वरिष्ठ नौकरशाह अमिताभ कांत का मानना है कि भारत जैसे लोकतंत्र में अगर कुछ लोग चाहते हों तो उन्हें बीफ सेवन की अनुमति दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि पंसद की आजादी होनी चाहिए।
केरल के मुख्यमंत्री के खिलाफ राज्य की एक अदालत ने एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है। त्रिशूर की सतर्कता अदालत ने यह आदेश राज्य के बहुचर्चित सोलर स्कैम के मामले में दिया है। आदेश में चांडी के साथ राज्य के उर्जा मंत्री आर्यादान मोहम्मद पर भी एफआईआर दर्ज करने को कहा गया है।
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के संस्मरणों पर आधारित किताब, दि टर्बुलेंट ईयर्स:1980-1996 का गुरुवार को उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने विमोचन किया। किताब में बाबरी मस्जिद को गिराए जाने की घटना का जिक्र करते हुए मुखर्जी ने लिखा कि अयोध्या में रामजन्मभूमि मंदिर का ताला खुलवाना प्रधानमंत्री राजीव गांधी का गलत निर्णय था। मुखर्जी ने बाबरी विध्वंस को पूर्ण विश्वासघात करार दिया जिसने भारत की छवि नष्ट कर दी।
चांद को मुंह में रख लेने की बात देवी-देवताओं की कथा में मिल सकती है लेकिन सूरज का ताप कोई नहीं झेल सकता। ‘सूर्य’ की पूजा-अर्चना करने वाले देश में सबसे सुलभ और सस्ते ‘सौर ऊर्जा’ संसाधनों पर देर से ही ध्यान दिया गया। मनमोहन सिंह राज में तरंगों (स्पेक्ट्रम) और कोयला खान वितरण के घोटालों की कालिख ने कांग्रेस को गड्ढे में डाला ही था, अब केरल में विधानसभा चुनाव से पहले ‘सौर ऊर्जा’ के नाम पर स्वयं मुख्यमंत्री ओमन चांडी के विरूद्ध करोड़ों के भ्रष्टाचार का आरोप राख पोतने जैसा है।
अहमदनगर के शनि शिंगणापुर मंदिर स्थित पवित्र चबूतरे पर महिलाओं के प्रवेश पर रोक की सदियों पुरानी परंपरा तोड़ने की कोशिश को पुलिस द्वारा विफल किये जाने के एक दिन बाद ग्राम सभा ने भूमाता ब्रिगेड और उसके कार्यकर्ताओं की निंदा करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया है।
सीताराम, राधेश्याम, लक्ष्मीपति विष्णु, शिव-पार्वती की जयकार के साथ धर्म ध्वजा फहराने वाले धर्मगुरु, नेता, समाजसेवी की आवाज अहमदाबाद-पुणे में क्यों नहीं सुनाई दी? ब्रह्मांड न सही, विश्व हिंदू परिषद के गरजने वाले नेता तिलक और कमंडल के साथ मातृशक्ति के लिए मैदान में ‘संकीर्ण’ और सत्ता व्यवस्था के समक्ष खड़े क्यों नहीं दिखाई दिए?
मैं अयोध्या के बाराबंकी कस्बे का रहने वाला हूं। मैंने अपने इलाके और उसके आसपास कभी राम मंदिर और बाबरी मस्जिद को लेकर नफरत का माहौल नहीं देखा। इस माहौल की शुरूआत दिल्ली से हुई। सन 1947 में हमारी जमीन बंटी और 1992 में हमारे दिल बंट गए। जिस दिन हमारे दिल बंटे, वह दिन हमारे लिए सबसे बदनसीब दिन था। चुनाव जीतने के चक्कर में हमारी नस्लें बरबाद हो गईं। हैरान हूं कि यह लोग अभी भी चैन से नहीं बैठ रहे हैं। आखिर यह इस मुद्दे को कहां ले जाकर छोड़ना चाहते हैं?