बारामती में विमान हादसे में अजित पवार की मौत से प्रदेश और खासकर मराठा राजनीति में बड़े बदलाव की आशंका
महाराष्ट्र में सबसे लंबे समय तक उप-मुख्यमंत्री रहने वाले अजीत पवार को उनका मजाक बनाने वाले लोग ‘परमानेंट डेपुटी’ बुलाने लगे थे। लेकिन अपने प्रशंसकों के प्यारे ‘अजीत दादा’ मानते थे कि राजनीति में यह ऊंच-नीच चलती रहती है। 1982 में अपने राजनैतिक सफर की शुरुआत करने वाले अजित पवार पहली बार एक चीनी सहकारी समिति के बोर्ड के लिए चुने गए थे। इस छोटे से पद को ही उन्होंने अपनी मेहनत से बड़ा बना दिया और धीरे-धीरे सहकारी क्षेत्र में ही अपनी बढ़त बनाते चले गए। फिर आया 1991 और वे पहली बार बारामती से विधायक बने। समय-समय पर सरकार में उन्होंने सिंचाई, वित्त और जल संसाधन विभागों को संभाला और महाराष्ट्र की राजनीति में पैठ बढ़ाते चले गए।
लगातार आगे बढ़ते रहने की उनकी फितरत 28 जनवरी की सुबह चार्टर्ड प्लेन क्रैश के साथ ही रुकी। जिस प्लेन वे सवार थे, वह पुणे के पास बारामती में क्रैश हो गया। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के प्रमुख अजित पवार के साथ उसमें चार और लोग सवार थे। वे जिला पंचायत चुनावों के सिलसिले में एक सभा को संबोधित करने के लिए मुंबई से बारामती रवाना हुए थे। लैंडिंग से पहले विमान के निचले हिस्से में आग लगी और इमरजेंसी लैंडिंग के दौरान प्लेन क्रैश हो गया।
66 साल के अजित पवार छह बार राज्य के डिप्टी सीएम रह चुके थे। उन्होंने राजनीति के गुर अपने चाचा, शरद पवार से सीखे और आगे बढ़ते रहे। उनके पिता अनंतराव पवार थे।
उन्होंने कभी भी हारना नहीं सीखा। एक बार लोकसभा और आठ बार विधानसभा जीते अजित 36 साल के राजनैतिक जीवन में एक भी चुनाव नहीं हारे। बारामती से आठ बार के विधायक अजित ने 2024 के चुनाव में अपने ही भाई के बेटे युगेन्द्र पवार को 1 लाख से ज्यादा वोटों से पटखनी दे दी थी। राजनीति में दांवपेच और मोलतोल में माहिर अजित अपने ही चाचा से उस वक्त नाराज हो गए थे, जब शरद पवार ने अपनी बेटी सुप्रिया सुले को राकांपा प्रमुख बना दिया। इस कदम के पहले माना जाता था कि सही मायने में अजित ही शरद पवार के राजनैतिक उत्तराधिकारी हैं। जो भी हो, वे अचानक 23 नवंबर 2019 की सुबह भाजपा के देवेंद्र फड़नवीस के साथ सरकार बनाने और शपथ लेने राज्यपाल भवन पहुंच गए। तब चुनावों के बाद किसी पार्टी को बहुमत न मिलने से सरकार पर दावा टल गया था और महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लागू था। तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने भाजपा के देवेंद्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री और अजित को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी।

अंतिम उड़ानः बारामती में राकांपा नेता अजित पवार के विमान का मलबा
उस दिन महाराष्ट्र की राजनीति में तूफान आ गया। जल्द ही इस नाटक का पटाक्षेप भी हुआ, क्योंकि अजित इस्तीफा देकर चाचा शरद पवार की ओर चले गए। लेकिन उन्होंने यह जाहिर कर दिया कि सत्ता के लिए जोखिम उठाने का हुनर चाचा से बेहतर सीख लिया है।
हालांकि बाद में फिर वे राकांपा तोड़कर एकनाथ शिंदे सरकार में उप-मुख्यमंत्री बन गए और उन्हें चुनाव आयोग से पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह भी मिल गया। यह मुकदमा आज भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इधर, कुछ समय से खासकर नगर निकाय चुनावों के पहले अपने चाचा की ओर मुड़े और दोनों पार्टियां खासकर पुणे और पिंपरी चिंचवड़ में एक साथ चुनाव लड़ीं। खबरें भी थीं कि अजित की मां आशा ताई पवार शरद और उनके बीच सुलह कराने के लिए लगातार कोशिश कर रही थीं। अजित के बारे में कहा जाता है कि उनकी किसी से दुश्मनी नहीं थी। वे सबके दोस्त थे।
22 जुलाई 1959 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के देवलाली प्रवरा गांव में जन्मे अजित ने बचपन से ही किसानों को आर्थिक परेशानियों से जूझते हुए देखा था। यही उनकी राजनीति की नींव साबित हुई। 66 साल के अजित पवार के परिवार में पत्नी सुनेत्रा पवार और उनके दो बेटे जय और पार्थ शामिल हैं।