ट्रम्प का वेनेजुएला के तेल पर कब्जे के लिए देश में घुसकर राष्ट्रपति मदुरो को उठा ले जाना फौजी ताकत के बल पर दादागीरी का नंगा प्रदर्शन
अमेरिका का वेनेजुएला की राजधानी काराकास पर सैन्य हमला डोनाल्ड ट्रम्प की खुलेआम दादागीरी की बेशर्म मिसाल है। अमेरिकी फौज 3 जनवरी को राष्ट्रपति निकोलस मदुरो और उनकी पत्नी सीलिया फ्लोरेस का अपहरण कर न्यूयॉर्क ले आई। यह ऑपरेशन वेनेजुएला में कई जगहों पर बड़े पैमाने पर हमलों के साथ हुआ और उसे ड्रग तस्करी, नार्को-आतंकवाद, तानाशाही और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अब आम हो चुके बहानों से सही ठहराया गया। इससे वेनेजुएला का कम, अमेरिका के इरादों का ही पता चलता है।
यह किसी पैमाने से नैतिक अधिकार, संवैधानिक अनुशासन या अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति सम्मान नहीं, बल्कि साम्राज्यवादी ताकत का नंगा प्रदर्शन है। कथा-कहानियों में वर्णित किसी सम्राट की तरह अमेरिका दबंगई से इतरा रहा है और मान बैठा है कि वह जो करेगा, वही जायज है। कभी कानून, सिद्धांत, उदारता के जो पहनावे उसकी दबंगई को ढंकते थे, वे बहुत पहले ही उतर चुके हैं।
ये हालात ट्रम्प ने नहीं बनाए, उन्होंने तो बस उसके पाखंड को, दिखावे को परे कर दिया। अमेरिका के जो इरादे पिछली सरकारें मानवीय बातों, बहुपक्षीय दिखावे और नैतिक शब्दजाल में छिपाती थीं, ट्रम्प ने उस पर सीधे-सीधे धमकी के साथ अमल किया। इस तरह उन्होंने वह दिखा दिया, जो लंबे समय से सच था: साम्राज्य को अब किसी बहाने या समझाइश की जरूरत नहीं है। उसे अब यह दिखावा करने की दरकार नहीं है कि बेमन से, भलाई के लिए, यह करना पड़ा। उसे बस अपनी बात मनवानी है।
डर सिर्फ ट्रम्प की फितरत का नहीं है, बल्कि इस नंगेपन के आम हो जाने का है। जब साम्राज्य इंसाफ का दिखावा करना भी छोड़ दे, तो जो बचता है वह कानून-कायदों से मुक्त ताकत होती है, ऐसी शक्ति जिसे अब किसी बहाने की जरूरत नहीं रह जाती। असली खतरा दुनिया की आदत बन चुकी रीढ़हीनता है, जो इन तमाशों को चुपचाप देखती रहती है और अनगिनत बेकसूर लोग जान गंवा बैठते हैं।
झूठा नैतिक बहाना
यह दावा बौद्धिक बेईमानी है कि ड्रग तस्करी की वजह से वेनेजुएला एक खतरा है। अमेरिका में ड्रग्स की सप्लाई ऐतिहासिक रूप से कई ट्रांजिट देशों से होकर गुजरती है, जिनमें कई अमेरिका के करीबी सहयोगी हैं। दशकों की अमेरिकी सैन्य सहायता, खुफिया सहयोग, हवाई छिड़काव अभियान और नशीले पदार्थों के खिलाफ ऑपरेशन के बावजूद कोलंबिया वैश्विक कोकीन अर्थव्यवस्था का केंद्र बना हुआ है। मैक्सिको के कार्टेल सालाना कई घोषित युद्ध क्षेत्रों से ज्यादा लोगों को मारते हैं। फिर भी न तो बोगोटा और न ही मैक्सिको सिटी को अमेरिका से हमले, सत्ता परिवर्तन या प्रतिबंधों से होने वाले आर्थिक नुकसान की धमकियों का सामना करना पड़ता है।
यह कोई संयोग नहीं है, एक इशारा है। ‘ड्रग्स’ एक नैतिक बहाने के रूप में काम करता है। यह ऐसा शब्दजाल है, जो बिना सुनवाई सजा देने का बहाना बना देता है। वेनेजुएला में फौजी दखल की वजह वाकई नशीले पदार्थ होते, तो अमेरिका को अपने सहयोगियों, अपनी वित्तीय प्रणाली और अपनी अर्थव्यवस्था में कमजोरी का सामना करना पड़ता। इसके बजाय, वेनेजुएला को इसलिए निशाना बनाया जाता है कि वह अमेरिकी दबदबा स्वीकार करने से इनकार करता है।
उसके विरोध का रुख काराकास में ह्यूगो शावेज के तहत अपनाया गया और निकोलस मदुरो के तहत वह मजबूत हुआ। वहां अपने संसाधनों पर संप्रभु नियंत्रण कायम किया गया, अमेरिकी आर्थिक नीतियों का विरोध किया गया। चीन, रूस, ईरान और क्यूबा के साथ रणनीतिक संबंध बनाए गए और सबसे बढ़कर तेल की बिक्री के लिए डॉलर आधारित व्यवस्था के विकल्पों के साथ प्रयोग किया गया। अमेरिका की नजर में यह सबसे बड़ा अपराध है। यानी वेनेजुएला को विरोध करने खामियाजा भुगतना पड़ा।
साम्राज्य का पिछवाड़ा
लैटिन अमेरिका को लंबे समय से अमेरिकी साम्राज्य अपना पिछवाड़ा मानता रहा है। इसके लिए बाकायदा मोनरो सिद्धांत रहा है। फिर, ग्वाटेमाला, चिली, ब्राजील और उससे पहले शीत युद्ध के दौरान हुए तख्तापलट वगैरह में अमेरिकी दखल को साम्यवाद-विरोध, लोकतंत्र, आतंकवाद-विरोध, मानवीय बचाव जैसे बहानों से सही ठहराया जाता रहा है।
ट्रम्प का वेनेजुएला पर हमला उसी कड़ी का हिस्सा है। वह अलग सिर्फ अपनाए गए तरीके में है, न कि मकसद में। पिछली सरकारों ने कम से कम अंतरराष्ट्रीय संस्थानों या सहयोगी देशों की सहमति के जरिए दखल को सही ठहराने की कोशिश की थी। ट्रम्प ने तो उस शिष्टाचार को भी छोड़ दिया। वेनेजुएला एक घरेलू राजनैतिक मोहरा बन गया। इस बात का सबूत बन गया कि अमेरिका अभी भी ‘समाजवाद’ को सजा दे सकता है, विद्रोही देशों के कान मरोड़ सकता है और दक्षिणपंथी वोटरों, खासकर फ्लोरिडा में रहने वाले प्रवासी समुदायों को लामबंद कर सकता है।

बिना उकसावे केः वेनेजुएला की राजधानी काराकास में अमेरिकी बमबारी
चुनावी जोड़तोड़ साम्राज्यवादी सोच के साथ घुल गया है। वेनेजुएला को मजाक बना दिया गया। यानी एक नाकाम समाजवादी देश जिसकी बर्बादी को वैचारिक जीत के तौर पर बेचा जा सकता है। वेनेजुएला के लोगों की जिंदगी, उससे पहले इराकियों या लीबियाई लोगों की तरह ही कोई मायने नहीं रखती।
फिर भी वेनेजुएला प्रतीक भर नहीं है। वहां दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है, साथ ही प्राकृतिक गैस, सोना, बॉक्साइट, कोल्टन और दुर्लभ खनिज पदार्थों के विशाल भंडार भी हैं। ये संसाधन न केवल ऊर्जा बाजारों के लिए बल्कि इलेक्ट्रॉनिक्स, नई प्रौद्योगिकियों और आधुनिक हथियारों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। ऊर्जा परिवर्तन के दौर से गुजर रही दुनिया में ऐसे संसाधनों पर कब्जा रणनीतिक ताकत देता है।
शावेज के समय से वेनेज़ुएला ने बड़े पैमाने पर निजीकरण का विरोध किया, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ ठेकों पर नया सौदा किया और तेल से होने वाली कमाई को विदेशी शेयरधारकों के बजाय देश के अंदर लोगों में बांटने की कोशिश की। उससे भी ज्यादा बड़ी बात यह थी कि उसने ऐसे तेल व्यापार समझौतों की तलाश शुरू की, जो अमेरिकी डॉलर के जरिए नहीं होते थे। यह सिर्फ आर्थिक जुगाड़ नहीं, एक राजनैतिक ऐलान था।
डॉलर विरोध का पाप
वेनेजुएला में 2010 के दशक के आखिर तक बढ़ते अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण डॉलर-आधारित वित्तीय व्यवस्था तक पहुंच खत्म हो गई थी। ऐसे में वेनेजुएला ने तेल निर्यात को एशिया की ओर, खासकर चीन की ओर मोड़ना शुरू कर दिया। 2020 के दशक की शुरुआत तक, चीन वेनेजुएला का सबसे बड़ा अकेला तेल ग्राहक बन गया था, जो कभी-कभी कुल निर्यात का 70 से 90 प्रतिशत तक खरीद लेता था। इस कच्चे तेल का ज्यादातर हिस्सा युआन, यूरो या रूबल जैसी गैर-डॉलर मुद्राओं में बेचा जाता था, जिसे अक्सर शिपिंग दस्तावेजों में प्रतिबंधों से बचने के लिए छुपाया जाता था।
सटीक आंकड़े मिलना मुश्किल हैं क्योंकि पीडीवीएसए (वेनेजुएला की सरकारी तेल और गैस कंपनी) और चीनी कस्टम्स शायद ही कभी मुद्रा-विशिष्ट डेटा प्रकाशित करते हैं। लेकिन टैंकर ट्रैकिंग, रिफाइनरी इनटेक रिकॉर्ड और इंडस्ट्री के विश्लेषण से एक साफ पैटर्न दिखता है, वेनेजुएला के तेल का एक बड़ा हिस्सा डॉलर के अलावा दूसरी मुद्राओं में ट्रेड किया जा रहा था। अनुमान बताते हैं कि इस बदलाव से सालाना अरबों डॉलर का रेवेन्यू मिला और उसने यह दिखाया कि तेल उत्पादक देश पूरी तरह से डॉलर पर निर्भर हुए बिना भी व्यापार कर सकते हैं।
यही असली अपराध था। पेट्रोडॉलर व्यवस्था ही अमेरिका की वैश्विक शक्ति का आधार है। तेल के व्यापार को डॉलर में लेनदेन के जरिए अमेरिका के नियंत्रण वाले क्लियरिंग सिस्टम से गुजरने को मजबूर है। लिहाजा, अमेरिकी प्रतिबंध वित्तीय बांह मरोड़ने का काम करते हैं। इस व्यवस्था से हल्की-सी भी दूरी इस ताकत को कमजोर करती है।
वॉशिंगटन को सद्दाम हुसैन का इराकी तेल की कीमत यूरो में तय करने का फैसला याद है। उसे मुअम्मर गद्दाफी का अफ्रीका की सोना आधारित मुद्रा का प्रस्ताव याद है। दोनों को अपने देशों के विनाश की कीमत चुकानी पड़ी। वेनेजुएला की चुनौती पैमाने में छोटी थी, लेकिन उसके परिणाम खतरनाक थे। उत्पादन के चरम के समय, वेनेजुएला हर दिन 35 लाख बैरल से ज्यादा तेल पंप करता था। कम उत्पादन पर भी, यह संभावना बर्दाश्त से बाहर थी कि इतनी बड़ी मात्रा में तेल डॉलर के प्रभुत्व के बाहर जा सकता है।
आर्थिक घेराबंदी की राजनैतिक रणनीति
अक्सर दखलंदाजी को सही ठहराने के लिए जिस तबाही का हवाला दिया जाता है, वह अमेरिकी कार्रवाई के बाद हुई। संपत्ति फ्रीज करना, क्रेडिट देने से मना करना, ग्लोबल बैंकिंग से बाहर करना, सीआइटीजीओ (जिसकी मिल्कियत पहले पेट्रोलेओस डी वेनेजुएला के पास थी) जैसी विदेशी संपत्तियों को जब्त करना, और सेकेंडरी प्रतिबंधों ने वेनेजुएला की आर्थिक क्षमता को सिस्टमैटिक तरीके से खत्म कर दिया। खाने के सामान, दवाओं, स्पेयर पार्ट्स और जरूरी चीजों की कमी सिर्फ स्थानीय सरकार की गलतियों का नतीजा नहीं थी। वजहें आर्थिक घेराबंदी भी थी।
खुल्लम-खुल्ला दादागीरी
अमेरिका के समर्थक जोर देते हैं कि अमेरिकी शक्ति संवैधानिक कायदों से बंधी हुई है। औपचारिक तौर पर संविधान युद्ध छेड़ने का अधिकार कांग्रेस और उसकी कमान राष्ट्रपति को देता है। व्यवहार में, यह ढांचा दशकों से खोखला हो गया है।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद से, अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने युद्ध की घोषणा किए बिना बार-बार सैन्य कार्रवाई शुरू की है। इसकी मिसालें कोरिया, वियतनाम, इराक, लीबिया, सीरिया वगैरह है। 1973 का युद्ध शक्तियां प्रस्ताव ऐसी मनमानी को रोकने के लिए था। इसके बजाय, यह प्रक्रिया की असुविधा बन गया है, जिसे शब्दों के हेरफेर से टाला जाता है: युद्धों का नाम बदलकर ‘ऑपरेशन’ कर दिया गया, हमलों को ‘रक्षात्मक हमले’ के रूप में फिर से ब्रांड किया गया।
गहरी समस्या कांग्रेस का अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटना है। जब कमजोर दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों पर बल प्रयोग किया जाता है, तो संसद राजनैतिक सुविधा या द्विदलीय सहमति के कारण अपना अधिकार छोड़ देती है। इसलिए वेनेजुला के खिलाफ ट्रंप की धमकियां संवैधानिक कमजोरी को उजागर करती हैं।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत किसी संप्रभु देश के खिलाफ बल प्रयोग या धमकी देने की मनाही है। अपवाद सिर्फ सशस्त्र हमले के बाद आत्मरक्षा में या सुरक्षा परिषद की इजाजत से कार्रवाई है। इनमें कोई भी शर्त वेनेजुएला के मामले में लागू नहीं होती। नशीले पदार्थों की तस्करी, आर्थिक कुप्रबंधन, तानाशाही, या वैचारिक दूरी युद्ध के लिए कानूनी आधार नहीं बनते हैं। इसलिए, अमेरिका की हर फौजी कार्रवाई हमला मानी जाएगी।
वेनेजुएला अलग-थलग नहीं है। यह चीन और रूस के साथ रणनीतिक संबंधों के नेटवर्क में जुड़ा हुआ है। बीजिंग ने वेनेजुएला की एनर्जी और इंफ्रास्ट्रक्चर में अरबों डॉलर का निवेश किया है। मॉस्को ने सैन्य उपकरण, सलाहकार और कर्ज दिए हैं। इसलिए, वेनेजुएला को धमकी देना सिर्फ क्षेत्रीय दादागीरी ही नहीं है; यह पश्चिमी गोलार्ध में प्रतिद्वंद्वी शक्तियों के लिए चुनौती है।
साम्राज्य का नकाब उतरा
ट्रम्प ने यह दिखावा करना बंद कर दिया कि यह ढका हुआ है। पिछली सरकारों ने अमेरिकी ताकत को बेमन से, लोकतंत्र बहाली के लिए और नियमों से बंधा हुआ दिखाने की कोशिश की। ट्रम्प खुलेआम धमकियां, प्रतिबंध, अल्टीमेटम की बातें करते हैं। इस तरह उन्होंने वह सच सामने ला दिया जो लंबे समय से ढंका था कि साम्राज्य सहमति से नहीं, बल्कि जबरदस्ती से चलता है।
वेनेजुएला का भविष्य वेनेजुएला के लोग तय करेंगे। लेकिन ट्रम्प के कामों से जो सवाल उठे हैं, वे खत्म नहीं होंगे। क्या हम ऐसी दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं, जहां सिर्फ ताकत ही वैधता तय करती है? जहां कानून का इस्तेमाल चुनिंदा तरीके से किया जाता है और सुविधा के अनुसार उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है? जहां डी-डॉलराइजेशन बड़ा अपराध माना जाता है?
(लेखक चर्चित स्तंभकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। विचार निजी हैं)