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1 मिनट गूगल के मालिक बने सन्मय ने दान की अवार्ड राशि

1 मिनट गूगल के मालिक बने सन्मय ने दान की अवार्ड राशि

दिग्गज सर्ज इंजन गूगल ने सन्मय वेद को आठ लाख रुपये का भुगतान किया है। सन्मय वेद एक मिनट के लिए गूगल डाॅट काॅम डोमेन नाम के मालिक बन गए थे। हालांकि सन्मय ने भुगतान की पूर्ण राशि दान कर दी है।
वापस नहीं लिया अवार्ड, असहिष्णुता के खिलाफ विरोध जारी: नयनतारा सहगल

वापस नहीं लिया अवार्ड, असहिष्णुता के खिलाफ विरोध जारी: नयनतारा सहगल

अपना साहित्य पुरस्कार वापस लेने से इंकार कर चुकी जानी-मानी लेखिका नयनतारा सहगल ने आज साहित्य अकादमी को एक पत्र लिखकर कहा कि असहिष्णुता के खिलाफ उनका विरोध जारी है।
ये फिल्में नहीं देखीं तो कुछ नहीं देखा

ये फिल्में नहीं देखीं तो कुछ नहीं देखा

भारतीय और विश्व सिनेमा ऐसा समुद्र है जिसमें जितने गोते लगाए जाएं, डूबते ही जाते हैं। हर साल पूरे विश्व में हजारों की संख्या में फिल्में बनती हैं, कुछ हिट होती है कुछ फ्लॉप और कुछ समय पर अंकित हो जाती है। कोई फिल्म फ्लॉप है इसका मतलब यह नहीं कि उसमें कुछ नहीं था। कभी-कभी फिल्में नहीं चलतीं और दर्शकों के दिल पर छाप छोड़ जाती हैं। कुछ खास फिल्मों की सूची आउटलुक के लिए लेखक और आलोचक अनुपमा चोपड़ा, लेखक और फिल्म इतिहासकार जय अर्जुन सिंह, फिल्मकार और आलोचक श्रीनिवास भाष्यम और फिल्म निर्देशक श्रीराम राघवन ने बनाई है। इन फिल्मों को जरूर देखिए। यह फिल्म सूची की पहली किस्त है। कल जानिए दूसरी किस्त में कुछ और खास फिल्में
कुंदन शाह, मिर्जा, अरुंधति‍ समेत 24 लोगों ने अवार्ड लौटाए

कुंदन शाह, मिर्जा, अरुंधति‍ समेत 24 लोगों ने अवार्ड लौटाए

देश में असहिष्णुता के माहौल को लेकर पुरस्‍कार वापसी का सिलसिला जारी है। अब जाने-माने फिल्‍म फ‍िल्‍मकार कुंदन शाह, निर्देशक सईद मिर्जा और प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय समेत 24 फिल्‍मकारों ने अपने राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार लौटाने का ऐलान किया है। इससे पहले दिबाकर बनर्जी और आनंद पटवर्धन समेत 11 लोगों ने अभिव्‍यक्ति की आजादी और असहिष्‍णुता के मुद्दे पर अपने पुरस्‍कार लौटा दिए थे।
अवार्ड नहीं लौटाएंगे कमल हासन, बोले-शुरू से है असहिष्णुता

अवार्ड नहीं लौटाएंगे कमल हासन, बोले-शुरू से है असहिष्णुता

देश में बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ पुरस्कार लौटाने के तरीके पर असहमति जताते हुए मशहूर अभिनेता कमल हासन ने कहा कि पुरस्कार वापस करना इस समस्या का कोई समाधान नहीं है क्योंकि ध्यान आकर्षित करने के और भी तरीके हैं।
दिबाकर बनर्जी, पटवर्धन समेत 10 फिल्‍मकारों ने अवार्ड लौटाए

दिबाकर बनर्जी, पटवर्धन समेत 10 फिल्‍मकारों ने अवार्ड लौटाए

साहित्‍यकारों के बाद अब फिल्‍मकारों ने भी पुरस्‍कार लौटाने शुरू कर दिए हैं। देश में बढ़ती असहिष्णुता और एफटीआईआई के मुद्दे पर दिबाकर बनर्जी और आनंद पटवर्धन समेत 10 फिल्‍मकारों ने अपना राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार लौटा दिया है।
मैगसायसाय का पैसा संजीव चतुर्वेदी ने एम्‍स को दान किया

मैगसायसाय का पैसा संजीव चतुर्वेदी ने एम्‍स को दान किया

सरकारी सिस्‍टम में रहते हुए भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ने वाले भारतीय वन सेवा के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने मैग्सेस अवार्ड में मिली पूरी धनराशि एम्‍स के जरूरतमंद मरीजों को दान करने का फैसला किया है।
अमिताभ-जया ‘की एंड का’ में

अमिताभ-जया ‘की एंड का’ में

प्रसिद्ध निर्देशक आर. बाल्की का फिल्म बनाने का अलग ढंग है। उसी तरह है उनका फिल्मों को अलग तरह के नाम देना। इस बार बाल्की अमिताभ और जया बच्चन को लेकर एक फिल्म बना रहे हैं। नाम रखा है, की एंड का। अब इस नाम के मायने तो फिल्म देख कर ही समझ में आएंगे।
मुझ से पहले माउंटेन मैन दशरथ मांझी को मिले अवार्ड

मुझ से पहले माउंटेन मैन दशरथ मांझी को मिले अवार्ड

साधरण कद-काठी, साधारण चेहरा-मोहरा। सांवली रंगत लेकिन जन्मजात सहज अभिनय करने की कुशलता। यह हैं, मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश के छोटे से कस्बे बुढाना में जन्में और पले-बढ़े नवाजुद्दीन सिद्दीकी। नवाजुद्दीन किसी बड़े फिल्मी परिवार से नहीं हैं, न ही उनका बॉलीवुड में कोई गॉडफादर रहा। अपने दम पर नाम और शोहरत कमाने वाले नवाजुद्दीन के लिए यह सब बहुत आसान नहीं था। मुजफ्फरनगर में रहते हुए जहां उनके पास मनोरंजन के लिए टीवी नहीं था, उन्होंने लोक कलाकारों के बीच तमाशा, रामलीला देखते हुए अपना बचपन बिताया। नवाजुद्दीन उन्हीं कलाकारों की तरह होना चाहते थे। वैसे ही बनना चाहते थे। पर कैसे यह उन्हें उस वक्त पता नहीं था। गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार से स्नातक के बाद उन्होंने कई तरह की नौकरियां कीं। यहां तक की चौकीदार की भी। फिर भी अभिनय की भूख थी कि खत्म नहीं हुई थी। विपरीत परिस्थितियों ने उन्हें और मजबूत कर दिया। इसी बीच उन्हें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के बारे में पता चला और बस अभिनय के गुर सीखने वह यहां चले आए। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में रहते हुए उन्होंने कई नाटकों को करीब से जाना। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से कोर्स पूरा करने के बाद दिल्ली में ही उन्होंने कई नाटक किए और फिर वहीं चले आए, जो अभिनय की दुनिया में स्थापित होने के लिए मक्का है, मुंबई। एक लंबे संघर्ष के बाद खुरदुरे चेहरे वाला यह अभिनेता निर्माता-निर्देशक की पहली पसंद बनता जा रहा है। ब्लैक फ्राइडे, गैंग्स ऑफ वासेपुर, तलाश, बदलापुर, बजरंगी भाईजान के बाद अब सभी की निगाहें उनकी आने वाली फिल्म मांझी- द माउंटेनमैन पर टिकी हुई हैं।
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