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राजस्थान सरकार और किसानों के बीच बातचीत जारी, 14 जिलों में फैला आंदोलन

आमतौर पर जन आंदोलनों की तरफ ध्यान तभी जाता है जब कोई बड़ी हस्ती शामिल हो या कहीं हिंसा भड़क जाए। लेकिन पिछले दो हफ्ते से राजस्थान के शेखावाटी में फैला किसान आंदोलन न सिर्फ शांतिपूर्ण है बल्कि अपने मुद्दों और मकसद पर कायम भी है।
राजस्थान सरकार और किसानों के बीच बातचीत जारी, 14 जिलों में फैला आंदोलन

जिस समय राष्ट्रीय मीडिया खासकर टीवी चैनल गुरमीत राम रहीम की गुफा को विभिन्न कोणों से खंगालने में व्यस्त थे, राजस्थान के सीकर, चुरू, झुंझुनूं, बीकानेर, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, अलवर और नागौर जिलों में किसान सड़कों पर उतर रहे थे। मुद्दे कमोबेश वही हैं जिन्हें लेकर बीते जून महीने में मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन भड़का थ्‍ाा। या उससे पहले महाराष्ट्र में सड़कों पर दूध बिखेरने और फल-सब्जियों की आपूर्ति रोकने जैसे दृश्य दिखाए दिए थे।

अब राजस्थान के 14 जिलों में किसान आंदोलन की आग फैल चुकी है। मंगलवार को राज्य सरकार ने 11 किसान प्रतिनिधियों को वार्ता के लिए बुलाया लेकिन देर रात तक चली बातचीत में कोई सहमति नहीं बन सकी। हालांकि बुधवार को भी राज्य सरकार से किसान प्रतिनिधियों की बातचीत जारी है। अब वार्ता के बाद किसान नेता आगे की रणनीति तय करेंगे। गौरतलब है कि किसानों के द्वारा राजस्थान के जिला मुख्यालयों पर महापड़ाव (घेराव) किया जा रहा है और जगह-जगह रास्ते जाम कर दिए गए हैं। किसानों का यह आंदोलन 14 जिलों के अलावा भी राजस्थान के बाकी क्षेत्रों में तेजी से फैल रहा है।

उपज का उचित दाम, किसानों के कर्ज की माफी और समर्थन मूल्य पर खरीद 

 मोटे तौर पर देश भ्‍ार में किसानों की यही प्रमुख मांगे हैं, मगर स्थानीय मुद्दे और सियासी समीकरण इनमें जुड़ते जाते हैं। चाहे जंतर-मंतर पर विरोध के नए-नए तरीके आजमा रहे तमिलनाडु के किसान हों या मंदसौर में गोली खाए किसान, इनकी मांगों में खास अंतर नहीं है। किसान क्यों मर रहा है और उसे क्या चाहिए, यह जगजाहिर है। 

इस साल उभरे किसान आंदोलन कई मायनों में चौंकाने वाले रहे। पहले महाराष्ट्र और फिर मध्यप्रदेश में बड़े नेतृत्व और संगठनों के बगैर ही किसानों के गुस्से ने आंदोलन की शक्ल ली। फसलों की कीमत में बेतहाशा गिरावट से परेशान किसानों ने शहरों को फल-सब्जियों और दूध की सप्लाई रोककर अपना आक्रोश दिखाना शुरू किया तो आंदोलन फैलता चला गया। नेतृत्व को लेकर दावे बाद में होते रहे। जब तक मंदसौर में गोलीकांड नहीं हुआ, राष्ट्रीय दलों के नेता दूर ही रहे। बाद में कई बड़े किसान संगठनों और राजनैतिक दलों के किसान मोर्चे मैदान में कूदे लेकिन मंदसौर को बहुत आगे नहीं ले जा पाए। फिर कई चिंगारियां दबी रह गईं। 

इस बीच कई किसान संगठनों ने एकजुट होकर देशव्यापी यात्राओं और धरने-प्रदर्शन के जरिए लामबंद होने की कोशिश की। कर्ज माफी, उपज लागत का डेढ़ गुना भाव और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लेकर किसानों में जो समझ बनी है, उनमें इन कोशिशों की भी बड़ी भूमिका है। लेकिन मंदसौर के बाद भी यूपी, हरियाणा, पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्य इन आंदोलनों से अछूते रहे। इसकी एक वजह यूपी और पंजाब में कर्ज माफी का ऐलान और मानसून की अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति भी है।

किसान आंदोलनों का असर

बहरहाल, इस साल हुए किसान आंदोलनों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि महाराष्ट्र ने डेढ़ लाख और पंजाब ने दो लाख रुपये तक के कृषि कर्ज माफ करने की घोषणा की जबकि यूपी में कर्ज माफी के ऐलान पर अमल शुरू हो गया है। मध्यप्रदेश को भी उपज के दाम में अंतर की भरपाई के लिए एक योजना लानी पड़ी। इन योजनाओं के क्रियान्वयन में कई पेंच हैं, लेकिन इन आधे-अधूरे प्रयासों का श्रेय किसानों के आंदोलनों को ही जाता है। इससे राजस्थान जैसे राज्यों में भी किसानों को सड़क पर उतरने की राह दिखी, जहां सरकारें किसानों के मुद्दों को लगातार नजरअंदाज करती आ रही हैं। इस मायने में राजस्थान को मंदसौर किसान आंदोलन का अगला पड़ाव माना जा सकता है।

14 जिलों तक फैला आंदोलन

अखिल भारतीय किसान सभा के प्रांतीय संयुक्त सचिव संजय माधव ने आउटलुक को बताया कि राजस्थान में किसानों के विरोध-प्रदर्शन का सिलसिला मंदसौर घटना के बाद से ही जारी है। मगर राज्य सरकार लगातार अनदेखी करती रही। गत 1 सितंबर से किसानों ने जिला मुख्यालयों पर महापड़ाव का फैसला किया और जगह-जगह किसानों ने रास्ते जाम कर दिए हैं। माधव का दावा है कि शेखावाटी के सीकर, झुंझुनूं, चुरू और हनुमानगढ़ से शुरू हुआ यह आंदोलन 14 जिलों में फैल चुका है। इसमें गरीब-मजदूर और महिलाएं भी शामिल हैं। कई सामाजिक संगठनों ने भी समर्थन दिया है। मंगलवार को आंदोलन के 12वें दिन पूरे राजस्थान में चक्का जाम का आह्वान किया गया था, जिसका व्यापक असर देखने को मिला।

किसानों को वार्ता के लिए बुलाया

मंगलवार शाम राज्य सरकार ने 11 सदस्‍यीय किसान प्रतिनिधिमंडल को वार्ता के लिए जयपुर बुलाया। राज्य के कृषि मंत्री प्रभुलाल सैनी और जल संसाधन मंत्री रामप्रताप के अलावा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी भी किसान नेताओं को समझाने के लिए बातचीत किए। किसान आंदोलन से जुड़े सूत्रों के मुताबिक यह वार्ता रात 8 बजे से शुरू हुई लेकिन इस दौरान कोई सहमति नहीं बन सकी। बुधवार को भ्‍ाी वार्ता जारी है, जिसके बाद किसान इस मसले पर आगे की रणनीति तय करेंगे। इस बीच, बागी तेवर अपना रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता घनश्याम तिवाड़ी और विधानसभा की पूर्व स्पीकर सुमित्रा सिंह ने आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा कि किसानों की हालत वाकई बहुत खराब है लेकिन इस मामले को राज्य सरकार हल्के में लेती रही। 

स्थानीय मीडिया के मुताबिक, सोमवार को आंदोलनकारियों ने 450 से ज्यादा जगहों पर रास्ते जाम किए। हजारों यात्री फंसे हुए हैं। लेकिन पूरा विरोध-प्रदर्शन अब तक काफी अनुशासित और शांतिपूर्ण रहा है। इस मामले में यहां हालात मध्यप्रदेश से एकदम अलग हैं, जहां कई अराजक तत्व भी किसान आंदोलन में घुस गए थे।

कद्दावर नेताओं का समर्थन

अगर राजस्थान का किसान आंदोलन मध्यप्रदेश से अलग नजर आ रहा है तो इसकी एक वजह आंदोलन की अगुआई कर रही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की अखिल भारतीय किसान सभा है। सीकर में किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और चार बार विधायक रहे अमराराम और पूर्व विधायक पैमाराम आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। रविवार को राजस्थान के कद्दावर जाट नेता और नागौर से निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल ने भी किसानों को समर्थन देने का ऐलान किया। पूर्व मंत्री किरोड़ीलाल मीणा भी किसानों के पक्ष में खुलकर आ गए हैं। अमरा राम, बेनीवाल और किरोड़ीलाल मीणा की ताकत और आगामी चुनाव से कुछ महीने पहले भ्‍ाड़का हजारों-लाखों की तादाद में सड़कों पर उतरे किसानों का आक्रोश वसुंधरा सरकार के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है।

सामंती जकड़न के बीच वाम का गढ़  

राजस्थान के सियासी भूगोल में सीकर जिला वामपंथियों के प्रभुत्व वाले टापू की तरह है। सीपीएम के अमरा राम यहां से चार बार विधायक रह चुके हैं। उन्हीं की बदौलत सीकर के बड़े हिस्से में सीपीएम का असर है। इसी तरह नागौर के निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल और किरोड़ीलाल मीणा का असर भी अपने विधानसभा क्षेत्रों से ज्यादा व्यापक है। अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमरा राम का कहना है कि जब तक किसान को कर्ज से मुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक वे अपना आंदोलन जारी रखेंगे।

हरियाणा की सीमा से सटे सीकर, झुंझुनूं, चुरू, हनुमानगढ़ और पंजाब से लगते श्रीगंगानगर किसान आंदोलनों की जमीन रहे हैं। साल 2004 में भी वसुंधरा राजे के कार्यकाल में श्रीगंगानगर के घड़साना में कामरेड हेतराम बेनीवाल के नेतृत्व में इंदिरा गांधी नहर के पानी को लेकर किसान आंदोलन काफी उग्र हो गया था। वसुंधरा राजे के उस पूरे कार्यकाल में इस आंदोलन ने सरकार का पीछा नहीं छोड़ा था। 

 

 

 

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