गौरतलब है कि पिछले लोकसभा चुनाव से पूर्व भाजपा का चुनाव अभियान शुरू होने से पहले रामदेव ने नरेंद्र मोदी को पतंजलि योगपीठ बुलाया था और तब देश भर के सभी प्रमुख संत भी योगपीठ में जुटे थे। उस मौके पर रामदेव कमोबेश यह साबित करने में सफल रहे थे कि नरेंद्र मोदी पर उनका काफी प्रभाव है। नरेंद्र मोदी ने भी परोक्षतः रामदेव की बात की पुष्टि की थी। देश में चुनावी बिगुल बजने के बाद रामदेव ने देशभर में नरेंद्र मोदी के लिए प्रचार किया। उन्होंने सावर्जजनिक तौर पर संकल्प लिया था कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही वे पतंजलि योगपीठ लौटेंगे। उन्होंने अपने राजनीतिक संगठन भारत स्वाभिमान मंच को भी नरेंद्र मोदी केा प्रधानमंत्री बनाने की मुहिम के साथ नत्थी कर दिया था। इस सारी मुहिम के बाद रामदेव यह अपेक्षा कर रहे थे कि दिल्ली दरबार में उनकी हैसियत काफी बड़ी होगी, लेकिन मोदी ने सत्तारोहण के साथ ही रामदेव को लेकर एक खास तरह की तटस्थता अख्तियार कर ली। इस स्थिति से रामदेव नाखुश थे और वे प्रधानमंत्री के शपथ-ग्रहण समारोह में भी नहीं गए। हालांकि, उन्होंने पिछले एक बरस में प्रधानमंत्री को पतंजलि योगपीठ बुलाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। यह उम्मीद की जा रही थी कि 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर रामदेव की मुराद पूरी हो जाएगी, लेकिन तब भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। जबकि, रामदेव और उनके सहयोगी बालकृष्ण ने प्रधानमंत्री के साथ योग के होर्डिंग्स से पूरे इलाके को पाट दिया था।
अब, प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी की पहली उत्तराखंड यात्रा की तारीख तय हुई तो लोगों को थोड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि उनकी इस यात्रा में रामदेव और पतंजलि योगपीठ का कोई उल्लेख नहीं है। अभी तक जो यात्रा कार्यक्रम जारी हुआ है, उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऋषिकेश के दयानंद आश्रम जाएंगे। इस आश्रम के संचालक स्वामी दयानंद गिरि उनके पुराने परिचित हैं और इन दिनों अस्वस्थ चल रहे हैं। इससे यह सवाल और ज्यादा चर्चा में आ गया है कि प्रधानमंत्री पतंजलि योगपीठ जाकर रामदेव की लाज रखेंगे या उन्हें अनदेखा कर देंगे। सूत्रों का कहना है कि रामदेव और उनके समर्थक इस कोशिश में जुटे हैं कि प्रधानमंत्री पतंजलि योगपीठ जरूर रुकें, भले ही वे पांच-दस मिनट का टाइम दें। ऐसा न होने पर रामदेव को न केवल संतों के बीच, वरन उद्योग जगत में भी अपना प्रभाव कम होता नजर आएगा। जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी तक यही मैसेज दिया है कि वे किसी खास संत-संन्यासी के निकट नहीं हैं। रामदेव के साथ जुड़े कई विवादों के चलते भी प्रधानमंत्री उनके ज्यादा निकट नहीं दिखना चाहते। यदि, वे निकटता दिखाएंगे तो फिर ऋषिकेश के स्वामी चिदानंद मुनि, भारत माता मंदिर के संस्थापक स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जैसे संतों और शांतिकुंज परिवार की ओर से असहजता दिख सकती है। कल सुबह तक यह तय हो जाएगा कि रामदेव की हसरत पूरी होगी या उन्हें एक बार फिर निराशा का मुंह का देखना पड़ेगा। प्रधानमंत्री का न आना रामदेव के लिए कई कारणों से परेशानी का सबब बनेगा।