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मनीषा भल्ला

एक्सक्लूसिव - 'इसलिए हम केजरीवाल पर भरोसा नहीं करते'

एक्सक्लूसिव - 'इसलिए हम केजरीवाल पर भरोसा नहीं करते'

पंजाब के गांव-गांव में चुनावी गतिविधियों की धमक सुनाई दे रही है। चौपालों पर सियासी सरगर्मियां तेज हैं। किसे, क्यों वोट देना चाहिए और किसे क्यों नहीं देना चाहिए इस पर चर्चाएं तेज हैं। आमतौर पर पंजाब में एक या दो दफा लगातार सत्ता सुख के बाद सत्ता परिवर्तन होता ही है लेकिन इस दफा आम आदमी पार्टी ने पंजाब में कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल के समीकरण बिगाड़ दिए हैं। हालांकि चुनावों में अभी समय है और आखिरी महीनों में राजनीति बिसात पर कौन क्या चाल चलता है, कहा नहीं जा सकता लेकिन आज की सच्चाई यह है कि राज्य में आम आदमी पार्टी का हाथ ऊपर है।
कन्हैया को लेकर सभी छात्र संगठन लामबंद, आंदोलन की तैयारी

कन्हैया को लेकर सभी छात्र संगठन लामबंद, आंदोलन की तैयारी

केंद्रीय जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की रिहाई के लिए देश भर के छात्र संगठन लामबंद हो गए हैं। आज वामपंथी दलों के छात्र संगठनों के अलावा नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई, कांग्रेस का छात्रसंगठन), जदयू, आरजेडी और स्टूडेंट्स फ्रंट फॉर स्वराज जैसे छात्र संगठन एक मंच पर आए। इनके नेताओं ने ऐलान किया कि कन्हैया को बिना शर्त रिहा किया जाए अन्यथा सरकार देशव्यापी छात्र आंदोलन के लिए तैयार रहे।
‘बड़े शौक से सुन रहा था जमाना, तुम्ही सो गए दास्तां कहते-कहते’

‘बड़े शौक से सुन रहा था जमाना, तुम्ही सो गए दास्तां कहते-कहते’

यह लगभग चार साल पहले की बात है। भारत में अफसानानिगार सआदत हसन मंटों की 100वीं जन्मशताब्दी मनाई जा रही थी। दिल्ली और पंजाब में कई कार्यक्रम आयोजित हो रहे थे। इस सिलसिले में एक कार्यक्रम दिल्ली में भी आयोजित हुआ जिसमें मंटो पर बात करने के लिए पाकिस्तान से कई अफसानानिगार और बुद्धिजीवि आए। उसी कार्यक्रम में पाकिस्तान के मशहूर उर्दू कहानिकार और पत्रकार इंतिजार हुसैन भी आए थे। वहीं उनसे पहली मुलाकात रही। हमेशा से इंतिजार हुसैन उतने ही भारतीयों के भी रहे जितने वह पाकिस्तान के थे। वह भी मंटो की बेबाक लेखनी के दीवाने थे। इंतजार साहब का जन्म पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के दिबाई गांव में हुआ था। मंगलवार को 93 वर्षीय इस लेखक का पाकिस्तान में निधन हो गया। भारत में किस प्रकार सोशल मीडिया पर लोगों ने इंतिजार साहब को याद किया-
आठ लड़के और समुद्रतल पर 45 मिनट तक साइकलिंग

आठ लड़के और समुद्रतल पर 45 मिनट तक साइकलिंग

कुरूक्षेत्र के रहने वाले 35 वर्षीय डॉ.नरेंद्र सिंह और पंजाब के रहने वाले दलविंदर सिंह समेत कुल आठ युवाओं ने गोवा के समुद्रतल पर 45 मिनट तक साइकिल चलाकर दुनिया को हैरत में डाल दिया। यहां के ग्रैंडी बीच में समुद्र तल पर इस जोखिम भरे काम को करने का उद्देश्य बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ मुहिम को बल देना और पंजाब को ड्रग्स मुक्त बनाना था।
आवरण कथाः कोचिंग का धंधा, कितना स्याह, कितना सफेद

आवरण कथाः कोचिंग का धंधा, कितना स्याह, कितना सफेद

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और कटक से अटक तक कोचिंग का धंधा औपचारिक शिक्षा के साथ-साथ पांव पसार चुका है और इस सच से कोई इनकार नहीं कर सकता। बिहार के मूल निवासी पीयूष कुमार गुजरात के अहमदाबाद में बैंक अधिकारी हैं। परिवार में पत्नी के अलावा सिर्फ एक बेटा है जो दसवीं की परीक्षा पास कर चुका है। मगर बेटा और पत्नी उनके साथ नहीं रहते। दोनों राजस्थान के कोटा में हैं जहां बेटा आईआईटी की प्रवेश परीक्षा पास करने के लिए एक नामी कोचिंग सेंटर में तैयारी कर रहा है। एक और उदाहरण देखें:ओडिशा से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुकी श्वेता कुमारी इंजीनियरिंग क्षेत्र में मंदी के कारण बैंक की नौकरी की तैयारी कर रही हैं। सिलीगुड़ी के अपने घर में रहकर उसने परीक्षा दी मगर लिखित परीक्षा की बाधा पार नहीं हो पाई। उसने दिल्ली का रुख किया और यहां एक कोचिंग से बैंकिंग की तैयारी के बाद पहली बार में ही रिजर्व बैंक और बैंक पीओ की लिखित परीक्षा पास कर ली। ये दो उदाहरण देश में कोचिंग के पूर्ण विकसित हो चुके धंधे की कहानी बयां करते हैं। जरा 15 साल पहले का जमाना याद करें जब कोचिंग का मतलब आपके घर में ही आस-पड़ोस के किसी बेरोजगार युवक द्वारा आपके बच्चों को पढ़ाई में थोड़ी-बहुत मदद कर देना होता था। अब अगर बच्चे को डॉक्टर, इंजीनियर, मैनेजर, प्रशासनिक अधिकारी या किसी सरकारी दफ्तर में क्लर्क ही बनना हो तो औपचारिक शिक्षा की डिग्री के साथ-साथ किसी कोचिंग संस्था का मार्गदर्शन होना अनिवार्य है अन्यथा गला काट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में उसका पिछड़ना तय है। सीधे शद्ब्रदों में कहें तो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और कटक से अटक तक कोचिंग का धंधा औपचारिक शिक्षा के साथ-साथ पांव पसार चुका है और इस सच से कोई इनकार नहीं कर सकता। साल 2013 में हुए एक आकलन के मुताबिक भारत में कोचिंग इंडस्ट्री लगभग 23.7 अरब डॉलर (160.16 अरब रुपये) की थी, जिसके साल 2015 में 40 अरब डॉलर (270 अरब रुपये) के होने की भविष्यवाणी की गई थी और अगले पांच वर्षों में यह 500 अरब रुपये तक पहुंच सकती है।
मुसलमानों पर अरबों खर्च लेकिन हालात बद से बद्तर

मुसलमानों पर अरबों खर्च लेकिन हालात बद से बद्तर

भारत में सबसे बड़ा अल्पसंख्यक है मुसलमान। मगर सबसे बड़ा यह अल्पसंख्यक संपन्न अल्पसंख्यक नहीं है। उसे 68 साल से लगातार बैसाखियों की जरूरत पड़ती रही है, मगर उसे अक्सर यह बैसाखी या तो टूटी हुई मिली है या मिली ही नहीं। सवा 12 साल पिछले और डेढ़ साल इस सरकार का छोड़ दें तो आजाद भारत करीब 54 साल ऐसे गुजरे हैं जब देश की सत्ता कांग्रेस के हाथों में रही है। सबसे बड़े अल्पसंख्यक मुसलमान को ज्यादातर जो बैसाखी मिली हैं वह इसी कांग्रेस के राज में दी गईं, तो मुसलमान की हालत इतनी खराब क्यों है।
एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे पर पलटवार की तैयारी

एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे पर पलटवार की तैयारी

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर अल्पसंख्यक समुदाय ने सरकार के खिलाफ कवायद तेज कर दी है। गौरतलब है कि हाल ही में एएमयू को अल्पसंख्यक दर्जा दिए जाने के मामले में केंद्र सरकार ने कहा है कि वह हाईकोर्ट के उस फैसले को मानती है, जिसमें एएमयू को अल्पसंख्यक दर्जा देने से इंकार किया गया था।
अपने लगाए पौधे की मौत पर इस स्कूल से कट जाता है नाम

अपने लगाए पौधे की मौत पर इस स्कूल से कट जाता है नाम

शिक्षा के नाम पर जकल तरह-तरह के प्रयोग किए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ के सरगूजा जिले के गांव बढ़गई में एक अनूठा स्कूल है। यहां फीस के तौर पर बच्चे के माता-पिता से एक पौधा लगवाया जाता है और उस पौधे की देखरेख का जिम्मा भी उन्ही को दिया जाता है। अगर पौधा सूख जाए या मर जाए तो स्कूल से बच्चे का नाम काट दिया जाता है।
पंजाब का माघी मेला आम आदमी पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल

पंजाब का माघी मेला आम आदमी पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल

प्रतिवर्ष 14 जनवरी को पंजाब के मुक्तसर जिले में होने वाला ऐतिहासिक माघी मेला इस दफा अलग होगा। पहली दफा यहां आम आदमी पार्टी की भी कॉन्फ्रेंस करेगी। इससे पहले कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल के अलावा यहां तमाम खालिस्तान समर्थक राजनीतिक पार्टियां ही कॉन्फ्रेंस किया करती थी। पंजाब के मामले में खास बात यह है कि किसी ने पंजाब के मतदाता की नब्ज भांपनी हो या किसी राजनीतिक पार्टी का जनाधार देखना हो वह माघी मेले में जरूर जाता है। इसे राजनीतिक पार्टियों का शक्ति प्रदर्शन कहा जा सकता है।