 प्रतिशत रह गई, जो पिछले 3 वर्ष में सबसे न्यूनतम स्तर है। वर्ष 2016-17 की अंतिम तिमाही में यह 7.1 प्रतिशत रही थी।

24 नवंबर 2016 को संसद में बहस के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सरकार को नोटबंदी को लेकर चेतावनी दी थी। मनमोहन सिंह ने कहा था कि नोटबंदी के चलते जीडीपी विकास दर में दो प्रतिशत की गिरावट होगी।

मनमोहन सिंह ने कहा था, “मुझे जॉन कीन्‍स याद आते हैं जिन्‍होंने एक बार कहा था कि अंत में तो हम सब मर ही जाएंगे।” उन्‍होंने यह पलटवार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान पर किया था जिसमें उन्‍होंने कहा था कि कुछ लोग यह कह रहे हैं कि इस कदम(नोटबंदी) से आने वाले समय में परेशानी होगी लेकिन यह दीर्घकाल के लिए देशहित में है।

मनमोहन ने कहा, “मैं आगे बताना चाहता हूं कि मेरे विचार से जिस तरह से नोटबंदी को लागू किया गया है, उससे हमारे देश की कृषि विकास को नुकसान होगा। छोटे उद्योगों और असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों को दिक्‍कत होगी।”

देखिए, डॉ. मनमोहन सिंह ने नोटबंदी को लेकर क्या-क्या आशंकाएं जाहिर की थी..

 

ये थी आशंकाएं

 

-“नोटबंदी का असर क्या होगा मुझे नहीं पता। इससे लोगों का बैंकों में विश्वास खत्म होगा।”

 

-“जीडीपी में 2 फीसदी की गिरावट आ सकती है।”

 

-“इससे छोटे उद्योगों और कृषि को भारी नुकसान का सामना करना पड़ेगा।”

 

मनमोहन की अहम बातें

 

-“मैं नोटों को रद्द किए जाने के उद्देश्यों से असहमत नहीं हूं, लेकिन इसे ठीक तरीके से लागू नहीं किया गया।”

 

-“प्रधानमंत्री बताएं कि ऐसा कौन सा देश है जहां लोग बैंक में पैसा जमा करा सकते हैं लेकिन अपना पैसा निकाल नहीं सकते हैं।”

 

-“लंबे समय में असर की बात हो तो उस अर्थशास्त्री की बात याद करें- दीर्घकाल में तो हम सब मर चुके होंगे।”

 

-“बैंक हर दिन नियम बदल रहे हैं जिससे लगता है कि पीएमओ और रिजर्व बैंक ठीक से काम नहीं कर रहे हैं।”

99 फीसदी नोट वापस आए

आरबीआई ने वर्ष 2016-17 की अपनी सालाना रिपोर्ट में बताया है कि नोटबंदी के तहत कुल 15.44 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 1000 और 500 रुपये के नोट चलन से बाहर किये गए थे। इनमें से 30 जून, 2017 तक कुल 15.28 लाख करोड़ रुपये के करेंसी नोट आरबीआई में वापस आ चुके हैं। यानी बंद हुए 98.96 फीसदी नोट वापस बैंकों में जमा हो गए। कुल 16,000 करोड़ रुपये के पुराने नोट वापस नहीं आए हैं, जो बंद हुए नोटों का करीब एक फीसदी है।

 

जीडीपी की ग्रोथ रेट: सही साबित हुई मनमोहन की आशंका?

वित्त वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में जीडीपी की ग्रोथ तीन साल के न्यूनतम स्तर पर 5.7 पर आ गई है। लगातार तीसरी तिमाही में नोटबंदी के चलते जीडीपी की ग्रोथ पर असर दिखाई दिया है। मैन्युफैक्चरिंग से जुडे उद्योग-धंधों में सुस्ती को जीडीपी ग्रोथ में कमी की प्रमुख वजह माना जा रहा है। इससे पहली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 6.1 फीसदी रही थी। जबकि पिछले  वित्त वर्ष 2016-17 की पहली तिमाही में जीडीपी की ग्रोथ 7.9 फीसदी थी।

कृषि और असंगठित क्षेत्र पर तगड़ी मार

कृषि क्षेत्र पर भी नोटबंदी की तगड़ी मार पड़ी। नोटबंदी के दौरान छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पंजाब, मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों में किसानों को फसल के दाम नहीं मिल पाने की वजह से उसे सड़कों पर फेंकनी पड़ी। कई टन आलू, टमाटर और खाद्य सामग्रियां इस दौरान बरबाद हुईं। किसानों को इस दौरान बहुत नुकसान झेलना पड़ा। कई जानकार महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में भड़के किसान आंदोलन की वजह भी नोटबंदी को मानते हैं।

इसके अलावा असंगठित क्षेत्र में करोड़ों की संख्या में काम करने वाले लोगों को इस दौरान अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ा। भारतीय मजदूर संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बैजनाथ राय ने कहा था, "तीन करोड़ से ज्यादा मजदूर अपने घर लौटने को मजबूर हुए हैं। करीब पांच करोड़ मजदूर कंस्ट्रक्शन सेक्टर में काम करते हैं जिसमें से आधे से ज्यादा को रोजगार खत्म होने की वजह से स्‍थ्‍ाल से पलायन करना पड़ा। अगर इसमें दूसरे असंगठित क्षेत्र पर पड़ने वाले असर को देखा जाए तो हमारा अनुमान है कि नोटबंदी का असर चार से पांच करोड़ मजदूरों के रोजगार पर पड़ा है।"

नोटबंदी के बाद के हालात और नतीजों को देखकर आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि मनमोहन सिंह के द्वारा कही गई बातें कितना सच साबित हुईं। 

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