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नक्सलवादियों के गढ़ में इस युवा महिला सरपंच ने लिख दी पर्यावरण संरक्षण और विकास की नई इबारत

अक्सर एक बात कही जाती है कि एक लड़के को शिक्षित करने पर एक परिवार का ही भविष्य सबल होता है जबकि एक लड़की...
नक्सलवादियों के गढ़ में इस युवा महिला सरपंच ने लिख दी पर्यावरण संरक्षण और विकास की नई इबारत

अक्सर एक बात कही जाती है कि एक लड़के को शिक्षित करने पर एक परिवार का ही भविष्य सबल होता है जबकि एक लड़की को शिक्षित करने पर दो परिवारों का भविष्य संवरता है। इस तरह की पंक्तियां मंची कार्यक्रमों की शोभा बढ़ाने के काम में आती रही हैं। लेकिन विकास के कई मानकों में देश के सबसे पिछड़े राज्यों में शुमार बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की नक्सल प्रभावित ग्राम पंचायत पैगंबरपुर ने वह काम कर दिखाया है जो अब तक का आजादी के बाद से कोई भी नहीं कर सका और इसकी सूत्रधार बनी है यहां की युवा और पढ़ी-लिखी महिला मुखिया प्रियंका कुमारी। महज 31 वर्षीय प्रियंका कुमारी ने वरिष्ठ जनों को धता बताते हुए पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण स्वच्छता और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में वह मानक स्थापित कर दिए हैं कि वह देश भर की महिलाओं और सरपंचों के लिए एक आदर्श बनकर प्रस्तुत हुई हैं। विशेषकर देश के वह हिस्से, जो किसी न किसी रूप में माओवाद, नक्सलवाद या अलगाववाद जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, उनके लिए ये किसी आदर्श से कम नहीं।

इस गांव में कुछ ही समय पहले तक नक्सलवादियों का खौफ रहा करता था। आज वही ग्राम पंचायत प्रियंका कुमारी के प्रयासों से पर्यावरण संरक्षण एवं स्वच्छता के मानकों में नई इबारत लिख रही है। शायद यह बात जानकर हैरानी हो, यह वही जगह है जहां वर्ष 2016 में नक्सलियों ने पुलिस जीप को उड़ाकर स्थानीय निवासियों को मतदान से भयभीत करने और लोकतंत्र की जड़ें कमजोर करने की असफल कोशिश की थी। लेकिन सरकारी योजनाओं को जिस तरीके से प्रत्येक लाभार्थी तक पहुंचाने के ईमानदार प्रयास हुए उसने नक्सलवादियों के कुत्सित प्रयासों को जमींदोज कर दिया।

अगर भौगोलिक स्थिति की बात की जाए तो मुजफ्फरपुर जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर पैगंबरपुर ग्राम पंचायत में लंबे समय तक नक्सलवादियों का प्रभाव रहा है। प्रभावी पुलिसिंग के जरिए इन इस पर नियंत्रण करने के प्रयास किए गए लेकिन अब धीरे-धीरे सामाजिक असंतोष जो विभिन्न कारणों से उपजा था उसे भी समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है। यह सब संभव हुआ है लोगों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने और उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के कारण। लोग इस बात को आत्मसात कर पाए हैं कि पंचायती राज व्यवस्था से जुड़ी केंद्र सरकार की तमाम योजनाएं इस दिशा में काम कर रही हैं कि जिससे ग्रामीणों को भी सशक्त किया जा सके और वह मुख्यधारा से जुड़ कर बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं हासिल कर सकें।

31 वर्षीय प्रियंका कुमारी बताती हैं कि जब वह मुखिया बनी तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी सरकारी योजनाओं का समय पर क्रियान्वयन, गांव में फैली गंदगी और कूड़े के ढेर को निस्तारित करवाना, और इसमें लोगों की जन भागीदारी सुनिश्चित करना। गांव में पौधारोपण कार्यक्रम को लगातार और बड़े पैमाने पर शुरू करके 4000 पौधे लगाए गए, जो ग्राम पंचायत स्तर पर एक बड़ी संख्या मानी जा सकती है। इसके अतिरिक्त इन पेड़ पौधों की देखभाल सुनिश्चित करने के लिए भी ग्रामीणों को जिम्मेवारी दी गई। इसके बाद प्रियंका कुमारी ने दूसरा काम किया कि बड़े पैमाने पर लोगों को साफ सफाई के लिए जागरूक किया और बताया कि किस तरह से गांव की साफ-सफाई सीधे तौर पर उनके और उनके बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ी हुई है। इसके लिए उन्हें बताया गया कि गीले और सूखे कपड़े को अलग-अलग रखने के किस तरह के फायदे हैं और इसके लिए प्रत्येक ग्रामीण को घर पर जाकर डस्टबिन बांटने की योजना भी शुरू की गई।

ग्राम पंचायत को कुल 16 वार्डों में बांटा गया। प्रियंका कुमारी ने इसके लिए योजना बनाई कि प्रत्येक वार्ड की एक निश्चित गली के बाहर से कूड़ा उठाने का कार्य सफाई कर्मियों के द्वारा किया जाएगा और ग्रामीण यह सुनिश्चित करेंगे कि उस जगह के अतिरिक्त कहीं भी अन्यत्र कूड़ा न फेंका जाए। चुनौती यह भी थी कि ग्राम पंचायत में मेडिकल कचरा भी स्वास्थ्य केंद्र के आस-पास के एक बड़े परिक्षेत्र में दिखाई देता था। उससे तमाम तरह की बीमारियां अक्सर पनपती थीं। मेडिकल कचरे के प्रबंधन का जो अभियान शुरू किया गया उसका परिणाम अब यह है कि अब रुई का टुकड़ा भी कहीं दिखाई नहीं देता।

इस कचरे का उचित निस्तारण किस तरीके से किया जाए, इसके लिए योजना बनाई गई की सूखे और गीले कचरे के प्रबंधन के लिए अलग-अलग इकाइयां बनाई जाए। इन इकाइयों का निर्माण कराया गया इससे अब 4 से 5 कुंटल ऑर्गेनिक खाद प्रतिमाह गांव में ही तैयार होती है। यह अपनी तरह का एक विशिष्ट प्रयास रहा जो सफलता की परिणति तक पहुंचा। कचरा प्रबंधन की इस योजना से और इन इकाइयों के निर्माण द्वारा 36 ग्रामीणों को सीधे तौर पर रोजगार मिलने की बात भी बताई जाती है।

शिक्षित मुखिया होने का परिणाम यह हुआ की जर्जर पंचायत भवन और स्कूलों का भी पुनर्निर्माण हुआ। अब उन्हीं स्थानों पर सुंदर और व्यवस्थित पंचायत भवन और विद्यालय दिखाई पड़ते हैं।।प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग सुव्यवस्थित शौचालय और पेशाब घर बनाए गए हैं। प्राथमिक शिक्षा के लिए अक्सर निजी स्कूलों बनाम सरकारी स्कूलों की बहस चला करती है। लेकिन यह प्रयास निजी स्कूलों को भी पछाड़ते दिखाई प्रतीत होते हैं। इनके पुनर्निर्माण का परिणाम यह हुआ इससे स्वच्छता रहने लगी और बच्चे अब कम बीमार पड़ रहे हैं। इसके अतिरिक्त पंचायत भवन में वेस्टर्न टॉयलेट के निर्माण के साथ-साथ दूर-दराज से आने वाले ग्रामीणों के लिए स्नानागार की व्यवस्था भी साफ सफाई के प्रति संवेदनशीलता को दिखाती प्रतीत हो रही है।

तमाम सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए अक्सर बिचौलियों की बात कही जाती है। जागरूकता के अभाव और अपने भोलेपन के चलते ग्रामीण अक्सर इनका शिकार होते रहे हैं। शिक्षित मुखिया प्रियंका कुमारी ने इस ओर विशेष ध्यान दिया और यह सुनिश्चित किया कि आम ग्रामीणों को इनका शिकार ना होना पड़े। कई योजनाओं के बारे में जानकारी, उनके आवेदन या लाभ प्राप्त करने के लिए लोगों को 45 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय के चक्कर काटने पड़ते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। पंचायत स्तर पर ही सभी सुविधाओं का मिलना सुनिश्चित किया गया है। जिन योजनाओं की जानकारी से लेकर उनके आवेदन तक के लिए जिला मुख्यालय पर निजी साइबर कैफे संचालक या अन्य बिचौलिए इन ग्रामीणों से एक से डेढ़ हजार रुपए तक वसूल करते थे, अब वह काम मुफ्त में संपादित हो रहे हैं। इसके अतिरिक्त पारदर्शिता, ईमानदारी और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए स्कूल और पंचायत भवन में हाईटेक सीसीटीवी कैमरों की भी व्यवस्था की गई है। इसकी मॉनिटरिंग प्रायः मुखिया के स्तर से स्वयं की जाती है।

पैगंबरपुर ग्राम पंचायत की मुखिया प्रियंका कुमारी कहती हैं कि अमृत महोत्सव काल में हम अपनी ग्राम पंचायत को मॉडल और आत्मनिर्भर बनाने को लेकर लगातार प्रयासरत हैं। राज्य के साथ-साथ केंद्र सरकार से मिली धनराशि और योजनाओं का पारदर्शिता के साथ प्रयोग करके तमाम लाभार्थियों तक मदद पहुंचाई जा रही है। स्वच्छता के मामले में पंचायत एक मानक बनकर उभरी है। नशा मुक्ति अभियान चलाया गया है और स्कूलों में लगातार बच्चों के नामांकन बढ़ रहे हैं। लोगों में अपने अधिकारों, सरकारी योजना और सुविधाओं के प्रति लगातार जागरूकता आ रही है।

नक्सलवादियों के गढ़ पैगंबरपुर ग्राम पंचायत और एक शिक्षित मुखिया प्रियंका कुमारी की एक कहानी हमें बताती है कि किस तरह से पंचायती राज्य के विचार में अगर अधिक से अधिक युवा और शिक्षित लोगों की भागीदारी बढ़े तो किस तरह से तमाम चुनौतियां के बावजूद सरकारी योजनाओं का ईमानदार क्रियान्वयन भारत के गांवों की सूरत बदल सकता है। जैसाकि गांधीजी कहते थे कि असली भारत गांवों में बसता तो इन प्रयासों के लगातार निष्पादन से उनकी ग्रामीण स्वराज की संकल्पना भी मूर्त रूप ले सकती है।



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