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आकांक्षा पारे काशि‍व

बेनूर है नूर

बेनूर है नूर

कुल ड्रेसेस, कूल डायलॉग, कूल फ्रेंड्रस। ऐसा लगता है कि कॉलेज मस्ती की कोई डॉक्यूमेंट्री चल रही है और बस दर्शक 146 मिनट खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं। सब कुछ इतना कूल है कि फिल्म कोल्ड स्टोरेज से निकाली गई मालूम पड़ती है। नूर फिल्म की समीक्षा बस इतनी ही है। फिल्म है तो थोड़े बहुत ट्विस्ट एंड टर्न्स तो होंगे ही। निर्देशक ने अपने चरित्रों को स्थापित करने और कहानी समझाने में ही आधा वक्त बर्बाद कर दिया है। धीमी रफ्तार तो बस जान ही ले लेती है।
फिल्म समीक्षा: बेजान 'बेगम जान'

फिल्म समीक्षा: बेजान 'बेगम जान'

विद्या बालन के खाते में एक हिट का काफी दिन से सूखा है। बेगम जान को देख कर लगता है कि यह सूखा अभी लंबा चलेगा। दर्जनों कलाकारों, विद्या की बिल्लौरी आंखों और देशभक्ति टाइप माहौल के बावजूद यह फिल्म अंत में लंबी गहरी ऊब के सिवाय कुछ नहीं देती।
मजबूत अनारकली

मजबूत अनारकली

फैजाबाद की गायिका और नर्तकी ताराबानो फैजाबादी की कहानी से प्रेरित अनारकली ऑफ आरा ने एक बार फिर साबित किया है कि महिला यदि मन से मजबूत हो तो उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। स्वरा भास्कर ने इस फिल्म से अपने अभिनय के झंडे बुलंद किए हैं।
जलियांवाला बाग की अतृप्त आत्माएं : फिल्लौरी

जलियांवाला बाग की अतृप्त आत्माएं : फिल्लौरी

टिपिकल पंजाबी भाषा में कहें तो कनेड्डे (कनाडा) से आया एक लड़का और शादी के जश्न में डूबा घर का कोना-कोना। कनन (सूरज शर्मा) की शादी बचपन की दोस्त अनु (महरीन पीरजादा) से हो रही है। कनन मांगलिक है और शादी को लेकर थोड़ा असमंजस में भी। फिर एक अच्छी आत्मा की एंट्री और अनु-कनन में प्यार। कहानी बस इतनी सी ही है। लेकिन यह कहानी हल्के फुल्के कॉमेडी अंदाज और चुटीले संवाद के साथ कही गई है।
मशीन : मनोरंजन की उम्मीद न रखें

मशीन : मनोरंजन की उम्मीद न रखें

फिल्म के शीर्षक से दर्शकों को लग सकता है कि यह कोई रोबोट या रा.वन की तरह फिल्म होगी। साइंस फिक्शन की तरह लगने वाली यह फिल्म दरअसल एक प्रेम कहानी है जिसमें फार्मूला प्रेम यानी प्रेम में धोखा और हत्या जैसा मसाला भरपूर उपयोग किया गया है।
ट्रैप्ड : जीने की अदम्य जिजीविषा

ट्रैप्ड : जीने की अदम्य जिजीविषा

ट्रैप्ड हिंदी सिनेमा के लिए नई तरह की फिल्म है। विक्रमादित्य मोटवानी कुशल निर्देशकों की कतार में शामिल हैं। इस बार बिना गाने, कम संवाद और लगभग तामझाम वीहिन एक प्रयोगधर्मी फिल्म उनके खाते में है।
संदेश के साथ आई दुल्हनिया

संदेश के साथ आई दुल्हनिया

सीधा-सादा बद्रीनाथ (वरुण धवन) और तेज तर्रार वैदेही (आलिया भट्ट) की शादी दहेज, लड़की शादी के बाद नौकरी नहीं करेगी टाइप के कई ट्विस्ट उनकी शादी को रोक देते हैं। वैदही भाग जाती है और उसके पीछे-पीछे भागता है बद्रीनाथ। कुछ गाना बजाना, कुछ डायलॉग और वैदेही को भी हो गया प्यार।
रंगून यानी गुनाह बेलज्जत

रंगून यानी गुनाह बेलज्जत

विशाल भारद्वाज बड़े कैनवास पर फिल्म रंगून ले कर आए हैं। ओमकारा, मकबूल, हैदर बनाने वाले निर्देशक इतनी बड़ी चूक कर सकते हैं यकीन करना थोड़ा मुश्किल है। दुखांत अंत उनकी फिल्मों का स्थाई भाव रहता है जो यहां भी है। लेकिन ओमकारा या मकबूल में यह दर्शकों को सिहरा देता था और यहां दर्शक राहत की सांस लेते हैं कि चलो फिल्म अब खत्म होगी।
वाकई ‘काबिल’ है ‘रईस’

वाकई ‘काबिल’ है ‘रईस’

दो फिल्मों के टकराने में इस बार शाहरूख खान और ऋतिक रोशन भिड़ गए हैं। दोनों ही अलग-अलग जॉनर की फिल्में हैं और दोनों की कलाकारों की अपनी फैन फॉलोइंग है। यह अलग बात है कि शाहरूख उसमें रितिक से बीस ही बैठेंगे।
छोरे से कम नहीं ये ‘दंगल’ करने वाली छोरियां

छोरे से कम नहीं ये ‘दंगल’ करने वाली छोरियां

किसी फिल्म को देखने के लिए सबसे पहले सवाल आता है कि इस फिल्म को क्यों देखना चाहिए। अगर दंगल के बारे में भी यही प्रश्न मन में है तो इसे इसलिए देखना चाहिए कि यह एक विश्वसनीय फिल्म है, किरदारों से लेकर लोकेशन तक, अभिनय से लेकर भावनाओं तक। यह कहानी गीता-बबीता से ज्यादा महावीर सिंह फोगाट की कहानी है।
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